कांग्रेस की स्थिति
कांग्रेस बिहार में एक राष्ट्रीय दल होने के बावजूद पिछले कुछ दशकों में अपनी जमीन खो चुकी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने महागठबंधन (RJD, JDU, और अन्य) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल 1 सीट (किशनगंज) जीत सकी। 2020 के विधानसभा चुनाव में भी महागठबंधन के हिस्से के रूप में कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं, जो अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन था।
कांग्रेस के पास क्या है?
राहुल गांधी का प्रभाव और वोटर अधिकार यात्रा:
राहुल गांधी ने 2025 में बिहार में “वोटर अधिकार यात्रा” शुरू की, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची में अनियमितताओं और वोटर कार्ड छिनने की कथित साजिश के खिलाफ जागरूकता फैलाना है। इस यात्रा में महागठबंधन के सहयोगी दलों, जैसे RJD और लेफ्ट पार्टियों, का समर्थन है।
राहुल गांधी ने इस दौरान “वोट चोरी” जैसे मुद्दों को उठाया, जो खासकर दलित, ओबीसी, और अल्पसंख्यक समुदायों को आकर्षित करने की कोशिश है। यह यात्रा दरभंगा, मुजफ्फरपुर, और अन्य जिलों में भीड़ जुटाने में सफल रही, लेकिन यह भीड़ कितनी वोटों में तब्दील होगी, यह स्पष्ट नहीं है।
महागठबंधन का हिस्सा होना:
कांग्रेस RJD, JDU (पहले, अब नहीं), और अन्य छोटे दलों के साथ महागठबंधन में है। RJD का मुस्लिम-यादव (M-Y) वोट बैंक (14% यादव + 17% मुस्लिम) बिहार में मजबूत है, और कांग्रेस को इसका कुछ लाभ मिल सकता है। हालांकि, RJD का वर्चस्व होने के कारण कांग्रेस को सीटों का बंटवारा और प्रभाव के मामले में सीमित भूमिका मिलती है।
तेजस्वी यादव और लालू यादव की मौजूदगी महागठबंधन को मजबूती देती है, लेकिन कांग्रेस को अपनी स्वतंत्र पहचान बनानी होगी।
जातीय समीकरणों पर फोकस:
कांग्रेस ने हाल के वर्षों में जाति आधारित जनगणना की मांग को जोर-शोर से उठाया है, जो ओबीसी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) को आकर्षित करने की रणनीति है। राहुल गांधी ने इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की है।
हालांकि, कांग्रेस का अपना कोई मजबूत जातीय आधार नहीं है। यादव और मुस्लिम वोटरों पर RJD का प्रभाव है, जबकि सवर्ण और कुछ EBC वोटर BJP-NDA की ओर झुकते हैं।
वादे और मुद्दे:
राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा के दौरान उद्योग-धंधों को बढ़ावा देने और महिलाओं को 2500 रुपये प्रतिमाह देने जैसे वादे किए हैं। ये वादे ग्रामीण और महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश हैं, लेकिन इनके प्रभाव की गारंटी नहीं है।
बिहार में बेरोजगारी, गरीबी, और बुनियादी ढांचे की कमी जैसे मुद्दे अहम हैं, लेकिन कांग्रेस इन मुद्दों पर मजबूत स्थानीय नेतृत्व की कमी से जूझ रही है।
कांग्रेस की चुनौतियां
कमजोर संगठनात्मक ढांचा: बिहार में कांग्रेस का स्थानीय संगठन कमजोर है। स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेता या कार्यकर्ता आधार की कमी उसे RJD और BJP जैसे दलों से पीछे रखती है।
जातीय आधार की कमी: कांग्रेस के पास कोई स्पष्ट जातीय वोट बैंक नहीं है। बिहार में यादव (14%), कुर्मी (2.87%), और EBC (36%) जैसे समूहों पर RJD, JDU, या BJP का प्रभाव है।
RJD के वर्चस्व का दबाव: महागठबंधन में RJD का दबदबा होने के कारण कांग्रेस को सीमित सीटें और प्रभाव मिलता है। उदाहरण के लिए, पूर्णिया में पप्पू यादव को RJD ने टिकट नहीं दिया, जिसके बाद वे निर्दलीय लड़े।
वोटर लिस्ट विवाद: हाल के वोटर लिस्ट पुनरीक्षण में 35-65 लाख मतदाताओं के नाम कटने की खबरें हैं, जिसे विपक्ष “वोटर दमन” के रूप में देख रहा है। कांग्रेस इसे मुद्दा बना रही है, लेकिन इसका कितना असर होगा, यह अनिश्चित है






