चुनावी रैलियों पर रोक है तो प्रधानमंत्री को याद आ रहा है संसद का महत्व!

अनिल जैन
चुनाव आयोग ने कोरोना संक्रमण की वजह से चुनावी रैलियों पर रोक लगा रखी है, इसलिए प्रधानमंत्री पूरी तरह फुरसत में हैं और संसद की कार्यवाही में शामिल होने का उनके पास पर्याप्त समय है। इसीलिए संसद के हर सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना बहस के पारित कराने और अपनी नाममात्र की उपस्थिति दर्ज कराने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष को उपदेशात्मक लहेजे में संसद का महत्व समझा रहे हैं। चाकू की पसलियों से गुजारिश की तर्ज पर वे विपक्ष से संसद का सत्र सुचारू रूप से चलाने में सहयोग की अपील कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने बजट सत्र के पहले दिन विपक्ष से सहयोग की अपील करते हुए कहा है कि संसद के बजट सत्र को फलदायी बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव का महत्व अपनी जगह है और वह प्रक्रिया जारी रहेगी लेकिन पूरे वर्ष का खाका खींचने वाला, संसद का बजट सत्र बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री की इस अपील से ऐसा लगता है मानो वे संसद और बजट को लेकर बहुत गंभीर हैं, जबकि हकीकत यह है कि जब भी संसद का सत्र चल रहा होता है तो प्रधानमंत्री खुद ही आमतौर पर संसद से नदारद रहते हैं। उनकी सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस कराने की विपक्ष की मांग को ठुकरा देती है और हंगामे के बीच महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के पारित करा लिए जाते हैं।
पिछले नवंबर-दिसंबर महीने के दौरान ही तीन सप्ताह तक चले संसद के शीतकालीन सत्र में प्रधानमंत्री मोदी सत्र के पहले दिन यानी 29 नवंबर को ही संसद की कार्यवाही में कुछ समय के लिए शामिल हुए थे। उसके बाद वे एक भी दिन न तो लोकसभा में गए और न ही राज्यसभा में।
उस पूरे सत्र के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश में कई जनसभाएं, उद्घाटन और शिलान्यास किए। इसके अलावा चुनाव वाले उत्तराखंड और गोवा में उन्होंने जनसभाएं कीं। यानी पूरे समय चुनावी राज्यों का दौरा करते रहे। इसीलिए उनकी पार्टी के ज्यादातर सांसद भी दोनों सदनों से नदारद रहे। करीब सौ सांसदों को बाकायदा पार्टी की ओर से ही निर्देश था कि वे सारे काम छोड़ कर चुनाव वाले राज्यों में ही अपना समय दें। कई मौकों पर तो मंत्रियों ने भी सदन में मौजूद रहना जरूरी नहीं समझा। इस सबके बीच विपक्ष महंगाई, अर्थव्यवस्था, सीमा पर चीन की घुसपैठ, कृषि कानूनों की वापसी आदि मामलों पर बहस कराने की मांग करता रहा और शोरशराबे के बीच सरकार महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के ही पारित कराती रही।
संसद के हर सत्र के पहले सरकार की ओर बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठक में और सत्र के पहले दिन संसद परिसर में टीवी कैमरों के प्रधानमंत्री मोदी कहते जरूर हैं कि उनकी सरकार हर मुद्दे पर खुले मन से बहस के लिए तैयार है, लेकिन जब सदन की कार्यवाही शुरू होती है तो उनकी सरकार कई तरह के अगर-मगर के साथ विपक्ष के सवालों से मुंह चुराती दिखती है। इस काम में उसे दोनों सदनों के मुखियाओं और अन्य पीठासीन अधिकारियों का भी सहयोग मिलता है।
दरअसल सरकार चाहती ही नहीं है कि संसद सुचारू रूप से चले। इसके लिए उसकी यह रणनीति रहती है कि किसी मुद्दे पर बहस कराने की विपक्ष की मांग मत मानो, उसे नारेबाजी करने दो और शोरशराबे के बीच विधेयक पारित कराते रहो। इस सिलसिले में अगर सरकार को लगता है कि विपक्ष के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं है तो ऐसी स्थिति में वह खुद ही विपक्ष को कोई ऐसा मुद्दा थमा देती है, जिसके कारण विपक्ष को मजबूरन नारेबाजी करना पड़ती है। जैसे पिछले सत्र के पहले दिन सरकार ने विपक्ष के एक दर्जन सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित करा दिया।
