पीएम मोदी को विशुद्ध भारतीय राजनेता और पत्रकारों को बिचौलिया मानती है मोदी सरकार
पीएम मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के सवाल पर मतदाताओं से संवाद करने के लिए बिचौलिए की जरूरत न होने की बात की सरकारी अधिकारी ने
चरण सिंह
अभी तक तो पत्रकारों को जागरूक लोग ही दलाल, एजेंट सत्ता का प्रवक्ता ही बोलते थे अब तो सरकार भी बिचौलिया बोलने लगी है। भाई दिलजले बोले तो समझ में आता है जिस सरकार के लिए अधिकतर पत्रकारों ने अपना जमीर बेच दिया। एक से बढ़कर एक समझौता कर लिया उन पत्रकारों वही सरकार बिचौलिया बोल रही है जिसके लिए दांव पर लगा दिया। जिस सरकार की वजह से ये पत्रकार गाली खा रहे हैं वह सत्ता भी इन बेचारों को अपमानित करने लगी।
दरअसल न्यूजीलैंड के दौरे पर एक विदेशी पत्रकार ने पूछ लिया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते ? जवाब में मोदी सरकार के एक अधिकारी ने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री विशुद्ध रूप से भारतीय राजनेता हैं। उन्हें अपने मतदाताओं से संवाद करने के लिए बिचौलिए की जरूरत नहीं। इस अधिकारी ने पत्रकारों को ही बिचौलिया नहीं बोला है बल्कि मतदाताओं का भी अपमान किया है। मतलब मतदाताओं को मोदी की ही भाषा समझ में आती है ? सीधे मन की बात ही समझ में आती है ? पत्रकारों की भाषा ये बेचारे समझ नहीं पाते हैं ? इसमें दो राय नहीं कि लोग अपनी धारणा मीडिया में ख़बरें देखकर ही बनाते हैं।
दिलचस्प यह है कि मोदी सरकार ने उन पत्रकारों को बिचौलिया बोला है जिन पत्रकारों से मिलने के लिए किसी समय नेता तरसते थे। कलम से भय खाते थे। कितने उदाहरण हैं कि सूबे का मुख्यमंत्री भी समय मांगकर संपादक से मिलने गए हैं। उन पत्रकारों को बिचौलिया बोला है जो राजनेताओं को बिचौलिया बोलने की हिम्मत रखता था। सत्ता बदलने की ताकत रखता था। उन पत्रकारों को बोला है जिन पत्रकारों की खबर का इंतजार पूरा देश करता था। कौन है इसके लिए जिम्मेदार ?
भाई जब देश में जब इन बिचौलिए की जरुरत ही नहीं है तो फिर ये मीडिया हाउस क्यों ? सरकार की ढपली बजाने के लिए ? वैसे भी जो पत्रकार देश और जनता के लिए अपनी पत्रकारिता नहीं कर सकते तो फिर उन पत्रकारों की जरूरत ही किया है ? यदि सरकारों और प्रभावशाली लोगों का भोंपू ही बनना है तो फिर इन मीडिया हाउस की जरूरत ही क्या है ?
यदि मीडिया में रोजगार है। यदि पत्रकारों को नौकरी की मज़बूरी कहा जा रहा है तो फिर पत्रकारिता को बदनाम न किया जाए। सत्ता के दलाल मीडिया हॉउस को बीजेपी की आईटी सेल बना दिया जाए। इनसे मीडिया कर्मी और पत्रकार की पहचान छीनी जाए। ये जो बड़के पत्रकार बने होने का दम्भ भरते हैं। इनको पत्रकार नहीं बल्कि धंधेबाज बोला जाए। इनसे प्रेस की पहचान छीनी जाए। कारोबारी बोला जाए।
देश में यदि मीडिया हो तो सत्ता के लिए बल्कि जनता के लिए हो। नहीं तो इन मीडिया हाउस को बंद कराना होगा। ये मीडिया हाउस ही हैं जो पत्रकारिता का धर्म भूलकर देश और समाज का नुकसान कर सत्ता की ढाल बन रही है। देश के गर्त में जाने का सबसे अधिक जिम्मेदार आज का गोदी मीडिया है। आज का मीडिया लगातार जमीनी मुद्दों को छिपा कर सत्ता के लिए काम कर रहा है, यह देश और समाज के लिए घातक है।

