वरिष्ठ पत्रकार गरिमा सिंह और प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने किया जनता के गुस्से से बचने के प्रति आगाह
चरण सिंह
सत्ता के लिए काम करने वाले पत्रकारों को अब यह समझ लेना चाहिए कि गोदी मीडिया को जनता के गुस्से से बचने के प्रति आगाह किया जाने लगा है। आंदोलनकारियों को यदि छोड़ भी दें तो पत्रकार और वकील भी मीडिया पर हमले की बात करने लगे हैं। न्यूज 24 से इस्तीफा देने वाली गरिमा सिंह ने कहा है कि वह दिन दूर नहीं कि उपद्रवी मीडिया संस्थानों और न्यूज स्टूडियों तक पहुंच जाएंगे। उनका मतलब मीडिया से नाराज लोगों से था।
उधर प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने गोदी मीडिया के एंकरों के= बीच चौराहों पर पिटने की बात की है। मतलब सत्ता के लिए काम करने वाले पत्रकारों को निर्णय लेना है कि उन्हें जमीर जगाकर जनता की समस्याओं को उठाना है या फिर ऐसे ही सत्ता की दलाली कर जनता से पिटना है। दरअसल गोदी मीडिया की सत्ता प्रवक्ता की भूमिका से लोगों में बहुत गुस्सा है। दिल्ली जंतर पर हुए युवाओं के आंदोलन में इस गुस्से की एक झलक देखने को भी मिली थी। गुस्सा हो भी क्यों न ? मीडिया के सत्ता की ढाल बनने की वजह से देश और समाज का बहुत नुकसान हो रहा है। सही बात जनता तक नहीं पहुंच रही है। देश के संसाधनों को कैसे लुटाया जा रहा है। यह सब जनता तक नहीं पहुंच रहा है।
मीडिया सत्ता के प्रवक्ता की तरह व्यवहार कर रहे हैं। जनता भ्रमित हो रही है। जमीनी हकीकत जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। मोदी सरकार ने लगभग 80 प्रतिशत पर मीडिया पर अडानी और अंबानी का कब्जा करा दिया है। देश में मीडिया का काम बस सत्ता की ढाल बनने का काम रह गया है। गोदी मीडिया के लिए जनता जाए भाड़ में, जहां थोड़ी सी आंच सरकार पर आई तो मीडिया सत्ता के लिए कार्यक्रम बनाने में जुट जाता है। जमीनी मुद्दे राजनीति के साथ ही मीडिया से भी गायब हैं।
देखने की बात यह है कि आज की तारीख में असम में बाढ़ सबसे संवेदनसील मुद्दा है। 70 से ऊपर लोग मारे जा चुके हैं। 5000 से ऊपर गांव डूबे हैं। 3 लाख से ऊपर लोग इस बाढ़ से प्रभावित हैं पर किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। मीडिया के लिए जैसे कोई बड़ी समस्या नहीं है। प्रधानमंत्री को लोगों की समस्या से अधिक उनको दी जाने वाली गालियों पर रील बनाने की चिंता है। हिन्दू मुस्लिम के नाम पर नफरत भरे बयान देने वाले असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्वशर्मा को असम की बाढ़ से अधिक चिंता प. बंगाल चुनाव जीतने की थी। उन्हें नहीं पता था कि हर साल असम में बाढ़ आती है। यह हेमंता विश्वशर्मा की लापरवाही और उदासीनता ही है कि इस बार बाढ़ त्रासदी गत 60 साल में सबसे अधिक है। असम बाढ़ से बचने के उपाय से ज्यादा उन्होंने प. बंगाल चुनाव पर ध्यान दिया।
पीएम मोदी के लिए दुनिया भर में घूमने के लिए टाइम है पर बाढ़ ग्रस्त असम में जाने के लिए समय नहीं है। फिर कहेंगे कि लोग गाली देते हैं। प्रधानमंत्री का ध्यान इस बात पर ज्यादा रहता है कि उन्हें कौन कौन गाली दे रहा है। उनको माफ़ भी करना है। उनको इस बात की चिंता नहीं कि उनके राज में जनता के सामने क्या क्या समस्याएं हैं। बीजेपी को दतिया और बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव से सीख लेनी चाहिए। यह जनता का गुस्सा ही है कि जिस सीट पर बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नवीन नितिन पांच बार विधायक रहें। उनके पिता 3 बार विधायक रहें उस सीट पर नई नवेली पार्टी जन सुराज के नेता पीके ने बीजेपी को पटखनी दे दी।
‘दिलचस्प तो यह है कि सांसद रवि शंकर, मंत्री राम कृपाल यादव और खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ पर बीजेपी प्रत्याशी हारा है। पीके ने बीजेपी को उसकी औकात बताई है। बीजेपी की सरकार में राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट पर अपने को जिताना पीके के मास्टर स्ट्रोक से अधिक है।

