जेल भरो आंदोलन: रेलवे यूनियन नेता शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि निजीकरण लागू हुआ तो रेलवे कर्मचारी बिजली कर्मचारियों के साथ अदालती गिरफ्तारी देंगे। किसान नेता दर्शन पाल और ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के रमानाथ झा ने भी समर्थन दिया।
सरकार का रुख: ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने स्पष्ट किया कि निजीकरण की प्रक्रिया नहीं रुकेगी और सरकार किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार है। उन्होंने दावा किया कि इससे बिजली व्यवस्था बेहतर और पारदर्शी होगी।
एस्मा लागू: हड़ताल की संभावनाओं को देखते हुए सरकार ने पावर कॉरपोरेशन में 6 महीने के लिए एस्मा (आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम) लागू कर दिया है, जिससे कर्मचारी हड़ताल नहीं कर सकते।
सामाजिक प्रतिक्रिया: सोशल मीडिया पर सूर्या समाजवादी और भीम आर्मी जैसे समूहों ने निजीकरण को आरक्षण और सरकारी नौकरियों के लिए खतरा बताया।
हाल की घटनाएँ:
29 मई 2025 को चंदौली में कर्मचारियों ने सांकेतिक धरना-प्रदर्शन किया, लेकिन एस्मा के कारण कार्य बहिष्कार नहीं हुआ।
23 जून 2025 को विरोध और तेज हुआ, जिसमें कर्मचारियों ने निजीकरण को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकारी बिजली सेवा की मिसाल दी।
विश्लेषण: निजीकरण का मुद्दा आर्थिक सुधारों और सामाजिक न्याय के बीच टकराव का प्रतीक बन गया है। कर्मचारी और यूनियनें इसे आरक्षण व रोजगार के खिलाफ मानते हैं, जबकि सरकार इसे वित्तीय बोझ कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए जरूरी बताती है। बिना व्यापक सहमति के यह विवाद और गहरा सकता है।

