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भारत में हिरासत में मौतें: कारण, परिस्थितियाँ और पुलिस तथा जेल सुधार की अनिवार्यता

एस आर दारापुरी
पुलिस या न्यायिक हिरासत में किसी व्यक्ति की मृत्यु संवैधानिक लोकतंत्र में होने वाली सबसे गंभीर घटनाओं में से एक है। जब राज्य किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करता है या उसे जेल में बंद करता है, तो वह उसके आवागमन और स्वतंत्रता पर नियंत्रण स्थापित करता है। इस नियंत्रण के साथ उस व्यक्ति के जीवन, शारीरिक सुरक्षा और गरिमा की रक्षा की विशेष जिम्मेदारी भी राज्य पर आ जाती है। कोई व्यक्ति अभियुक्त हो, विचाराधीन बंदी हो या दोषसिद्ध कैदी—हिरासत में जाने के बाद उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

इसलिए हिरासत में मृत्यु केवल एक चिकित्सकीय घटना या दुर्भाग्यपूर्ण प्रशासनिक घटना नहीं है। यह राज्य की शक्ति के प्रयोग, पुलिस की कार्यप्रणाली, जेल प्रशासन, जवाबदेही और कानून के शासन से जुड़े बुनियादी प्रश्न उठाती है। महत्वपूर्ण प्रश्न हैं—व्यक्ति की मृत्यु कैसे हुई? मृत्यु से पहले क्या परिस्थितियाँ थीं? क्या यातना, अत्यधिक बल प्रयोग, लापरवाही या चिकित्सा सुविधा से वंचित करने की स्थिति थी? क्या अधिकारियों ने घटना के बारे में सही जानकारी दी? क्या जाँच स्वतंत्र थी? और भविष्य में ऐसी मौतों को रोकने के लिए संस्थागत स्तर पर क्या सुधार आवश्यक हैं?

हिरासत में होने वाली मौतों की निरंतरता यह दर्शाती है कि भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में अभी भी जवाबदेही का गंभीर अभाव है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) पुलिस और न्यायिक हिरासत दोनों में होने वाली मौतों की नियमित रूप से जाँच करता रहा है और उसने इनके संबंध में सूचना देने, जाँच, पोस्टमार्टम तथा मजिस्ट्रेटी जाँच के लिए विस्तृत दिशानिर्देश बनाए हैं। इसलिए हिरासत में मौत को केवल किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत कदाचार के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक संस्थागत समस्या के रूप में समझना आवश्यक है।

 

 

हिरासत में मौत की परिस्थितियाँ

 

 

रासत में होने वाली मौतों का कोई एक कारण नहीं होता। किसी व्यक्ति की मृत्यु पहले से मौजूद बीमारी, अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा, आत्महत्या, दुर्घटना, किसी अन्य कैदी द्वारा हिंसा, अत्यधिक बल प्रयोग, यातना अथवा जानबूझकर की गई हत्या के कारण हो सकती है। इसलिए यह मान लेना उचित नहीं है कि हर हिरासत में हुई मौत हत्या या यातना का परिणाम है। लेकिन इसके विपरीत, अधिकारियों द्वारा दिए गए प्रारंभिक स्पष्टीकरण—जैसे बीमारी, आत्महत्या या प्राकृतिक मृत्यु—को स्वतंत्र जाँच के बिना स्वीकार कर लेना भी उतना ही अनुचित है।

पुलिस हिरासत में विशेष रूप से निम्न परिस्थितियों की गहन जाँच आवश्यक है—पूछताछ के दौरान मारपीट, अवैध हिरासत, लंबे समय तक पूछताछ, जबरन बयान या स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के प्रयास, अत्यधिक बल प्रयोग तथा चिकित्सा सुविधा देने में देरी या उससे इनकार।

समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब किसी व्यक्ति को औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने से पहले ही अनौपचारिक रूप से हिरासत में रखा जाता है। ऐसी अनौपचारिक हिरासत जवाबदेही की गंभीर कमी पैदा करती है। परिवार, न्यायालय या स्वतंत्र जाँचकर्ता के लिए यह पता लगाना कठिन हो जाता है कि व्यक्ति कहाँ था, किस अधिकारी की निगरानी में था, उससे क्या व्यवहार किया गया और चोटें कब लगीं।

 

 

न्यायिक हिरासत और चिकित्सा सुविधा की समस्या

 

 

