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क्या केवल पूजा करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं?

 

कर्म, सत्य और धर्म का वास्तविक अर्थ*
“यदि पूजा के बाद भी मन में छल हो, वाणी में झूठ हो, व्यवहार में बेईमानी हो और जीवन में षड्यंत्र हो, तो क्या ऐसी पूजा भगवान तक पहुँचती है?”
यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों का प्रश्न है। आज समाज में अनेक लोग नियमित रूप से मंदिर जाते हैं, व्रत रखते हैं, दान करते हैं, धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं और घंटों पूजा-पाठ में समय बिताते हैं। लेकिन यदि वही व्यक्ति अपने व्यवहार में झूठ बोलता हो, दूसरों के साथ अन्याय करता हो, बेईमानी करता हो, षड्यंत्र रचता हो, स्वार्थ के लिए लोगों का अहित करता हो, तो क्या उसकी पूजा वास्तव में भगवान को स्वीकार होगी?
यह प्रश्न नया नहीं है। हमारे धर्मग्रंथों, संतों और महापुरुषों ने सदियों पहले इसका उत्तर दिया है। उनका संदेश स्पष्ट है—भगवान को केवल पूजा नहीं, बल्कि शुद्ध मन, सत्यपूर्ण जीवन और निष्काम कर्म प्रिय हैं।
पूजा का वास्तविक उद्देश्य—पूजा का अर्थ केवल दीप जलाना, फूल चढ़ाना या मंत्र पढ़ना नहीं है। पूजा का वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या और छल को समाप्त करना है। यदि वर्षों की पूजा के बाद भी व्यक्ति का स्वभाव नहीं बदलता, तो उसे आत्मचिंतन करना चाहिए कि कहीं पूजा केवल एक बाहरी क्रिया बनकर तो नहीं रह गई। पूजा का सबसे बड़ा परिणाम यह होना चाहिए कि मनुष्य अधिक विनम्र, अधिक सत्यवादी, अधिक दयालु और अधिक न्यायप्रिय बने।
भगवान कर्म देखते हैं, दिखावा नहीं—धार्मिक परंपराओं में बार-बार यह संदेश मिलता है कि भगवान बाहरी आडंबर से अधिक मनुष्य के कर्म और भाव देखते हैं।
यदि कोई व्यक्ति मंदिर में सिर झुकाकर बाहर निकलते ही किसी का अधिकार छीन ले, झूठ बोले, रिश्वत ले, षड्यंत्र करे या किसी का दिल दुखाए, तो उसकी पूजा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। सच्ची भक्ति वही है जो व्यवहार में दिखाई दे।
झूठ और बेईमानी के साथ पूजा—कुछ लोग यह सोच लेते हैं कि दिनभर गलत काम करने के बाद थोड़ी पूजा कर लेने से सब पाप धुल जाएंगे। यह सोच स्वयं धर्म की भावना के विपरीत है।
यदि ऐसा होता, तो संसार में न्याय का कोई अर्थ ही न रह जाता। पूजा पापों का लाइसेंस नहीं है। पूजा तो पापों से दूर रहने की प्रेरणा है। जो व्यक्ति जानबूझकर बेईमानी करता है और फिर पूजा के माध्यम से स्वयं को धार्मिक सिद्ध करना चाहता है, वह वास्तव में स्वयं को ही धोखा देता है।
षड्यंत्र और ईश्वर—षड्यंत्र केवल किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होता, वह सत्य के विरुद्ध भी होता है। जो व्यक्ति दूसरों को गिराकर स्वयं आगे बढ़ना चाहता है, वह चाहे कितनी भी पूजा करे, उसके भीतर की अशांति समाप्त नहीं होती। ईश्वर के न्याय में देर हो सकती है, लेकिन अन्याय स्थायी नहीं होता।
स्वार्थ के लिए पूजा—सबसे गंभीर प्रश्न तब उठता है जब पूजा केवल अपने सुख, धन, पद या व्यक्तिगत लाभ के लिए की जाती है। यदि कोई व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारियों की उपेक्षा करके केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए पूजा में लगा रहे, तो यह संतुलित आध्यात्मिकता नहीं कही जा सकती।
धर्म मनुष्य को परिवार से दूर नहीं करता, बल्कि परिवार के प्रति प्रेम, सेवा और जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है।