राज्यसभा के सभापति की ओर से आया यह फैसला संसदीय परंपरा और नियमों के पूरी तरह खिलाफ था, क्योंकि सांसदों को संसद के मॉनसून सत्र में हंगामा करने के लिए शीतकालीन सत्र में निलंबित किया गया था। इस मसले पर पूरे सत्र में किसी भी मसले पर बहस नहीं हो सकी। राज्यसभा में विपक्षी दल 12 सांसदों के निलंबन को रद्द करने की मांग करते रहे और सरकार उनकी मांग को नजरअंदाज करते हुए हंगामे के बीच अपना बहुमत न होने के बावजूद विधेयक पारित कराती रही।
उससे पहले मॉनसून सत्र में भी पेगासस का मुद्दा छाया रहा था। विपक्षी नेताओं, सुप्रीम कोर्ट के जजों, सैन्य अधिकारियों, नौकरशाहों, पत्रकारों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोन की जासूसी कराने के संबंधी इस मुद्दे पर विपक्ष बहस कराने की मांग कर रहा था और सरकार बहस से कतरा रही थी। शोरशराबे के बीच विधेयक पारित कराने के अलावा दोनों सदनों में कोई काम नहीं हो पाया था।
उससे भी पहले यानी संसद का पिछला बजट सत्र कोरोना वायरस की वजह से प्रभावित हुआ था और उस समय पांच राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव की वजह से समय से पहले ही सत्र स्थगित कर दिया गया। उस समय किसानों का आंदोलन भी चल रहा था और विपक्ष उस मसले पर भी बहस की मांग करता रहा और सरकार उस मांग को नकारती रही। उससे पहले यानी 2020 का शीतकालीन सत्र ऐन किसान आंदोलन के बीच हो रहा था। उसी दौरान राज्यसभा में कृषि विधेयकों पर विपक्ष की मतदान की मांग को ठुकरा कर तीनों विवादित कृषि विधेयकों को नियमों के विपरीत जोर-जबरदस्ती और ध्वनि मत से पारित कराया गया था। मतदान की मांग कर रहे विपक्षी सांसदों को सदन से निलंबित भी कर दिया गया था। इस अभूतपूर्व मनमाने फैसले के खिलाफ विपक्षी सांसदों ने पूरी रात संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष धरना दिया था। उससे पहले के दो सत्र भी कोरोना की महामारी के चलते आधे-अधूरे तरीके से हुए थे। इस प्रकार पिछले दो साल से संसद की कार्यवाही लगातार आधे-अधूरे और मनमाने तरीके से चल रही है।
बहरहाल मौजूदा बजट सत्र के पहले दिन संसद परिसर में प्रधानमंत्री ने सभी सांसदों और राजनीतिक दलों से इस सत्र को फलदायी बनाने की अपील की है। उन्होंने कहा, ”यह बात सही है कि बार-बार चुनाव के कारण सत्र भी प्रभावित होते है, चर्चाएं भी प्रभावित होती है। लेकिन मैं सभी सांसदों से प्रार्थना करूंगा कि चुनाव अपनी जगह पर हैं, वे चलते रहेंगे, लेकिन बजट सत्र पूरे वर्ष भर का आर्थिक खाका खींचता है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए वे खुले मन से इसमें भाग लें और संवेदनाओं से भरी चर्चा के जरिए इस सत्र को फलदायी बनाएं।’’
प्रधानमंत्री अपनी इस अपील को लेकर कितने गंभीर हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर बार सत्र शुरू होने से पहले सरकार की ओर से बुलाई जाने वाली सर्वदलीय बैठक भी इस बार नहीं आयोजित की गई। अगर प्रधानमंत्री सचमुच संसद सत्र और बजट को लेकर इतने गंभीर होते तो सत्र शुरू होने से पहले सर्वदलीय बैठक आयोजित की जानी चाहिए थी और उसमें संसद में उठाए जाने वाले मुद्दों को लेकर आम सहमति बनाने की कोशिश करनी चाहिए थी।
दरअसल इस समय फिर से फैल रहे कोरोना संक्रमण की वजह से चुनाव आयोग ने चुनावी रैलियों और रोड शो पर रोक लगा रखी है, इसलिए प्रधानमंत्री फुरसत में हैं और संसद की कार्यवाही में शामिल होने के लिए उनके पास पर्याप्त समय है। इसीलिए उन्हें संसद और बजट का महत्व याद आ रहा है और वे उसे उपदेशात्मक लहेजे में विपक्ष को भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

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