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सीएम नीतीश ने अशोक चौधरी का किया ‘होम्योपैथी’ इलाज!

 प्रमोशन या डिमोशन कंफ्यूजन बरकरार

दीपक कुमार तिवारी

पटना। जेडीयू की राजनीति में अंदरूनी झगड़े का आलम भी अजीब है। आलाकमान का नया फैसला चर्चा का विषय बना हुआ है, लोग अपने अपने हिसाब से इसकी समीक्षा में लगे हैं। जी हां, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बतौर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो निर्णय किया है उससे दोनों गुटों में उत्साह है। राजनीति जगत में इसलिए कहा जाता है कि नीतीश कुमार ‘होम्योपैथी’ इलाज करते हैं।
दरअसल, जेडीयू के भीतर गुटबाजी चरम पर है। इसमें एक गुट ऐसा है जो समता काल से साथ चल रहा है और दूसरा गुट जो अन्य दलों से आए और नीतीश कुमार की किचन कैबिनेट में शामिल हो गए। राजनीतिक गलियारों में इनका दूसरा नाम भूंजा पार्टी समूह भी कहा जाता है।
बहरहाल, जब मंत्री अशोक चौधरी का कई प्रकरण आने के बाद यानी ललन सिंह से तकरार, चिराग के करीबी बन बेटी शांभवी चौधरी को समस्तीपुर से टिकट दिलाना और फिर भूमिहार प्रकरण के बाद कविता प्रकरण के बाद तो जैसे जेडीयू में भूचाल आ गया।
एक गुट जो अशोक चौधरी को गुड बुक में नहीं रखता वह तो मान के चल रहा था कि अशोक चौधरी का अब तो खेल खत्म। नीतीश कुमार को डायरेक्ट हिट कर अपनी शामत अशोक चौधरी ने बुला ली है और अब बस नीतीश कुमार का ‘होम्योपैथी’ इलाज बाकी है।
कहा तो यह गया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कविता प्रकरण के बाद तुरंत अशोक चौधरी को अपने सरकारी आवास बुलाया। तब उनके विरोधियों को लगा आज तो सफाया तय। लेकिन अशोक चौधरी प्रफ्फुलित होते हुए निकले। फोटो भी खिंचवाई और मीडिया को उपलब्ध भी कराया। पर नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी को लेकर एक नया फैसला भी लिया। इस फैसल के तहत अशोक चौधरी को राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेवारी दी। पर इस फैसले के भी दो अर्थ निकाले जा रहे हैं।
हालांकि राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद अशोक चौधरी की मुस्कान अपने तमाम विरोधियों को परास्त करने के लिए काफी है। यहां तक कि इनकी बेटी और समस्तीपुर से लोक जनशक्ति पार्टी (आर) की सांसद शांभवी चौधरी ने तो एक कविता के जरिए एक बड़ा संदेश अपने पिता के विरोधियों को दे डाला। कविता का मर्म समझिए…
‘बांधने इनको जो आया है,
जंजीर बड़ा क्या लाया है।
यदि उन्हें बांधना चाहे मन
तो पहले बांधे अनंत गगन।
सुने को साध ना सकता है,
वो इन्हें बांध कब सकता है।
लेकिन इस फैसले के बाद जेडीयू का वह खेमा भले खुलकर नीतीश कुमार के फैसले का विरोध तो नहीं कर रहा है। पर ऑफ द रिकॉर्ड कहते हैं…दिल को बहलाने को
गालिब ये ख्याल अच्छा है।
आगे कहते हैं अशोक चौधरी अपने डिमोशन से खुश हैं तो कोई क्या कर सकता है? अशोक चौधरी तो कोई अकेले राष्ट्रीय महासचिव नहीं हैं? इनके पहले दो महासचिव बन चुके हैं। पहले मनीष वर्मा। फिर हाल ही में जेडीयू में आए श्याम रजक को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। तीसरे नंबर के राष्ट्रीय महासचिव हैं। दुनिया को पता है राष्ट्रीय महासचिव मनीष वर्मा के रहते कोई भी क्या अपने मन की कर पायेगा।
विरोधी खेमा अपने डिमोशन वाले तर्क को यह कह कर भी साबित करते हैं कि राष्ट्रीय महासचिव रहने पर मंत्री पद जाना तय है। अब तक जेडीयू के इतिहास में कोई भी राष्ट्रीय महासचिव मंत्री नहीं रहा है। एक चर्चा तो यह है कि इन्हें झारखंड का प्रभारी बना कर बिहार की राजनीति से अलहदा न कर दिया जाए।

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