न्यायिक हिरासत में स्थिति कुछ अलग लेकिन उतनी ही गंभीर है। जेलों में विचाराधीन बंदियों और सजायाफ्ता कैदियों की बड़ी संख्या होती है। इनमें अनेक लोग पहले से गंभीर बीमारियों, संक्रामक रोगों, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या अन्य शारीरिक कठिनाइयों से पीड़ित हो सकते हैं। यदि जेल में प्रवेश के समय पर्याप्त चिकित्सकीय परीक्षण न हो या पहले से चल रहे उपचार में बाधा उत्पन्न हो, तो सामान्यतः नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी भी घातक बन सकती है।

राज्य का दायित्व है कि वह कैदियों को पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराए। जेल की सजा का अर्थ स्वतंत्रता से वंचित होना है, स्वास्थ्य सुविधा या मानवीय गरिमा से नहीं।

इसलिए हिरासत में मृत्यु की जाँच केवल तत्काल चिकित्सकीय कारण तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि—

जेल में प्रवेश के समय कैदी का स्वास्थ्य परीक्षण हुआ या नहीं;
बीमारी का रिकॉर्ड बनाया गया या नहीं;
आवश्यक दवाएँ उपलब्ध कराई गईं या नहीं;
चिकित्सकीय परामर्श दिया गया या नहीं;
विशेषज्ञ चिकित्सा की आवश्यकता होने पर उसे उपलब्ध कराया गया या नहीं;
अस्पताल ले जाने में देरी हुई या नहीं;
आपात स्थिति में जेल प्रशासन ने उचित कार्रवाई की या नहीं।
चिकित्सकीय लापरवाही और उपचार में देरी

हिरासत में होने वाली मौतों का एक कम दिखाई देने वाला कारण अपर्याप्त या विलंबित चिकित्सा उपचार है। प्रत्येक व्यक्ति के जेल में प्रवेश के समय उचित चिकित्सकीय परीक्षण होना चाहिए। उसकी पूर्व बीमारियों का रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए, दवाओं की निरंतरता सुनिश्चित की जानी चाहिए और विशेषज्ञ उपचार की आवश्यकता होने पर उसे उचित अस्पताल में समय पर भेजा जाना चाहिए।

यदि कोई बंदी सीने में दर्द, साँस लेने में कठिनाई, गंभीर चोट, तंत्रिका संबंधी लक्षण, मानसिक संकट या अन्य गंभीर लक्षणों की शिकायत करता है, तो जेल प्रशासन उसे मामूली शिकायत मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकता। उपचार में देरी किसी उपचार योग्य बीमारी को भी जानलेवा बना सकती है।

इसलिए हिरासत में मृत्यु की जाँच में व्यक्ति के पूरे चिकित्सा इतिहास की समीक्षा होनी चाहिए—प्रारंभिक चिकित्सकीय परीक्षण, बंदी द्वारा की गई शिकायतें, दी गई दवाएँ, चिकित्सकीय परामर्श, अस्पताल भेजने के निर्णय और आपातकालीन उपचार आदि।

 

 

हिरासत में हिंसा और यातना

 

हिरासत में होने वाली मौतों की सबसे गंभीर श्रेणी वह है जिसमें यातना या गैर-कानूनी हिंसा की आशंका हो।

अपराध की जाँच के दौरान कुछ पुलिसकर्मी शारीरिक दबाव को पूछताछ का प्रभावी तरीका मान सकते हैं। विशेष रूप से अपराधों को शीघ्र सुलझाने या स्वीकारोक्ति प्राप्त करने के दबाव में ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित हो सकती हैं। यह सोच मौलिक रूप से गलत है। हिंसा से प्राप्त स्वीकारोक्ति आधुनिक वैज्ञानिक जाँच का विकल्प नहीं हो सकती।

आधुनिक पुलिस जाँच को फोरेंसिक विज्ञान, डीएनए, फिंगरप्रिंट, डिजिटल साक्ष्य, वित्तीय जाँच, अपराध-स्थल विश्लेषण और वैज्ञानिक पूछताछ पर आधारित होना चाहिए।

हिरासत में यातना केवल व्यक्तिगत अनुशासनहीनता का परिणाम नहीं है। यह अक्सर ऐसी संस्थागत संस्कृति का परिणाम होती है जिसमें पुलिस की सफलता को गिरफ्तारी, बरामदगी या स्वीकारोक्ति की संख्या से मापा जाता है, न कि जाँच की गुणवत्ता और वैधानिकता से।

 

 

दण्डहीनता की संस्कृति

 

 

हिरासत में मृत्यु से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या दण्डहीनता की संभावना है।

