चरण सिंह
नेपाल क्रांति के बाद भारत में यह चर्चा बहुत तेजी से हो रही है कि क्या भारत में भी ऐसी क्रांति हो सकती है ? विपक्ष के नेताओं ने क्रांति से सचेत होने और सत्तारूढ़ पार्टी नेताओं ने ऐसा कभी न होने की बात कहनी भी शुरू कर दी है। भले ही कांग्रेस इस मामले में बोलने से बच रही हो पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने चेतावनी देते हुए कहा है कि नेपाल जैसे स्थिति किसी भी देश में भी हो सकती है। ऐसे ही सत्ता पक्ष की ओर से भले ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कुछ न बोले हों, विदेश मंत्री कुछ न बोले हों पर बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने नेपाल की स्थिति के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा दिया है। निशिकांत दुबे ने कहा है कि नेपाल की राजशाही को कांग्रेस ने खत्म कराया। कांग्रेस की परिवारवाद की विदेश नीति की दुष्परिणाम भारत भुगत रहा है।
इसमें दो राय नहीं कि भारत दुनिया का ऐसा लोकतांत्रिक देश है जिसमें नेपाल जैसी क्रांति की संभावना बहुत कम है। आज भी भारत को महात्मा बुद्ध और महात्मा गांधी देश माना जाता है। शांति और अहिंसा पर जोर दिया जाता है। अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता है। ऐसे में यह प्रश्न जरूर उठता है कि हमारे देश के नेताओं के बच्चे भी तो नेपाल के नेताओं की तरह ही विदेश में मजे मार रहे हैं। भ्रष्टाचार तो भारत में भी चरम पर है। रोजगार तो भारत में भी नहीं मिल रहा है। गरीब और अमीर की दूरी तो भारत में भी लगातार बढ़ रही है। नेताओं का तो भारत के भी तानाशाहीपूर्ण रवैया है। गुस्सा तो भारत के युवाओं में भी सरकार के प्रति है तो फिर भारत में नेपाल जैसे क्रांति क्यों नहीं हो सकती ?
दरअसल भारत में विधायिका को सबसे अधिक पॉवर मिली हुई है। नेपाल की सेना ने तो क्रांतिकारियों पर फायरिंग करने से इनकार कर दिया। हमारे यहां तो नेता ही गुंडों को सेना की वर्दी में भेजकर क्रांतिकारियों पर फायरिंग करा देंगे। हमारे यहां तो आंदोलनकारियों के बीच से ही ऐसे बहुत लोग हो जाएंगे स्लीपर सेल का काम करने लगेंगे। आज़ादी की लड़ाई से लेकर अन्ना आंदोलन तक। स्लीपर सेल अपना काम करती रही है। यहां तो हर काम चाटुकारिता और चापलूसी कर कराने के प्रचलन ने जोर पकड़ रखा है। आत्महत्या करना मंजूर है पर विरोध करने की क्षमता बहुत कम लोगों में है। वैसे भी लोग जाति, धर्म और पार्टी पॉलिटिक्स में ऐसे उलझे हैं कि उन्हें निजी स्वार्थ ही दिखाई देता है। देश भक्ति और जज्बे का आज के लोगों में बहुत अभाव है।
हां यह बात जरूर है कि जिस दिन युवाओं का गुस्सा फूटा तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से नेता निशाने पर होंगे। देश के नेताओं को समझना होगा कि नेपाल क्रांति में युवाओं ने न तो सत्ता पक्ष के नेताओं को बख्शा है और न ही विपक्ष के नेताओं को । यदि क्रांतिकारियों की निशाने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली थे तो पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा को क्रांतिकारियों ने दौड़ा दिया। प्रचंड को भी नहीं बख्शा। हां जब भी क्रांति होगी तो सभी दल निशाने पर होंगे। राजनीतिक दल कोई क्रांति नहीं कर पाएंगे। जब भी क्रांति होगी आम आदमी ही करेंगे।
जैसे सरकार ने मीडिया को हाईजैक कर रखा है। जैसे युवाओं की उपेक्षा हो रही है। जैसे ऐसे ही सड़कों पर खूनी खेल चल रहा है तो एक न एक दिन लोगों का गुस्सा फूटेगा ही। ऐसे में यदि युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा तो संभाले नहीं संभलेगा। वैसे भी आज की तारीख में देश का 60 प्रतिशत युवा निजी संस्थानों में 10-15 हजार की नौकरी करने को मजबूर है। इन संस्थाओं में शोषण चरम पर है। जिस तरह से नेता, ब्यूरोक्रेट्स और पूंजीपति जनता को कीड़े मकोड़े से ज्यादा समझने को तैयार नहीं। ऐसे में इन लोगों को सबक सिखाने के लिए देश में क्रांति हो भी सकती है।






