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दादी के नेत्रदान की इच्छा पोते ने की पूरी

 राज्यपाल ने दिया सम्मान

 पूर्णिमा। पूर्णिया में नेत्रदान और अंगदान को लेकर लोगों में उत्साह देखा जा रहा है। लोग स्वेच्छा से आगे आकर इस नेक काम में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। इस मुहिम को आगे बढ़ाने में दधिचि देहदान समिति, लायंस क्लब और मारवाड़ी महिला मंच जैसी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। मानव शरीर के अंग मृत्यु के बाद भी जरूरतमंदों के लिए जीवनदान बन सकते हैं। पूर्णिया में कई लोग मरणोपरांत नेत्रदान और अंगदान कर, दूसरों को नई जिंदगी देकर अमर हो गए हैं। खुश्कीबाग की इंदिरा देवी दुग्गड, रामबाग की विभा देवी, और गुलाबबाग की सुरेश सिंघी समेत छह लोगों ने अपना नेत्रदान किया है।
स्वर्गीय इंदिरा देवी दुग्गड के पौत्र अशोक दुग्गड ने बताया कि ‘उनकी दादी की अंतिम इच्छा थी कि उनके नेत्रदान किए जाएं। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए उन लोगों ने दादी के मरणोपरांत उनकी दोनों आंखें दान करा दीं।’ अशोक ने आगे बताया कि उनके परिवार के 12 सदस्यों ने भी नेत्रदान करने का संकल्प लिया है। इसके लिए फॉर्म भी भर दिए हैं। इस नेक कार्य के लिए राज्यपाल ने उन्हें सम्मानित किया है।
लायंस क्लब के सचिव रूपेश डूंगरवाल ने बताया कि मृत्यु के बाद सिर्फ आंखों का कॉर्निया ही निकाला जाता है। एक व्यक्ति के नेत्रदान से तीन लोगों को दृष्टि मिल सकती है। इस तरह आप मरने के बाद भी अमर हो जाएंगे। इसलिए हर व्यक्ति को मारणोप्रांत अपना आंख या अन्य अंगों का दान करना चाहिए। ताकि यह दूसरे व्यक्ति के लिए काम आ सके।
पूर्णिया में आई बैंक की कमी एक बड़ी समस्या है। इस संबंध में राज्यपाल, स्वास्थ्य मंत्री और संबंधित विभाग को पत्र लिखकर जीएमसीएच में आई बैंक स्थापित करने की मांग की गई है। ताकि जो व्यक्ति आंख दान करना चाहता है, उसकी आंख मरणोपरांत दान लिया जा सके।
रूपेश डूंगरवाल ने बताया कि मृत्यु के छह घंटे के अंदर ही कॉर्निया निकालना आवश्यक होता है, क्योंकि 6 घंटा तक ही आंख का कॉर्निया सही रहता है। उसके बाद वह बेकार हो जाता है। पूर्णिया में आई बैंक न होने के कारण कटिहार या दरभंगा से डॉक्टर बुलाने पड़ते हैं। इसलिए पूर्णिया में अगर आई बैंक की स्थापना हो तो लोगों को काफी फायदा होगा।

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