जिस संस्था के पास मृत व्यक्ति की हिरासत थी, वही संस्था प्रारंभिक रूप से मृत्यु का विवरण, हिरासत के रिकॉर्ड, पुलिस डायरी, सीसीटीवी फुटेज, चिकित्सकीय रिकॉर्ड और संभावित गवाहों को नियंत्रित कर सकती है। यदि उसी संस्था को मृत्यु की जाँच की भी जिम्मेदारी दे दी जाए, तो हितों का स्पष्ट टकराव उत्पन्न होता है।

इसलिए हिरासत में मृत्यु की जाँच स्वतंत्र, निष्पक्ष, त्वरित और पारदर्शी होनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य तथा नीलबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य जैसे मामलों में हिरासत में हिंसा और मृत्यु को गंभीर संवैधानिक उल्लंघन माना है। डी.के. बसु मामले में गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश दिए गए। नीलबती बेहरा मामले में न्यायालय ने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सार्वजनिक विधि के अंतर्गत मुआवजे की व्यवस्था को स्वीकार किया।

 

 

इन निर्णयों का मूल संदेश स्पष्ट है:

 

हिरासत में जाने से व्यक्ति के अधिकार कम नहीं होते; बल्कि राज्य की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।

 

स्वतंत्र पोस्टमार्टम का महत्व

 

 

हिरासत में होने वाली प्रत्येक मृत्यु में उचित मेडिको-लीगल पोस्टमार्टम अत्यंत आवश्यक है। इसे महज प्रशासनिक औपचारिकता नहीं माना जाना चाहिए।

पोस्टमार्टम में प्रत्येक बाहरी चोट का विवरण दर्ज किया जाना चाहिए, चाहे वह छोटी ही क्यों न दिखाई दे। आवश्यकता के अनुसार आंतरिक परीक्षण भी किया जाना चाहिए। शरीर पर पड़े चोट के निशान, सूजन, खरोंच, फटने के निशान, रस्सी या बंधन के निशान, जलने के निशान तथा सिर, गर्दन, पीठ और अंगों पर लगी चोटों को सावधानी से दर्ज किया जाना चाहिए।

उचित परिस्थितियों में फोटोग्राफी और वीडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए। आवश्यकतानुसार विसरा, रक्त, डीएनए तथा अन्य जैविक नमूने सुरक्षित किए जाने चाहिए।

शव और उसके कपड़ों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि इससे डीएनए, जैविक पदार्थ, रेशे या अन्य महत्वपूर्ण फोरेंसिक साक्ष्य नष्ट हो सकते हैं। सभी नमूनों की चेन ऑफ कस्टडी सुरक्षित रहनी चाहिए।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट इतनी विस्तृत होनी चाहिए कि कोई स्वतंत्र विशेषज्ञ या न्यायालय यह निर्धारित कर सके कि चिकित्सकीय निष्कर्ष घटना के आधिकारिक विवरण से मेल खाते हैं या नहीं।

सीसीटीवी और अन्य साक्ष्यों का संरक्षण

आधुनिक तकनीक हिरासत में हिंसा की रोकथाम और मृत्यु की वास्तविक परिस्थितियों का पता लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

पुलिस थानों और जेलों में, वैध निजता संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, सीसीटीवी कैमरों की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। रिकॉर्डिंग सुरक्षित प्रणाली में रखी जानी चाहिए ताकि उसमें बाद में छेड़छाड़ या उसे मिटाने की संभावना कम हो।

हिरासत में मृत्यु होने पर संबंधित अवधि की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग तत्काल सुरक्षित की जानी चाहिए। रिकॉर्डिंग का गायब होना, अचानक तकनीकी खराबी या महत्वपूर्ण अवधि में रिकॉर्डिंग का न होना स्वयं जाँच का विषय होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त गिरफ्तारी और हिरासत रिकॉर्ड, सामान्य डायरी, ड्यूटी रोस्टर, पूछताछ रिकॉर्ड, चिकित्सकीय रिकॉर्ड, अस्पताल के रिकॉर्ड, आगंतुक रजिस्टर और सह-कैदियों या स्वतंत्र गवाहों के बयान भी सुरक्षित किए जाने चाहिए।

