आज़ाद भारत में भी 24 जुलाई को मनाया जाता है इनकम टैक्स दिवस
जीएसटी और टोल टैक्स देने के बावजूद इनकम टैक्स क्यों ?
क्या आपको पता है कि इनकम टैक्स आज़ाद भारत की नहीं बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की व्यवस्था है। वह भी आज़ादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए भारतीयों पर ही थोपा गया था। 1857 की क्रांति को कुचलने में जो अतिरिक्त खर्च अंग्रेजी सेना पर आया था उसकी भरपाई करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीयों पर इनकम टैक्स लगाया था।
हमारे देश की विडंबना यह है कि एक से बढ़कर एक विद्वान तो हैं। एक से बढ़कर एक तो नेता तो हैं पर व्यवस्था पर कोई काम करने को तैयार नहीं। बात मौजूदा समय की ही लीजिये। जब आदमी जीएसटी दे रहा है। टोल टैक्स दे रहा है तो फिर इनकम टैक्स का क्या मतलब ? आज़ाद भारत में आय पर टैक्स क्यों ?
इनकम टैक्स का तो इतिहास ही भारतीयों के उत्पीड़न से जुड़ा है। जब 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ। क्रांतिकारियों ने लाल किले पर कब्ज़ा कर लिया तो अंग्रेजों 1857 की क्रांति को कुचलवाने के लिए अपनी सेना पर बेहिसाब पैसा खर्च किया। मतलब जहां 1856-57 में अंग्रेजी सेना का खर्च 1 करोड़ 14 लाख पाउंड था, वहीं बगावत को दबाने में 1857-58 में बढ़कर सीधे 2 करोड़ 10 लाख पाउंड तक पहुंच गया। उस दौर में 1 पाउंड की कीमत पूरे 10 रुपये के बराबर हुआ करती थी।
बगावत को दबाने के बाद 1 नवंबर 1858 को ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने एक बड़ी घोषणा कर दी। इस घोषणा के तहत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज खत्म कर ब्रिटिश सरकार का सीधा शासन लागू कर दिया गया। ‘द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858’ पास हुआ, जिसने देश के सभी वित्तीय मामलों की पूरी कमान भारत के पहले सेक्रेटरी ऑफ स्टेट चार्ल्स वुड के हाथों में सौंप दी गई गई। 1857 की क्रांति के कारण साल 1859 तक आते-आते इंग्लैंड पर कर्ज का कुल बोझ बढ़कर 8 करोड़ 10 लाख पाउंड के बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच गया।इस भयंकर आर्थिक तंगी से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर 1859 में जेम्स विल्सन को विशेष तौर पर भारत भेजा। विल्सन ब्रिटेन के मशहूर चार्टर्ड स्टैंडर्ड बैंक के संस्थापक और जाने-माने अर्थशास्त्री थे, जिन्हें वायसराय लॉर्ड कैनिंग की काउंसिल में फाइनेंस मेंबर यानी वित्त मंत्री की जिम्मेदारी दी गई।
विल्सन ने जिम्मेदारी संभालते ही 18 फरवरी 1860 को देश का पहला बजट दुनिया के सामने रखा। इस पहले बजट में उन्होंने तीन बड़े टैक्स लगाने का प्रस्ताव दिया, जिनमें पहला इनकम टैक्स, दूसरा लाइसेंस टैक्स और तीसरा तंबाकू टैक्स शामिल था।
देखने की बात यह है कि जेम्स विल्सन ने जब इन नए करों की घोषणा की तो उन्हें पता था कि भारतीय जनता इसका कड़ा विरोध करेगी। इसलिए उन्होंने चालाकी से काम लेते हुए अपने भाषण में ‘मनुस्मृति’ का उदाहरण दिया। विल्सन ने दलील दी कि उनका यह कदम कोई विदेशी या ‘इंडियन’ नहीं है, बल्कि पूरी तरह से ‘भारतीय’ परंपरा के अनुकूल है। हालांकि, उनकी इस दलील के बावजूद इस टैक्स कानून का पूरे देश में भारी विरोध हुआ। यहां तक कि उस समय के मद्रास प्रांत के गवर्नर सर चार्ल्स टेवेलियन ने भी इस कानून का खुलकर कड़ा विरोध किया था।
