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क्या डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सनातन धर्म की उस अवधारणा को स्वीकार किया था जिसका दावा रूढ़िवादी हिन्दू करते हैं?

एस आर दारापुरी 

 

आधुनिक भारत के बौद्धिक इतिहास में डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के सनातन धर्म संबंधी विचारों पर जितनी व्यापक बहस हुई है, उतनी कम ही विषयों पर हुई है। समकालीन सार्वजनिक विमर्श में एक ओर यह दावा किया जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ने सनातन धर्म को स्वीकार किया था क्योंकि उन्होंने हिन्दू दर्शन के कुछ नैतिक सिद्धांतों की सराहना की थी। दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि उन्होंने सनातन धर्म को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया था। किंतु डॉ. अम्बेडकर के मूल लेखन का सावधानीपूर्वक अध्ययन करने पर एक अधिक संतुलित और ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित निष्कर्ष सामने आता है। उन्होंने उस सनातन धर्म को स्वीकार नहीं किया जिसे उनके समय के रूढ़िवादी हिन्दू विद्वान और धर्मशास्त्री प्रतिपादित करते थे। उनकी आलोचना का मुख्य लक्ष्य सनातन धर्म की वह ब्राह्मणवादी व्याख्या थी, जो जाति-व्यवस्था, जन्म-आधारित असमानता, अस्पृश्यता तथा हिन्दू धर्मग्रंथों की निर्विवाद सर्वोच्चता को धार्मिक वैधता प्रदान करती थी। साथ ही, अम्बेडकर ने धर्म को नैतिकता का स्रोत और सामाजिक दमन के साधन के रूप में स्पष्ट रूप से अलग-अलग माना। इसलिए उनका विरोध आध्यात्मिकता या धर्म से नहीं, बल्कि उस धार्मिक व्यवस्था से था जो उनके अनुसार सामाजिक अन्याय को स्थायी बनाती थी।

 

सनातन धर्म की रूढ़िवादी हिन्दू अवधारणा

 

सनातन धर्म का शाब्दिक अर्थ है—”शाश्वत धर्म” या “सनातन नियम”। परंपरागत रूप से अनेक हिन्दू इसे उस शाश्वत नैतिक एवं आध्यात्मिक व्यवस्था के रूप में देखते हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि और मानव जीवन का संचालन करती है। रूढ़िवादी व्याख्याओं में यह वेदों, स्मृतियों, धर्मशास्त्रों तथा उनसे निर्मित वर्णाश्रम व्यवस्था की धार्मिक वैधता से जुड़ा हुआ माना गया है।

यद्यपि आधुनिक काल में अनेक हिन्दू दार्शनिक और सुधारवादी विचारक सनातन धर्म को सत्य, करुणा, अहिंसा, आत्मसंयम और आत्मबोध जैसे सार्वभौमिक नैतिक मूल्यों का पर्याय मानते हैं, डॉ. अम्बेडकर की आलोचना मुख्यतः उस ऐतिहासिक सामाजिक व्यवस्था की ओर निर्देशित थी जिसमें सनातन धर्म का उपयोग जाति-व्यवस्था और सामाजिक असमानता को उचित ठहराने के लिए किया जाता था।

 

अम्बेडकर द्वारा सनातन धर्म की आलोचना

 

डॉ. अम्बेडकर का मत था कि व्यवहार में प्रचलित हिन्दू धर्म जाति-व्यवस्था से अविभाज्य हो चुका था। उनके अनुसार सनातन धर्म के नाम पर पाँच प्रमुख संस्थाओं को धार्मिक वैधता प्रदान की गई थी— वर्ण व्यवस्था, जाति (जाति-प्रथा), वंशानुगत व्यवसाय, अस्पृश्यता, तथा शास्त्रों की सर्वोच्चता।

अम्बेडकर का तर्क था कि इन व्यवस्थाओं को केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि ईश्वर-प्रदत्त और शाश्वत व्यवस्था माना गया। परिणामस्वरूप इनके विरुद्ध सुधार का कोई भी प्रयास धर्म-विरोधी घोषित कर दिया जाता था।

अपनी प्रसिद्ध कृति जाति का विनाश (Annihilation of Caste) में उन्होंने लिखा— “जो धर्म अपने अनुयायियों के बीच भेदभाव करता है, जो एक वर्ग को विशेषाधिकार देता है और दूसरे वर्ग पर निर्योग्यताएँ थोपता है, वह धर्म नहीं है।” इसी ग्रंथ में उन्होंने आगे लिखा— “आप जाति की नींव पर न राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं, न नैतिकता का और न ही लोकतंत्र का।”

ये कथन स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि अम्बेडकर ने जाति को धार्मिक आधार प्रदान करने वाली सनातन धर्म की रूढ़िवादी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया था।

‘सनातन’ या ‘शाश्वत’ होने के दावे का खंडन

डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि कोई भी सामाजिक व्यवस्था शाश्वत नहीं हो सकती। समाज निरंतर परिवर्तनशील है और उसकी संस्थाओं का मूल्यांकन उनके नैतिक परिणामों के आधार पर होना चाहिए, न कि उनकी प्राचीनता के आधार पर।

उनके अनुसार यदि जाति और सामाजिक असमानता को “सनातन” घोषित कर दिया जाए, तो सामाजिक सुधार की सारी संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं। इसलिए उन्होंने जन्म-आधारित ऊँच-नीच को किसी भी प्रकार की शाश्वत या दैवी व्यवस्था मानने से स्पष्ट इनकार किया।