मजिस्ट्रेटी जाँच और NHRC की भूमिका

हिरासत में होने वाली मौतों की विशेष जाँच का कानूनी प्रावधान है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के अंतर्गत हिरासत में होने वाली मौतों के संबंध में निर्धारित मजिस्ट्रेटी जाँच एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मामला केवल पुलिस विभाग की आंतरिक जाँच तक सीमित न रह जाए।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी हिरासत में होने वाली मौतों के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करता है। ऐसे मामलों की सूचना निर्धारित अवधि के भीतर आयोग को देना आवश्यक है। आयोग ने पोस्टमार्टम, वीडियो रिकॉर्डिंग, मजिस्ट्रेटी जाँच और जाँच रिपोर्टों के संबंध में भी दिशा-निर्देश बनाए हैं।

इन व्यवस्थाओं का मूल उद्देश्य यह है कि हिरासत में किसी व्यक्ति की मृत्यु को केवल एक आंतरिक प्रशासनिक मामला न माना जाए। राज्य की हिरासत में हुई मृत्यु सार्वजनिक महत्व का विषय है क्योंकि इसमें राज्य की शक्ति के प्रयोग का प्रश्न सीधे जुड़ा होता है।

जेल प्रशासन की विशेष जिम्मेदारी

जेल प्रशासन का आधार यह सिद्धांत होना चाहिए कि कारावास का अर्थ स्वतंत्रता से वंचित करना है, मानवीय गरिमा से नहीं।

कैदियों को पर्याप्त भोजन, स्वच्छ पानी, स्वच्छता, चिकित्सा सुविधा और हिंसा से सुरक्षा मिलनी चाहिए। प्रत्येक कैदी का प्रवेश के समय चिकित्सकीय परीक्षण होना चाहिए। बुजुर्ग कैदियों, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों, दिव्यांग कैदियों तथा आत्महत्या की आशंका वाले व्यक्तियों के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान आवश्यक है। जेल में बंद व्यक्ति अकेलेपन, भय, अवसाद, परिवार से दूरी और मुकदमे की अनिश्चितता से गुजर सकते हैं। इसलिए आत्महत्या रोकथाम, मनोवैज्ञानिक परामर्श और प्रशिक्षित जेल कर्मचारियों की व्यवस्था आवश्यक है।

जेलों में अत्यधिक भीड़ भी प्रशासन और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव डालती है। इसलिए अनावश्यक पूर्व-परीक्षण हिरासत को कम करना केवल न्यायिक सुधार नहीं, बल्कि जेल सुधार और स्वास्थ्य सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण उपाय है।

उत्तर प्रदेश का विशेष संदर्भ

उत्तर प्रदेश में पुलिस और जेल व्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है और राज्य में हिरासत में मौतों का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। NHRC के आँकड़ों में उत्तर प्रदेश में न्यायिक हिरासत में होने वाली मौतों की संख्या लगातार चिंता का विषय रही है (2016 से 2022 तक 2630)।

हाल के वर्षों में NHRC ने उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में मौत के मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर जाँच की है। ऐसे मामलों में आयोग ने गिरफ्तारी रिकॉर्ड, मेडिकल-लीगल प्रमाणपत्र, सामान्य डायरी, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पोस्टमार्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग, फोरेंसिक रिपोर्ट और मजिस्ट्रेटी जाँच रिपोर्ट जैसी सामग्री माँगी है।

इससे स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में हिरासत में मौत को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय एक राज्यव्यापी संस्थागत समस्या के रूप में देखना आवश्यक है।

प्रत्येक जिले में हिरासत में होने वाली मौतों की निगरानी के लिए एक प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें जिला प्रशासन, पुलिस, जेल प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और स्वतंत्र मानवाधिकार संस्थाएँ शामिल हों। जिला-वार आँकड़ों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए ताकि किसी विशेष पुलिस थाने, जेल या क्षेत्र में बार-बार होने वाली समस्याओं की पहचान की जा सके।

स्वतंत्र जाँच की आवश्यकता

सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है—हिरासत और हिरासत में अपराध की जाँच को अलग करना।

यदि पुलिसकर्मियों पर हिरासत में हिंसा या मृत्यु का आरोप है, तो उसी थाने या उससे सीधे जुड़े अधिकारियों को जाँच की जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार जाँच किसी स्वतंत्र विशेष इकाई या अन्य सक्षम एजेंसी को सौंपी जा सकती है। गंभीर मामलों में न्यायिक निगरानी भी आवश्यक हो सकती है।

सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए:

किसी संस्था को अपने ही कर्मचारियों द्वारा किए गए गंभीर अपराध की एकमात्र जाँचकर्ता नहीं होना चाहिए।

