नूर वाली महसूद (Noor Wali Mehsud), जिसे अबू मंसूर आसिम के नाम से भी जाना जाता है, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) का वर्तमान अमीर (नेता) है। टीटीपी, जिसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है, अफगान तालिबान से वैचारिक रूप से जुड़ा हुआ लेकिन अलग संगठन है, जो पाकिस्तान सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ता है। महसूद का जन्म 26 जून 1978 को दक्षिण वजीरिस्तान के तियारजा उप-जिले में एक मेहसूद कबीले के गांव में हुआ था। उन्होंने 1990 के दशक में फैसलाबाद, गुजरांवाला और कराची की विभिन्न मदरसों में धार्मिक शिक्षा प्राप्त की, जहां वे मुफ्ती की उपाधि तक पहुंचे। 1996-97 में वे अफगान तालिबान के साथ अफगान गृहयुद्ध में लड़ने अफगानिस्तान गए, लेकिन बाद में पाकिस्तान लौट आए। 2001 में अमेरिकी हमले के बाद वे फिर अफगानिस्तान गए और तालिबान व अल-कायदा लड़ाकों को पाकिस्तान के आदिवासी क्षेत्रों में शरण दी। 2003 में उन्होंने पाकिस्तानी तालिबान के मेहसूद गुट में शामिल होकर “रक्षात्मक जिहाद” की वकालत की। वे बैतुल्लाह मेहसूद के अधीन काजी (न्यायाधीश) बने और बाद में कराची चैप्टर के प्रमुख व डिप्टी अमीर। 2018 में मौलाना फजलुल्लाह की मौत के बाद टीटीपी का नेतृत्व संभाला। उनके नेतृत्व में टीटीपी ने अपनी ताकत वापस हासिल की, सीमा पार गतिविधियां बढ़ाईं और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर हमले तेज किए।
पाकिस्तान ने अक्टूबर 2025 में महसूद को मारने के लिए कई हवाई हमले किए, खासकर 9 अक्टूबर को काबुल के अब्दुल हक स्क्वायर के पास ड्रोन स्ट्राइक। पाकिस्तान ने दावा किया कि महसूद मारा गया, लेकिन अफगान तालिबान और टीटीपी ने खारिज किया। तालिबान ने कहा कि महसूद न काबुल में था न अफगानिस्तान में, और टीटीपी ने उनकी एक वॉयस नोट जारी की जिसमें उन्होंने खुद को जिंदा बताया। कोई पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन ये हमले टीटीपी के हमलों (जैसे 10 अक्टूबर को खैबर पख्तूनख्वा में 11 सैनिकों की मौत) के जवाब में थे। पाकिस्तान टीटीपी को अफगानिस्तान में शरण मिलने का दोषी मानता है और बार-बार ऐसे हमले करता रहा है।