यदि पूजा के कारण माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चों या परिवार की भावनाओं की लगातार उपेक्षा होने लगे, तो व्यक्ति को आत्ममंथन करना चाहिए कि कहीं वह धर्म के बाहरी रूप में तो नहीं उलझ गया है।
क्या ऐसे व्यक्ति को अधिक पाप मिलता है? धर्मग्रंथों की भावना यह बताती है कि जितनी अधिक समझ और जिम्मेदारी होती है, उतनी ही अधिक नैतिक जवाबदेही भी होती है। यदि कोई व्यक्ति धर्म का ज्ञान होने के बाद भी जानबूझकर अधर्म करता है, तो उसका दोष अधिक गंभीर माना जाता है क्योंकि वह सही और गलत का अंतर जानते हुए भी गलत मार्ग चुन रहा है। यह कहना कि “उसे निश्चित रूप से दोगुना पाप मिलेगा” किसी मनुष्य के अधिकार क्षेत्र की बात नहीं है। किसे कितना फल मिलेगा, इसका अंतिम निर्णय केवल ईश्वर के न्याय पर निर्भर है। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि *धर्म का दिखावा करते हुए अधर्म करना नैतिक दृष्टि से अधिक गंभीर माना जाता है।परिवार भी ईश्वर की देन है—यदि कोई व्यक्ति घंटों पूजा करे लेकिन अपने माता-पिता से कठोर व्यवहार करे, जीवनसाथी को सम्मान न दे, बच्चों को समय न दे, परिवार के साथ प्रेमपूर्वक न रहे, तो उसकी पूजा अधूरी है।
परिवार की सेवा भी पूजा है।—बीमार माता-पिता की सेवा, जीवनसाथी का सम्मान, बच्चों को संस्कार देना, ईमानदारी से आजीविका कमाना—ये सभी ईश्वर की उपासना के ही रूप हैं।
धर्म का सार—धर्म का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है।
धर्म का अर्थ है— सत्य बोलना। ईमानदारी से कमाना। दूसरों का अधिकार न छीनना। किसी के विरुद्ध षड्यंत्र न करना। परिवार का सम्मान करना। अपने कर्तव्यों का पालन करना। जरूरतमंद की सहायता करना। विनम्र बने रहना। यदि ये गुण जीवन में नहीं हैं, तो केवल पूजा मनुष्य को धार्मिक नहीं बना सकती।
भगवान को क्या प्रिय है? —भगवान को महंगे चढ़ावे से अधिक शुद्ध हृदय प्रिय है। उन्हें ऊँची आवाज़ में मंत्रों से अधिक सत्यप्रिय जीवन प्रिय है। उन्हें लंबे अनुष्ठानों से अधिक दयालु व्यवहार प्रिय है। उन्हें दिखावे से अधिक निष्काम सेवा प्रिय है।
आत्मचिंतन की आवश्यकता— हर व्यक्ति को स्वयं से कुछ प्रश्न पूछने चाहिए— क्या मेरी पूजा ने मुझे बेहतर इंसान बनाया? क्या मेरे परिवार को मेरे व्यवहार से प्रेम और सम्मान मिलता है? क्या मैं सच बोलता हूँ? क्या मैं ईमानदारी से कमाता हूँ? क्या मैं किसी के विरुद्ध छल या षड्यंत्र करता हूँ? क्या मेरी भक्ति से दूसरों का जीवन सुखी हो रहा है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक नहीं हैं, तो पूजा की पद्धति बदलने से पहले स्वयं को बदलने की आवश्यकता है।
भगवान को धोखा नहीं दिया जा सकता। मनुष्य समाज के सामने धार्मिक होने का अभिनय कर सकता है, लेकिन ईश्वर के सामने नहीं। सच्ची पूजा मंदिर में आरंभ होती है, पर उसका प्रमाण घर, परिवार, कार्यस्थल और समाज में दिखाई देता है। यदि पूजा के साथ सत्य, ईमानदारी, करुणा और कर्तव्य जुड़े हैं, तो वह पूजा जीवन को प्रकाश देती है। लेकिन यदि पूजा केवल स्वार्थ, दिखावा या गलत कर्मों को छिपाने का साधन बन जाए, तो उसका आध्यात्मिक मूल्य समाप्त हो जाता है। इसलिए हमें केवल पूजा करने वाला नहीं, बल्कि पूजा के अनुरूप जीवन जीने वाला मनुष्य बनने का प्रयास करना चाहिए। यही धर्म का सार है, यही सच्ची भक्ति है और यही ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है।

– ऊषा शुक्ला

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