रूल 66 क्या है?
लोकसभा के Rules of Procedure and Conduct of Business में Rule 66 एक तकनीकी प्रावधान है। यह तब लागू होता है जब कोई विधेयक दूसरे विधेयक पर पूरी तरह निर्भर (dependent) हो।अगर मुख्य विधेयक (जिस पर दूसरा निर्भर है) पास नहीं होता, तो निर्भर विधेयक भी बेकार (infructuous) हो जाता है।
सरकार ने 16 अप्रैल 2026 को संसद के विशेष सत्र में Rule 66 के प्रावधान को निलंबित (suspend) करने का प्रस्ताव रखा, ताकि महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन (delimitation) बिल को एक साथ पास किया जा सके, बिना एक-दूसरे पर निर्भरता की अड़चन के।
सरकार का तर्क: इससे प्रक्रिया तेज होगी, महिलाओं को 33% आरक्षण जल्द मिल सकेगा, और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर (लगभग 815-850 तक) आरक्षण लागू करना आसान होगा।
महिला आरक्षण कानून की मूल कहानी (2023 से अब तक)
सितंबर 2023: संसद के विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान का 106वां संशोधन) पारित हुआ। इसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान है (SC/ST महिलाओं के लिए भी सब-कोटा)।
लेकिन यह कानून तुरंत लागू नहीं हुआ। मूल प्रावधान के अनुसार, यह जनगणना और उसके बाद परिसीमन (सीटों की नई सीमा तय करना) के बाद लागू होता — यानी 2029 या उसके बाद।
आरक्षण रोटेशन पर आधारित होगा (हर चुनाव में अलग-अलग सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित) और 15 साल तक चलेगा (बाद में बढ़ाया जा सकता है)।
अब 2026 में सरकार ने संविधान संशोधन (131वां संशोधन बिल आदि) लाकर इसे 2029 लोकसभा चुनाव से लागू करने की कोशिश की, साथ में परिसीमन बिल भी।
अचानक लागू करने की घटना (16 अप्रैल 2026)
संसद में बहस चल रही थी।
कानून मंत्रालय ने आधी रात (या शाम/रात में) अधिसूचना जारी कर दी कि 2023 का मूल कानून 16 अप्रैल 2026 से लागू माना जाएगा।
यह Rule 66 निलंबन के बाद हुआ, ताकि अगर नया संशोधन पास न भी हो, तो मूल 2023 कानून बचा रहे।
सरकार का पक्ष: यह तकनीकी कदम है, महिलाओं को अधिकार देने के लिए। पीएम मोदी ने इसे नारी शक्ति का वंदन बताया।
विपक्ष का आरोप: दांव उल्टा पड़ गया?
विपक्ष (कांग्रेस, INDIA गठबंधन आदि) कह रहा है कि:
यह “desperate attempt” है। सरकार को लगता है कि नये संशोधन बिल पास होने में मुश्किल है (संख्या बल या विरोध के कारण), इसलिए पुराने कानून को अधिसूचना से “बचा” लिया।
असल मकसद महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन के जरिए लोकसभा सीटें बढ़ाना और राजनीतिक फायदा (जैसे उत्तरी राज्यों में ज्यादा सीटें) है। विपक्ष इसे “power grab” या gerrymandering बता रहा है।
Rule 66 निलंबन को चक्रव्यूह कह रहे हैं, लेकिन अधिसूचना से सरकार खुद फंस गई — क्योंकि बहस अधूरी है और कानून लागू हो गया, लेकिन आरक्षण अभी लागू नहीं हो सकता (वर्तमान सदन में नहीं)।
कुछ विपक्षी नेता कह रहे हैं कि 2023 कानून पहले से संविधान का हिस्सा है, लेकिन लागू करने के लिए परिसीमन जरूरी था। अचानक अधिसूचना से प्रक्रिया उलझ गई।
असली कहानी का सार
महिला आरक्षण लंबे समय से लंबित मुद्दा था (1996 से प्रयास)। 2023 में सर्वसम्मति से पास हुआ — इसमें सभी दलों का योगदान है।
अचानक कदम (2026 विशेष सत्र + Rule 66 सस्पेंशन + अधिसूचना) सरकार की रणनीति लगती है कि आरक्षण को 2029 चुनाव से जोड़कर तेजी लाई जाए, लेकिन विपक्ष इसे परिसीमन के बहाने सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश बता रहा है।
उल्टा पड़ने का मतलब: सरकार ने Rule 66 निलंबन से “सुरक्षा कवच” बनाया, लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक खेल बताकर हमला बोल दिया। बहस अभी जारी है, और आरक्षण का असली लागू होना अभी परिसीमन पर निर्भर है।
यह मुद्दा महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का है, लेकिन संसदीय प्रक्रिया, संघीय संतुलन (उत्तर vs दक्षिण राज्य) और राजनीतिक गणित से जुड़ गया है। असली फायदा महिलाओं को तभी होगा जब सीटें आरक्षित होकर चुनाव में उतरेंगी।

