प्रोफेसर राजकुमार जैन
सत्यपाल मलिक नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। 2 दिन पहले उनके इंतकाल के बाद आज दिल्ली, के चिन्मय मिशन हाल, लोधी रोड में उनकी यादगार सभा का आयोजन था। शांत, सौम्य, कुछ खोई खोई उनकी धर्मपत्नी प्रोफेसर डॉक्टर इक़बाल मलिक खचाखच भरे हुए हाल में एक साधारण दर्शक के रूप में, श्रद्धांजलि पेश करने आए लोगों की तरह ही लग रही थी। नमस्कार करने पर पहचान लिया, पहचानती भी कैसे नहीं, शादी से पहले सत्यपाल की एक मित्र से लेकर शादी में शामिल होने, तथा समाजवादी शिक्षक मंच की और से आयोजित एक प्रदर्शन में शामिल होने के कारण तिहाड़ जेल में बंदी जीवन के साक्षी रहे व्यक्ति को कैसे भुलाया जा सकता है।
अनेक लोगों ने सोशल मीडिया में सत्यपाल के लिए श्रद्धांजलि लिखी है, परंतु इकबाल जी द्वारा लकीर से हटकर जो मार्मिक, हृदय स्पर्शी लिखा गया उसमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व उभर कर आया, उन्होंने लिखा
“तुमसे ही मैंने समाजवाद सीखा- नारे में नहीं, व्यवहार में। तुम्हारा समाजवाद तुम्हारे चलने में, खाने में, सबसे आखिरी पंक्ति में खड़े होने में था -निर्भीक और निष्कलंक”
अल्हड़पन में सत्यपाल समाजवादी युवजन सभा के सक्रिय कार्यकर्ता बन गए थे। डॉ राममनोहर लोहिया, राजनारायण, मधु लिमए, प्रोफेसर विनय कुमार मिश्रा की शिक्षा, संगत में सोशलिस्ट विचारधारा मैं दीक्षित होकर संघर्ष में जुट गए थे।
परंतु सत्ता पाने के मार्ग की भी अपनी एक अलग गाथा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विघायी राजनीति के द्वार की कुंजी उन दिनों चौधरी चरण सिंह जी की पार्टी ‘भारतीय क्रांति दल’ के हाथ में थी सत्यपाल जैसे तेज तर्रार, सफल वक्ता को चौधरी चरण सिंह जी ने अपने पाले में शामिल कर विधानसभा तथा राज्यसभा में पहुंचा दिया। आगे की सत्ता का मार्ग कांग्रेस फिर जनता दल भाजपा की ओर बढ़ गया, जिसके फल स्वरुप एमपी, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल जैसे पद पर पहुंचते गए।
परंतु वैचारिक घुट्टी, जो दिमाग के डीएनए में घुस जाती है, इसका असर भी अपना दबाव बनाता ही है, वही हुआ। लोहिया की ,’सप्तक्रांति’ के सिद्धांत को पढ़े हुए सत्यपाल ने जिस तरह सत्ता को ललकारा वह सबके सामने है। आदमी बाहरी लोगों को कुछ भी बतला दे, समझा दे, परंतु घर के लोगों ने जो बुनियादी बातें देखी है, सुनी है वह कभी भूलते नहीं। आज इकबाल जी ने केवल और केवल समाजवाद की सीख लिखकर यह स्पष्ट कर दिया।