स्वतंत्रता फोरेंसिक चिकित्सा तक भी होनी चाहिए। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों को पुलिस या प्रशासनिक दबाव से मुक्त रहना चाहिए। उनका कर्तव्य केवल चिकित्सकीय तथ्यों को निष्पक्ष रूप से दर्ज करना है।

जवाबदेही केवल कनिष्ठ अधिकारियों तक सीमित न हो

हिरासत में मृत्यु के बाद केवल किसी सिपाही या कनिष्ठ अधिकारी को निलंबित कर देना पर्याप्त नहीं है।

यदि जाँच से यह पता चलता है कि वरिष्ठ अधिकारियों को हिंसक व्यवहार की जानकारी थी, उन्होंने शिकायतों की अनदेखी की, अधीनस्थों की निगरानी नहीं की, साक्ष्य छिपाने का प्रयास किया या समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई, तो उनकी भूमिका की भी जाँच होनी चाहिए।

जवाबदेही तीन स्तरों पर होनी चाहिए—

व्यक्तिगत जवाबदेही—उस अधिकारी की जिसने गैर-कानूनी कार्य किया;

पर्यवेक्षकीय जवाबदेही—जहाँ वरिष्ठ अधिकारियों ने कदाचार को रोकने या उस पर कार्रवाई करने में विफलता दिखाई;

और संस्थागत जवाबदेही—जहाँ व्यवस्था की संरचना ने हिंसा, लापरवाही या दण्डहीनता के लिए परिस्थितियाँ पैदा कीं।

परिवार को न्याय और मुआवजा

हिरासत में मरने वाले व्यक्ति के परिवार को केवल अपने प्रियजन की मृत्यु का दुःख ही नहीं झेलना पड़ता, बल्कि उसे राज्य की शक्तिशाली संस्थाओं के सामने न्याय की लड़ाई भी लड़नी पड़ती है।

जहाँ मौलिक अधिकारों का उल्लंघन सिद्ध होता है, वहाँ उचित कानूनी व्यवस्था के तहत मुआवजा दिया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने हिरासत में मृत्यु के मामलों में उपयुक्त परिस्थितियों में सार्वजनिक विधि के अंतर्गत मुआवजे को मान्यता दी है।

लेकिन मुआवजा आपराधिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति के जीवन का आर्थिक मूल्य निर्धारित करके मामले को समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि आपराधिक कृत्य सिद्ध होता है तो अभियोजन भी होना चाहिए।

परिवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चिकित्सकीय रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट और मजिस्ट्रेटी जाँच के निष्कर्षों तक प्रभावी पहुँच मिलनी चाहिए, कानून द्वारा अनुमत सीमाओं के भीतर।

स्वीकारोक्ति-आधारित पुलिसिंग से साक्ष्य-आधारित पुलिसिंग की ओर

हिरासत में होने वाली मौतों को रोकने के लिए पुलिस संगठन की कार्यसंस्कृति में मूलभूत परिवर्तन आवश्यक है।

भारत को निर्णायक रूप से स्वीकारोक्ति-आधारित पुलिसिंग से साक्ष्य-आधारित पुलिसिंग की ओर बढ़ना होगा।

आधुनिक पुलिस अधिकारी को निम्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए—

फोरेंसिक विज्ञान; डीएनए विश्लेषण; साइबर फोरेंसिक; डिजिटल साक्ष्य; वित्तीय जाँच; अपराध-स्थल प्रबंधन; वैज्ञानिक पूछताछ; व्यवहार संबंधी विश्लेषण; गवाह संरक्षण तथा  मानवाधिकार कानून।

पुलिस की सफलता का पैमाना केवल गिरफ्तारियों या स्वीकारोक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि जाँच की गुणवत्ता, वैज्ञानिकता और वैधानिकता होना चाहिए।

जनोन्मुखी पुलिस की ओर

मूल प्रश्न यह है कि लोकतांत्रिक समाज को कैसी पुलिस चाहिए।

औपनिवेशिक पुलिस व्यवस्था का मूल उद्देश्य जनता पर नियंत्रण और शासन की सत्ता की रक्षा करना था। संवैधानिक लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका अलग होनी चाहिए। पुलिस को नागरिकों पर शासन करने वाली शक्ति नहीं, बल्कि कानून के अधीन नागरिकों की सेवा और सुरक्षा करने वाली संस्था होना चाहिए।

इस परिवर्तन के लिए पुलिस की कार्यसंस्कृति को औपनिवेशिक मानसिकता से संवैधानिक संस्कृति की ओर ले जाना होगा। इसके केंद्र में गरिमा, समानता, बंधुत्व, विधि का शासन और जवाबदेही होनी चाहिए।

