राजस्व संग्रह की चिंता: शुरुआती सालों में जीएसटी कलेक्शन अस्थिर रहा। 2017-2020 के बीच महामारी ने राजस्व को 20-30% तक गिरा दिया। राज्यों को केंद्र से मुआवजा (कंपेंसेशन सेस) देना पड़ रहा था, जो 28% स्लैब पर निर्भर था। दरें कम करने से सेस का बोझ बढ़ जाता, इसलिए सतर्कता बरती गई। 2025 तक सेस के लोन चुकाने के बाद ही बड़े बदलाव संभव हुए।
अर्थव्यवस्था की स्थिरता और डेटा संग्रह: जीएसटी को मजबूत करने के लिए पहले IT इंफ्रास्ट्रक्चर (जैसे e-way बिल, इनवॉइस मैचिंग) सेटअप किया गया। 2022-24 तक कलेक्शन 2 लाख करोड़/माह तक पहुंचा, जो दरें काटने का आधार बना। पहले कटाव से ‘इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर’ (इनपुट पर ज्यादा टैक्स, आउटपुट पर कम) की समस्या बढ़ जाती।
राजनीतिक और चुनावी फैक्टर: बड़े सुधारों के लिए GST काउंसिल (केंद्र+राज्य) में सहमति जरूरी। विपक्षी राज्यों ने राजस्व शेयरिंग पर आपत्ति जताई। 2024 चुनावों के बाद NDA की मजबूत स्थिति ने इसे आसान बनाया। PM मोदी ने स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त 2025) पर इसे ‘NextGen GST’ के रूप में घोषित किया, जो फेस्टिव सीजन (नवरात्रि-दिवाली) से पहले लागू हुआ—उपभोग बढ़ाने के लिए सही टाइमिंग। ग्लोबल और डोमेस्टिक प्रेशर: महंगाई (6-7% पर), ग्रामीण मांग की कमजोरी और वैश्विक सुस्ती ने दबाव बनाया। 2025 के बजट में पहले संकेत दिए गए थे, लेकिन पूर्ण सुधार सितंबर में।
फायदेमंद तो क्यों नहीं पहले हुआ : खन्ना

जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक में 3 सितंबर को लिया गया। यह निर्णय वाकई ऐतिहासिक है। 22 सितंबर से लागू नई दरें (मुख्य रूप से 5% और 18% स्लैब) ने रोजमर्रा की 400 से ज्यादा वस्तुओं-सेवाओं को सस्ता कर दिया है। इससे उपभोक्ताओं को सालाना 2.5 लाख करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है, जो महंगाई को काबू करने, मध्यम वर्ग को राहत देने और अर्थव्यवस्था को गति देने में मददगार साबित होगा। लेकिन आपका सवाल बिल्कुल जायज है—अगर यह इतना फायदेमंद है, तो 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद 8 साल क्यों लगे?
क्यों नहीं हुआ पहले? मुख्य कारण
जीएसटी सिस्टम की शुरुआत एक जटिल और बहु-स्तरीय टैक्स स्ट्रक्चर से हुई थी। 2017 में 5%, 12%, 18% और 28% के चार स्लैब बनाए गए थे, ताकि राज्यों को राजस्व हानि न हो और अर्थव्यवस्था स्थिर रहे। लेकिन समय के साथ कई चुनौतियां उभरीं:
