Site icon Thenews15.in

पूर्वानुमानित अवधि में हॉट डे/मध्यम हीट वेव की स्थिति बने रहने की संभावना

मानसून के सक्रिय होने की सम्भावना के कारण 15-16 जून के आसपास उत्तर बिहार के जिलों के अनेक स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा हो सकती।

सुभाष चंद्र कुमार

समस्तीपुर पूसा डा राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविधालय स्थित जलवायु परिवर्तन पर उच्च अध्ययन केंद्र के ग्रामीण कृषि मौसम सेवा, एवं भारत मौसम विज्ञान विभाग के सहयोग से

जारी 12-16 जून, 2024 तक के मौसम पूर्वानुमानित अवधि में उत्तर बिहार में अगले 2-3 दिनों तक आसमान प्रायः साफ तथा मौसम के आमतौर पर शुष्क रहने की सम्भावना है। इसी अवधि में हॉट डे/मध्यम हीट वेव की स्थिति बनी रह सकती है। मानसून के सक्रिय होने की सम्भावना के कारण 15-16 जून के आसपास उत्तर बिहार के जिलों के अनेक स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा हो सकती है।

इस अवधि में अधिकतम तापमान 38-42 डिग्री सेल्सियस के बीच रह सकता है। जबकि न्यूनतम तापमान 25-27 डिग्री सेल्सियस के आस-पास रह सकता है।
मंगलवार के तापमान पर एक नजर डालें तो अधिकतम तापमानः 37.5 डिग्री सेल्सियस, सामान्य से 1.7 डिग्री सेल्सियस अधिक एवं न्यूनतम तापमानः 27.5 डिग्री सेल्सियस, सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है

सापेक्ष आर्द्रता सुबह में 75 से 85 प्रतिशत तथा दोपहर में 35 से 45 प्रतिशत रहने की संभावना है।

पूर्वानुमानित अवधि में औसतन 20 से 25 कि०मी० प्रति घंटा की रफ्तार से पूरवा हवा चलने का अनुमान है।

समसामयिक सुझाव देते हुए मौसम वैज्ञानिक ने बताया कि जिन किसान भाइयों के पास सिंचाई की सुविधा पर्याप्त हो तथा लम्बी अवधि वाले धान लगाना चाहते है। वे राजश्री, राजेन्द्र मंसुरी, स्वर्णा सब 1 एवं वी०पी०टी०-5204 आदि किस्में जल्द से जल्द बीजस्थली में गिराने का प्रयास करें। जितने क्षेत्र में धान का रोप करना हो उसके दशांष हिस्सों में बीज गिरायें। बीज को गिराने से पहले 1.5 ग्राम बविस्टीन प्रति कि० ग्रा० बीज की दर से उपचारित करें।

जो किसान भाई अब तक हल्दी एवं अदरक की बुआई नहीं किये हैं, वे अतिशीघ्र बुआई सम्पन्न करें। हल्दी की राजेन्द्र सोनिया, राजेन्द्र सोनाली किस्में तथा अदरक की मरान एवं नदिया किस्में उत्तर बिहार के लिए अनुसंशित है। हल्दी के लिए बीज दर 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा अदरक के लिए 18 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रखें। बीज प्रकन्द का आकार 30-35 ग्राम जिसमें 3 से 5 स्वस्थ कलियाँ हो। रोपाई की दुरी 30×20 से०मी० रखे। बीज को उपचारित करने के बाद बुआई करे।

मध्यम अवधि के धान के किस्मो को बीजस्थली में गिराने का काम करे। इसके लिए संतोष, सीता, सरोज, राजश्री, प्रभात, राजेन्द्र सुवासनी, राजेन्द्र कस्तुरी, राजेन्द्र भगवती, कामिनी, सुगंधा किस्में अनुशंसित है। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में रोपाई हेतु 800-1000 बर्ग मीटर क्षेत्रफल में बीज गिरावें। नर्सरी में क्यारी की चौराई 1.25-1.5 मीटर तथा लम्बाई सुविधा अनुसार रखें। बीज को गिराने से पहले बविस्टिन 2.0 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करें।

मूंग, उरद की तैयार फलियों की तुड़ाई कर ले तथा हरी खाद हेतु उसके पौधों को मिट्टी पलटने वाले हल से जमीन में गाड़ दें।लीची तोड़ने के बाद लीची के बगीचों की जुताई कर खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करे। प्रति प्रौढ़ पेड़ 60 से 80 किलोगाम कम्पोस्ट अथवा गोबर की सड़ी खाद. 25 किलोग्राम यूरिया, 1.5 किलोग्राम सिंगल सुपर फॉसफेट, 1.3 किलोग्ाम म्युरेट ऑफ पोटाश तथा 50 ग्राम सुहागा के मिश्रण को वृक्ष के पूरे फैलाव में समरुप बिछा कर मिट्टी में मिला दें।

खरीफ प्याज की नर्सरी (बीजस्थली) गिरावें। छोटी-छोटी उथली क्यारियों जिसकी चौड़ाई एक मीटर एवं लम्बाई सुविधानुसार रखें। बीज को पंक्तियों में गिरावें। नर्सरी में जल निकास की व्यवस्था रखें। एन0-53, एग्रीफाउण्ड डॉक रेड, अर्का कल्याण, बसवंत-780 खरीफ प्याज के लिए अनुशंसित किस्में है। बीज गिराने के पूर्व बीज को केप्टन या थीरम /2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर बीजोपचार कर लें। बीज की दर 8-10 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेयर रखें। बीज प्रमाणित स्त्रोत से खरीदकर ही लगावें।

गन्ना फसल में अभी गलित शिखा रोग के प्रकोप की संभावना है। इस रोग से लगभग 2.0 से 22.5 प्रतिशत तक एवं उग्र अवस्था में 80 प्रतिशत तक उपज एवं 11.80 से 65.0 प्रतिशत तक की चीनी की मात्रा में कमी हो जाती है, जिससे किसान एवं चीनी मिलों का काफी हद तक नुकसान सहना पड़ता है। बिहार के वातावरण में इस रोग को वृद्धि हेतु तापक्रम 24-28 डिग्री सेल्सियस, नमी 75-85 प्रतिशत एवं 700-1000 मि०मी० वर्षा उपयुक्त पाया गया इस रोग से अक्रांत पौधे के शीर्ष भाग की पत्तिया घुमावदार हो जाती है तथा अक्रांत बिन्दु से पत्तिया टूटकर नीचे झुक जाती है एवं पौधों की वृद्धि विन्दु सड़ जाती है एवं पौधे की बढ़वार रुक जाती है।

गन्ना फसल पर इस रोग का लक्षण दिखाई देने पर कार्बन्डाजीन (फफूंदनाषी) का 0.1 प्रतिशत दवा को 1 लीटर पानी में घोलकर 15 दिनों के अन्तराल पर तीन बार छिड़काव करने से रोग वृद्धि में कमी होती है।

बरसाती सब्जियों जैसे भिंडी, लौकी, नेनुआ, करैला, खीरा की बुआई करें। इस मौसम में मिर्च की खेत में विषाणु रोग (पत्तियों का टेढ़ा-मेढ़ा होना) का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है. इसके बचाव हेतु ग्रसित पौधे को उखाड़ कर जमीन में गाड़ दे तथा इमिडाक्लोप्रिड एक मि०ली० प्रति 3 लीटर पानी की दर से घोल बनाकर आसमान साफ रहने पर छिड़काव करें।

सभी दुधारु पशुओं को गलघोंटू, लंगडी एवं खुरहा विमारियों से वचाव के लिए टिकाकरण अवश्य करा लें। पशुओं को हीट स्ट्रोक/लू से बचाने के लिए स्वच्छ ताजा पानी पूरे दिन दें। चारा दाना सुबह में या शाम में जब धूप नहीं रहता है तव खिलायें। दिन में पशुओं को छायादार स्थान पर रखें। हीट स्ट्रोक लगने पर इटालाइट ओरल, सैकोलाइट-डी आदि दवाए पानी में घोलकर पिलाए।

Exit mobile version