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दिल्ली पुलिस: कानून-प्रवर्तन एजेंसी या जवाबदेही से परे सत्ता-केंद्र?

एस आर दारापुरी  

पुलिस को व्यक्ति के संबंध में राज्य की सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली शक्तियों में से कुछ सौंपी जाती हैं—किसी व्यक्ति को रोकने, तलाशी लेने, हिरासत में लेने, गिरफ्तार करने, पूछताछ करने और कानून द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में शारीरिक बल प्रयोग करने की शक्ति। संवैधानिक लोकतंत्र में इस शक्ति के साथ उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी जुड़ी होती है—पुलिस स्वयं कानून, न्यायिक निगरानी और संस्थागत जवाबदेही के अधीन रहे।

3 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों के साथ यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के दिल्ली पुलिसकर्मियों पर लगे हालिया आरोप इसलिए केवल इस प्रश्न तक सीमित नहीं हैं कि कुछ पुलिस अधिकारियों ने कथित रूप से अनुचित व्यवहार किया या नहीं। वे इससे कहीं अधिक गंभीर प्रश्न उठाते हैं: क्या पुलिस शक्ति को नियंत्रित करने वाली संस्थागत सुरक्षा-व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह अधिकार को दण्डहीनता में बदलने से रोक सके? तीन महिला पत्रकारों ने प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए; इनमें से एक ने एसीपी विवेक भगत पर यौन हमले का आरोप लगाया। दिल्ली पुलिस ने शिकायतों को जांच के लिए अपराध शाखा को सौंप दिया है। ये अभी आरोप हैं और इनका निर्धारण विधि-सम्मत प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए।

इससे पहले भी 20 जुलाई को जंतर मंतर पर काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में दिल्ली पुलिस के एक उच्च अधिकारी पर एक महिला को अकारण थप्पड़ मरने, एक इंस्पेक्टर द्वारा एक महिला के पिछवाड़े में डंडा खोंसने तथा एक अन्य कर्मचारी द्वारा एक महिला प्रदर्शनकारी का बैड टच करने के आरोप लगे थे। परंतु हैरानी की बात यह है उन अधिकारियों के विरुद्ध आज तक कोई भी जांच अथवा दंड देने की जानकारी प्राप्त नहीं हुई है जबकि सुप्रीम कोर्ट रिट पिटीशन संo 280/2026 शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी बनाम यूनियन आफ इंडिया ने अपने आदेश पैरा 23. स्पष्ट कहा था कि कि हमारे द्वारा HPEC के गठन से पुलिस अधिकारियों या अन्य सुरक्षा बलों को अपने ऐसे अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से किसी भी तरह से रोका या मना नहीं किया जाएगा, जो अपने आचरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन करते पाए जाते हैं। इससे ऐसे अधिकारियों का मनोबल बढ़ना स्वाभाविक है जिसका परिणाम 3 अक्तूबर को सामने आया है।

ऐसे आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना न तो तथ्यात्मक रूप से उचित होगा और न ही बौद्धिक रूप से बचाव योग्य कि पूरी दिल्ली पुलिस “उपद्रवियों और छेड़छाड़ करने वालों का गिरोह” बन गई है। पुलिस संगठन में हजारों कर्मचारी होते हैं, जो अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हैं; कुछ अधिकारियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को स्वतः पूरे संगठन के सामूहिक अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता।

लेकिन इसका विपरीत रवैया भी उतना ही खतरनाक है: प्रत्येक आरोप को केवल किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत कदाचार के रूप में देखना और उन संस्थागत परिस्थितियों की अनदेखी करना, जो यह तय करती हैं कि पीड़ित शिकायत कर सकता है या नहीं, साक्ष्य सुरक्षित रहेंगे या नहीं, जांच वास्तव में स्वतंत्र होगी या नहीं और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों को वास्तविक परिणामों का सामना करना पड़ेगा या नहीं।

इसलिए इस निबंध की केंद्रीय थीसिस यह है:

संवैधानिक खतरा यह नहीं है कि दिल्ली पुलिस में हर व्यक्ति “उपद्रवी या छेड़छाड़ करने वाला” है; वास्तविक खतरा यह है कि कोई भी पुलिस संस्था तब जवाबदेही से परे सत्ता-केंद्र बन सकती है, जब उसके अधिकारियों के पास मौजूद दमनकारी और बल-प्रयोग की शक्ति को नियंत्रित करने, उसके दुरुपयोग की स्वतंत्र जांच करने तथा दोषियों को दंडित करने वाले तंत्र कमजोर पड़ जाएं। विशेष रूप से तब, जब आरोपी स्वयं पुलिस अधिकारी हों, तो बार-बार सामने आने वाले दुर्व्यवहार के आरोपों को केवल व्यक्तिगत कदाचार के प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही की कसौटी के रूप में जांचा जाना चाहिए।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस कदाचार और पुलिस दण्डहीनता दो अलग-अलग समस्याएं हैं। कदाचार का संबंध इस बात से है कि किसी अधिकारी ने कथित रूप से क्या किया। दण्डहीनता का संबंध इस बात से है कि उस आचरण के आरोप लगने के बाद संस्था क्या करती है—या क्या करने में विफल रहती है।

कोई एक अधिकारी अपराध कर सकता है, लेकिन इससे अपने आप पूरी संस्था के भ्रष्ट होने का प्रमाण नहीं मिलता। दूसरी ओर, किसी संस्था में व्यवस्थित जवाबदेही की विफलता हो सकती है, भले ही उसके अधिकांश अधिकारी पेशेवर और कानूनसम्मत तरीके से अपना काम कर रहे हों।

इसलिए निर्णायक प्रश्न केवल यह नहीं है कि: “क्या किसी पुलिस अधिकारी ने दुर्व्यवहार किया?”

बल्कि अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है:

जब राज्य की शक्ति के दुरुपयोग का आरोपी व्यक्ति स्वयं राज्य का एजेंट हो, तो उसे जवाबदेह ठहराने की शक्ति, स्वतंत्रता और संस्थागत अधिकार किसके पास है?

दिल्ली पुलिस का मूल्यांकन इसी प्रश्न के आधार पर किया जाना चाहिए—राजनीतिक या भावनात्मक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकारों; गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित सुरक्षा उपायों; जांच की स्वतंत्रता; महिलाओं और पत्रकारों के साथ व्यवहार; तथा पुलिस दण्डहीनता को रोकने वाली संस्थागत व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता के आधार पर।

संवैधानिक लोकतंत्र को कमजोर पुलिस बल की आवश्यकता नहीं है। उसे ऐसी सशक्त पुलिस की आवश्यकता है जो स्वयं कानून के अधीन होने को प्रदर्शित रूप से स्वीकार करे। पुलिस को जितनी अधिक बलपूर्वक और दमनकारी शक्ति सौंपी जाती है, उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए सुरक्षा-तंत्र भी उतना ही मजबूत होना चाहिए।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि दिल्ली पुलिस “अच्छी” है या “बुरी”। मूल प्रश्न यह है कि क्या उसकी संस्थागत संरचना सत्ता के दुरुपयोग को कठिन, उसका पता लगाना विश्वसनीय, जांच को स्वतंत्र और जवाबदेही को अपरिहार्य बनाती है। यही वह कसौटी है जिसके आधार पर किसी लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

 

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