विल्सन का यह नया टैक्स कानून पूरी तरह से ब्रिटेन की तर्ज पर ही तैयार किया गया था। उस समय लागू किए गए नियमों के मुताबिक सालाना 200 रुपये से लेकर 500 रुपये तक कमाने वाले लोगों पर 2% के हिसाब से टैक्स लगाया गया था। जिन लोगों की सालाना आय 500 रुपये से अधिक थी, उन्हें अपनी कमाई का पूरे 4% हिस्सा टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा करना पड़ता था।
दिलचस्प बात यह थी कि इसमें सेना, नौसेना और पुलिस के तमाम कर्मचारियों को टैक्स से पूरी तरह मुक्त रखा गया था। चूंकि उस जमाने में इन विभागों के ऊंचे पदों पर ज्यादातर अंग्रेज अधिकारी ही तैनात थे। इसलिए इस छूट का सीधा फायदा उन्हीं को मिला। उस समय सेना के एक कैप्टन का सालाना वेतन 4,980 रुपये और नौसेना के लेफ्टिनेंट का वेतन 2,100 रुपये हुआ करता था, जो टैक्स के दायरे में आने के बावजूद इस विशेष नियम के कारण एक भी रुपया टैक्स नहीं चुकाते थे। मतलब आज़ादी की लड़ाई को कमजोर करने के लिए यह इनकम टैक्स लगाया गया था।
साल 1922 में असहयोग आंदोलन के दौर में भारत के भीतर एक नया इनकम टैक्स कानून लाया गया, जिसके बाद से देश में आयकर विभाग के गठन की असली कहानी शुरू हुई। इस नए कानून के तहत पहली बार टैक्स अधिकारियों को अलग-अलग आधिकारिक पद दिए गए। इसके बाद साल 1946 में पहली बार एक प्रतियोगी परीक्षा के जरिए आयकर अधिकारियों की सीधे तौर पर भर्ती शुरू की गई, जिसे आगे चलकर साल 1953 में ‘इंडियन रेवेन्यू सर्विस’ यानी ‘IRS’ का नया नाम दिया गया, जो आज भी देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में से एक है।
शुरुआती दौर में आयकर विभाग का काम सिर्फ टैक्स वसूलना नहीं था, बल्कि साल 1963 तक इस विभाग के पास संपत्ति कर, सामान्य कर और प्रवर्तन निदेशालय जैसे कई बड़े प्रशासनिक काम भी हुआ करते थे। इन कामों को और बेहतर बनाने के लिए साल 1963 में राजस्व अधिनियम केंद्रीय बोर्ड कानून लाया गया, जिसके तहत ‘केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड’ यानी ‘CBDT’ का गठन किया गया। इसके बाद साल 1972 में टैक्स की बकाया राशि वसूलने के लिए एक बिल्कुल अलग विंग बनाई गई और कमिश्नर नियुक्त किए गए। वर्तमान में देश में 1961 का आयकर कानून लागू है, जिसमें समय के साथ बदलाव होते रहते हैं।
बात बिल्कुल सीधी है कि इनकम टैक्स की शुरुआत किसी सामान्य विकास कार्य के लिए नहीं की गई थी, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के ऊपर आए एक बहुत बड़े संकट को टालने और अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी। भारत के इतिहास में पहली बार कमाई पर टैक्स लगाने की शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत ने 24 जुलाई 1860 को की गई थी। विडंबना तो यह है कि आज़ाद भारत में भी 24 जुलाई को इनकम टैक्स दिवस मनाया जाता है। हम आज भी ब्रिटिश अर्थशास्त्री सर जेम्स विल्सन को भारत का पहला वित्त मंत्री मानते हैं।