चरण सिंह
देश में यदि ऐसे ही नोटों के दम पर चुनाव जीते जाते रहे। विपक्ष संघर्ष छोड़ जातीय आंकड़ों पर चुनाव जीतने की रणनीति बनाता रहा। आंदोलनों की प्रवृत्ति ऐसे ही खत्म होने लगी। लोग ऐसे ही समझौता करते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब जब पूरी तरह से पूंजीपतियों का देश पर कब्जा हो जाएगा।
पूंजीपति ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और दूसरे मंत्री होंगे। जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसेगी। देश का युवा बेबस और मजबूर होकर इन पूंजीपतियों की गुलामी करने को मजबूर हो जाएगा। जैसे राजनीति से विचारधारा, जनहित के मुद्दे और संघर्ष खत्म होता जा रहा है। सत्तापक्ष लोकतंत्र की रक्षा के लिए बनाए गए तंत्रों का इस्तेमाल पार्टी के लिए कर रहा है और विपक्ष जातिवाद, वंशवाद और निजी स्वार्थ में उलझा हुआ है।
कोई दल कोई नेता जनता के लिए सड़कों पर उतरने को तैयार नहीं। जनता भी लालच और स्वार्थ के वशीभूत होकर भटक जा रही है। निजी स्वार्थ जनहित पर हावी होता जा रहा है। कहना गलत न होगा कि यदि ऐसे ही देश को छोड़ दिया गया तो देश पूरी तरह कॉमर्शियल हो जाएगा। जाति धर्म के नाम पर बंट जाएगा।
यह दौर इतिहास में सबसे कलंकित दौर माना जाएगा। मीडिया को इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। जमीनी हकीकत यह है कि मीडिया का सत्ता के लिए काम करना देश और समाज दिनों के लिए घातक है। सही और गलत को पहचानो। देश सर्वोपरि है। कोई पार्टी या जाति नहीं। दिमाग से ज्यादा दिल और विवेक का इस्तेमाल करने की जरूरत है।

