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Reservation Hatao आंदोलन को मैथ्स वाले अभिनय सर का समर्थन है या नहीं?    

सोशल मीडिया पर चल रहे ‘रिजर्वेशन हटाओ’ ट्रेंड के बीच शिक्षक अभिनय ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को यह महसूस हो सकता है कि आरक्षण की वजह से उनका चयन नहीं हुआ और उनकी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल उन्हीं की कहानी पूरे भारत की कहानी नहीं है। सोशल मीडिया साइट एक्स पर अभिनय ने लिखा, ‘एक ट्रेंड चल रहा है- ‘रिजर्वेशन हटाओ’. हो सकता है। आपके चार दोस्त हों, जिन्हें लगता हो कि आरक्षण की वजह से उनका चयन नहीं हुआ। उनकी पीड़ा भी वास्तविक है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या सिर्फ उन्हीं चार लोगों की कहानी पूरे भारत की कहानी है?’

उन्होंने अपने ग्रामीण जीवन का अनुभव साझा करते हुए कहा, ‘मैं गांव से आता हूं। मैंने अपनी आंखों से ऐसे परिवार देखे हैं जो इंसानी मल साफ करते थे। ऐसे बच्चे देखे हैं जिन्हें स्कूल में अलग बैठाया जाता था. जिनके छू लेने पर लोग नहाने चले जाते थे। यह कोई सैकड़ों साल पुरानी कहानी नहीं, आज भी बहुत से गांव ऐसे हैं जहां वे समाज के नल से पानी नहीं पी सकते। आज भी उनकी बारात गांव के बीच से नहीं निकल सकती। उन्होंने आगे कहा, ‘सोचिए, जिस समाज ने किसी इंसान को जन्म के आधार पर ही सम्मान से वंचित कर दिया हो, उस मानसिक और सामाजिक दूरी का क्या?’

 

 

आरक्षण व्यवस्था में सुधार की जरूरत-अभिनय

 

अभिनय ने कहा, ‘इसका मतलब यह भी नहीं कि आज का आरक्षण सिस्टम बिल्कुल परफेक्ट है. मैं खुद मानता हूं कि सुधार की जरूरत है.’

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘जैसे सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का आरक्षण आया. जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर और गैर-क्रीमी लेयर का सिद्धांत आया. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में जिन परिवारों की कई पीढ़ियां शिक्षा और अवसरों के माध्यम से आगे बढ़ चुकी हैं, उनके बारे में भी नीति-निर्माण के स्तर पर चर्चा हो सकती है.’

उन्होंने कहा, ‘लेकिन एक बात समझिए. जब राजनीति आज भी जाति पर होती है. जब समाज में आज भी जाति पूछी जाती है. जब सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. तब केवल यह कहना कि ‘आरक्षण पूरी तरह खत्म कर दो और सब कुछ सिर्फ आर्थिक आधार पर कर दो’.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मेरा मानना है कि देश को दो अतियों से बचना होगा. एक- ‘कुछ मत बदलो.’ दूसरी- ‘सब खत्म कर दो.’ सही रास्ता है- सुधार, आंकड़ों के आधार पर नीति और सामाजिक न्याय के साथ समान अवसर.’

उन्होंने कहा, ‘क्योंकि किसी भी नीति का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि एक दिन ऐसी स्थिति तक पहुंचाना होना चाहिए जहां किसी विशेष सहायता की आवश्यकता ही न रह जाए.’

एक अन्य पोस्ट में अभिनय ने कहा, ‘सिर्फ परीक्षा की कट-ऑफ कम या ज़्यादा होना ही आरक्षण नहीं है. कट-ऑफ की चर्चा इतनी इसलिए होती है? क्योंकि छात्र का सीधा सामना उसी से होता है. उसे दिखता है कि- सामान्य वर्ग की कट-ऑफ 160 है, अनुसूचित जाति की 115 है, अन्य पिछड़ा वर्ग की 130 है. इसलिए आपको लगता है कि यही आरक्षण है.’

उन्होंने कहा कि आरक्षण केवल परीक्षा में सीट दिलाने की व्यवस्था नहीं है. इसका उद्देश्य वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना और अवसरों की असमानता को कम करना है.

अभिनय ने कहा, ‘आरक्षण केवल परीक्षा में सीट दिलाने की व्यवस्था नहीं है. इसका उद्देश्य वंचित समुदायों की प्रतिनिधित्व बढ़ाना और अवसरों की असमानता को कम करना है.’

 

‘आरक्षण सिर्फ कटऑफ नहीं…’

उन्होंने आगे बताया कि आरक्षण का दायरा कई क्षेत्रों तक है. इसमें सरकारी शिक्षण संस्थानों में प्रवेश, सरकारी नौकरियों में भर्ती, कुछ परिस्थितियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पदोन्नति, लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों में आरक्षित सीटों के जरिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व, छात्रवृत्ति, छात्रावास, कोचिंग योजनाएं और फीस में रियायत जैसी कई सहायक योजनाएं शामिल हैं.

उन्होंने कहा, ‘संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत इसे केवल गरीबी उन्मूलन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के साधन के रूप में सक्षम बनाया गया है.’

उन्होंने कहा कि क्रीमी लेयर का दायरा, उप-वर्गीकरण, लाभ का समान वितरण, समय-समय पर समीक्षा और न्यूनतम अर्हता अंक जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. उन्होंने कहा, ‘आरक्षण में सुधार की आवश्यकता है. लेकिन आरक्षण की पूरी बहस को केवल कट-ऑफ तक सीमित कर देना, विषय को बहुत छोटा कर देना है.’

उन्होंने कहा, ‘आरक्षण सिर्फ कटऑफ नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक न्याय का पूरा ढांचा है.’

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