धर्मग्रंथों की सर्वोच्चता की आलोचना

डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि उनमें विभिन्न जातियों के लिए अलग-अलग अधिकार, कर्तव्य और दंड निर्धारित किए गए हैं। उनके अनुसार इन ग्रंथों ने “क्रमबद्ध असमानता” (Graded Inequality) को संस्थागत रूप दिया।

1927 में महाड़ में मनुस्मृति का सार्वजनिक दहन इसी वैचारिक असहमति का प्रतीक था। उनका उद्देश्य किसी पुस्तक का अपमान करना नहीं था, बल्कि उस सामाजिक दर्शन का प्रतिरोध करना था जो जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा और अधिकारों का निर्धारण करता था।

धर्म : नैतिकता का आधार, सामाजिक नियंत्रण का नहीं

यद्यपि अम्बेडकर ने रूढ़िवादी हिन्दू धर्म की कठोर आलोचना की, उन्होंने धर्म की अवधारणा को अस्वीकार नहीं किया।

उनका विश्वास था कि धर्म का उद्देश्य मनुष्य के नैतिक विकास में सहायक होना चाहिए, न कि उसे जन्म-आधारित बंधनों में जकड़ना। उन्होंने स्पष्ट लिखा— “धर्म मुख्यतः सिद्धांतों का विषय होना चाहिए, नियमों का नहीं।”

उनकी दृष्टि में सच्चा धर्म वही है जो न्याय, करुणा, विवेक, समानता और मानव गरिमा को बढ़ावा दे। कोई भी धर्म यदि मनुष्यों के बीच भेदभाव को वैध ठहराता है, तो वह अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाता है।

क्या अम्बेडकर ने सनातन धर्म के प्रत्येक अर्थ को अस्वीकार किया?

इस प्रश्न का उत्तर सावधानीपूर्वक देना आवश्यक है।

डॉ. अम्बेडकर ने “सनातन धर्म” की प्रत्येक दार्शनिक व्याख्या का अलग-अलग विश्लेषण नहीं किया। आज अनेक हिन्दू विद्वान सनातन धर्म को सत्य, अहिंसा, करुणा और आत्मज्ञान पर आधारित सार्वभौमिक नैतिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अम्बेडकर ने इस अमूर्त दार्शनिक अवधारणा पर विस्तृत चर्चा नहीं की।

उनकी आलोचना उस ऐतिहासिक वास्तविकता की थी जिसमें सनातन धर्म का प्रयोग जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता और जन्म-आधारित असमानता को धार्मिक आधार प्रदान करने के लिए किया जाता था।

इसलिए यह कहना कि अम्बेडकर ने रूढ़िवादी हिन्दू अवधारणा के अनुसार सनातन धर्म को स्वीकार किया था, ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत होगा। साथ ही यह कहना भी उचित नहीं होगा कि उन्होंने सनातन धर्म की प्रत्येक संभावित दार्शनिक व्याख्या का पृथक-पृथक खंडन किया था। उनका लक्ष्य मुख्यतः उस सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की आलोचना करना था जो व्यवहार में विद्यमान थी।

बौद्ध धर्म को स्वीकार करना

डॉ. अम्बेडकर अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि रूढ़िवादी हिन्दू धर्म के भीतर रहते हुए जाति-व्यवस्था का उन्मूलन संभव नहीं है।

1935 के येवला सम्मेलन में उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की— “मैं हिन्दू के रूप में जन्मा हूँ, परन्तु हिन्दू के रूप में मरूँगा नहीं।” 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया।

उनके द्वारा प्रतिपादित नवयान बौद्ध धर्म विवेक, करुणा, समानता, नैतिकता और सामाजिक न्याय पर आधारित था। उनके अनुसार यही धर्म लोकतंत्र और भारतीय संविधान के मूल्यों—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—के साथ पूर्णतः संगत है।

समकालीन प्रासंगिकता

डॉ. अम्बेडकर की सनातन धर्म संबंधी आलोचना आज भी भारतीय समाज में धर्म, जाति, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता पर होने वाली बहसों का एक महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है। अम्बेडकरवादी विद्वानों का मत है कि जब तक जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाते, तब तक उनकी आलोचना की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

दूसरी ओर अनेक हिन्दू विद्वान यह तर्क देते हैं कि सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप जाति-व्यवस्था नहीं, बल्कि सार्वभौमिक नैतिकता, आध्यात्मिकता और आत्मोन्नति है, तथा जाति-प्रथा उसकी मूल शिक्षा नहीं बल्कि ऐतिहासिक विकृति है। यह मतभेद दर्शाता है कि आधुनिक भारत में सनातन धर्म की अवधारणा अब भी गहन वैचारिक विमर्श का विषय बनी हुई है।

निष्कर्ष

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के मूल लेखन का गंभीर अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने उस सनातन धर्म को स्वीकार नहीं किया जिसे उनके समय के रूढ़िवादी हिन्दू जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता और जन्म-आधारित विशेषाधिकारों की धार्मिक वैधता के रूप में प्रस्तुत करते थे। उन्होंने ऐसी किसी भी धार्मिक व्यवस्था को अस्वीकार किया जो मनुष्य की समान गरिमा और स्वतंत्रता का निषेध करती हो।

साथ ही, उन्होंने धर्म का पूर्ण निषेध नहीं किया। उनका मानना था कि धर्म का आधार नैतिकता, विवेक, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और मानव गरिमा होना चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म को अपनाया, जिसे वे इन आदर्शों की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति मानते थे।

अतः डॉ. अम्बेडकर की स्थिति को धर्म-विरोध के रूप में नहीं, बल्कि उस धार्मिक विचारधारा के विरोध के रूप में समझना चाहिए जो सामाजिक असमानता को पवित्र और शाश्वत घोषित करती है। उनका चिंतन आज भी भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है।

 

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