यह दृष्टिकोण डॉ. बी. आर. आंबेडकर की संवैधानिक लोकतंत्र की अवधारणा से भी जुड़ता है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था नहीं है। वह संवैधानिक नैतिकता, समानता, स्वतंत्रता और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा के सम्मान पर आधारित व्यवस्था है। इसलिए किसी असहाय व्यक्ति के साथ हिरासत में किया जाने वाला व्यवहार संवैधानिक नैतिकता की सबसे कठोर परीक्षा है।

व्यापक सुधार एजेंडा

भारत में हिरासत में होने वाली मौतों की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं—

प्रत्येक हिरासत में मृत्यु की तत्काल और अनिवार्य सूचना।
कानून के अनुसार स्वतंत्र मजिस्ट्रेटी जाँच।
प्रत्येक हिरासत में मृत्यु का स्वतंत्र मेडिको-लीगल पोस्टमार्टम।
पोस्टमार्टम की उचित फोटोग्राफी और आवश्यकतानुसार वीडियो रिकॉर्डिंग।
सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का तत्काल संरक्षण।
जहाँ हिरासत में अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध हो, वहाँ स्वतंत्र जाँच।
पुलिस और जेल हिरासत में प्रवेश के समय अनिवार्य चिकित्सकीय परीक्षण।
कैदियों के लिए निरंतर स्वास्थ्य सेवा और आपातकालीन अस्पताल सुविधा।
स्वतंत्र जेल निरीक्षण और नियमित मानवाधिकार ऑडिट।
शिकायतकर्ताओं, गवाहों और परिवारों को धमकी या दबाव से सुरक्षा।
हिरासत में मौतों और जाँच के परिणामों के आँकड़ों का पारदर्शी प्रकाशन।
दोष सिद्ध होने पर आपराधिक और विभागीय कार्रवाई।
पीड़ित परिवारों को मुआवजा और प्रभावी कानूनी उपचार।
वैज्ञानिक और साक्ष्य-आधारित पुलिस जाँच।
पुलिस और जेल कर्मचारियों को मानवाधिकार तथा संवैधानिक नैतिकता का निरंतर प्रशिक्षण।
जहाँ लापरवाही या कदाचार सिद्ध हो, वहाँ वरिष्ठ अधिकारियों की भी जवाबदेही।
निष्कर्ष

हिरासत में मृत्यु केवल किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। यह राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धता की परीक्षा है।

लोकतांत्रिक राज्य को कानून के अनुसार किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने, हिरासत में रखने और जेल भेजने का अधिकार है। लेकिन जितनी अधिक राज्य की दमनकारी शक्ति होती है, उतनी ही अधिक उसके दुरुपयोग को रोकने की संवैधानिक जिम्मेदारी भी होती है।

मूल सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए—

राज्य कानून के अनुसार किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर सकता है, लेकिन मनमाने, गैर-कानूनी या अत्यधिक शक्ति-प्रयोग के माध्यम से उसकी गरिमा और जीवन नहीं छीन सकता।

भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात से भी तय होगी कि पुलिस थाना और जेल ऐसे स्थान बने रहें जहाँ संविधान के अधिकार पूरी तरह लागू हों, न कि ऐसे स्थान जहाँ व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार समाप्त हो जाएँ।

इसलिए लक्ष्य होना चाहिए—हिरासत की शक्ति से हिरासत की जवाबदेही की ओर, दमन से वैज्ञानिक जाँच की ओर, गोपनीयता से पारदर्शिता की ओर और दण्डहीनता से कानून के शासन की ओर।

सच्ची लोकतांत्रिक पुलिस वह नहीं है जो केवल लोगों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करे। सच्ची लोकतांत्रिक पुलिस वह है जो कानून के भीतर रहकर शक्ति का प्रयोग करे, नागरिक की गरिमा का सम्मान करे, हिंसा और यातना से दूर रहे तथा शक्ति के दुरुपयोग के लिए स्वयं भी पूरी तरह जवाबदेह हो।

यदि आप चाहें तो मैं इसका अगला संस्करण “हिरासत में मौत और भारतीय पुलिस व्यवस्था: एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण” शीर्षक से तैयार कर सकता हूँ, जिसमें डॉ. आंबेडकर की संवैधानिक नैतिकता, समानता और बंधुत्व की अवधारणाओं को पुलिस सुधार, जाति-व्यवस्था और हिरासत में होने वाली हिंसा से जोड़ा जाएगा।

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