चरण सिंह
काश फिर से देश में त्योहारों के प्रति जुनून जाग जाए। लोगों में परिजनों और रिश्तेदारों के प्रति फिर से अपनापन जाग जाए। दीयों की रोशनी से गांव-देहात जगमगा उठें। दिवाली मनाने के लिए शहरों से अपने गांवों का जाने वह जूनून शायद ही आज की पीढ़ी समझ पाए। उस दौर में भले ही किसकी कितनी भी आय कम हो पर परिजनों के लिए कुछ न कुछ जरूर ले जज्बा था। बसों और ट्रेनों में कितनी भी भीड़ हो पर अपने गांव जरूर जाना होता था। घर परिवार के सदस्यों के साथ ही मोहल्ले वालों और रिश्तेदारों से मिलना ही होता था। वह भी आत्मीयता के साथ। किसी से कितने भी गिले शिकवे क्यों न हों पर त्योहारों में सब दूर हो जाते थे।
आज की तारीख में हम कितना भी आधुनिक बनने का दावा करें। हम कितने भी धनवान हो गए हों। हम अपने को कितना भी बड़ा आदमी मानते हों पर न पहले वाली खुशहाली रही है और न ही तीज त्यौहार। इस आपाधापी के दौर में त्यौहार भी बस औपचारिकता रह गए हैं। दिवाली उत्तर भारत का वह त्यौहार है जिसकी तैयारी किसी समय एक महीने पहले हो जाया करती थी।
गांव देहात में घरों की साफ़ सफाई भी काफी समय पहले शुरू हो जाया करती थी। लगता था कि दिवाली आ गई है। क्योंकि दिवाली के साथ गोवर्धन पूजा और भैया दूज दो त्यौहार और आते हैं तो इस त्यौहार की अपनी ही पहचान रही है। अभाव में त्योहारों की तैयारी दिखाई देती थी। आज भले ही ड्राई फ्रूट और महंगी मिठाई लोगों का सिम्बल बन गई हो पर वह दौर खांड से बने हाथी गोले का था। मतलब खांड से बनी मिठाई का। गोवर्धन पूजा में रिश्तेदार भी जुटते थे। हमारे यहां तो पूरे मोहल्ले की गोवर्धन पूजा हमारे घर में होती थी। कल्पना कीजिये कि 100 के आसपास पुरुष, महिला और बच्चे जब एक जगह इकट्ठा होंगे तो क्या दृश्य होगा।
गांव देहात में घरों की साफ़ सफाई भी काफी समय पहले शुरू हो जाया करती थी। लगता था कि दिवाली आ गई है। क्योंकि दिवाली के साथ गोवर्धन पूजा और भैया दूज दो त्यौहार और आते हैं तो इस त्यौहार की अपनी ही पहचान रही है। अभाव में त्योहारों की तैयारी दिखाई देती थी। आज भले ही ड्राई फ्रूट और महंगी मिठाई लोगों का सिम्बल बन गई हो पर वह दौर खांड से बने हाथी गोले का था। मतलब खांड से बनी मिठाई का। गोवर्धन पूजा में रिश्तेदार भी जुटते थे। हमारे यहां तो पूरे मोहल्ले की गोवर्धन पूजा हमारे घर में होती थी। कल्पना कीजिये कि 100 के आसपास पुरुष, महिला और बच्चे जब एक जगह इकट्ठा होंगे तो क्या दृश्य होगा।
आज की तारीख में दिवाली स्वार्थ के संबंध का त्योहार बन रह गई है। यदि आपका किसी से स्वार्थ है तो गिफ्ट देना है। नहीं तो कितना भी सगा संबंधी हो, किसी को कोई मतलब नहीं। त्योहार भी आदमी की तरह बनावटी होते जा रहे हैं। त्योहार में पैसा है। संसाधन हैं पर वह प्यार मोहब्बत नहीं।

