उत्तराखंड की नदियाँ जैसे भागीरथी, खीरगंगा, अलकनंदा और ऋषिगंगा, जो कभी जीवनदायिनी मानी जाती थीं, हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन, मानवीय हस्तक्षेप और अनियोजित विकास के कारण तबाही का कारण बन रही हैं। यहाँ कुछ प्रमुख कारण हैं:
जलवायु परिवर्तन और भारी बारिश: वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण बादल फटने और अचानक भारी बारिश की घटनाएँ बढ़ रही हैं। गर्म हवा अधिक नमी सोखती है, जिससे मूसलाधार बारिश होती है, और नदियाँ उफान पर आ जाती हैं। उदाहरण के लिए, 2025 में उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में खीरगंगा नदी में बादल फटने से बाढ़ ने भारी तबाही मचाई, जिसमें 4 लोगों की मौत हुई और 50 से अधिक लापता हुए।
भूस्खलन और मलबा: लगातार बारिश और बर्फ पिघलने से पहाड़ों में भूस्खलन का खतरा बढ़ता है। मलबा नदियों में जमा होकर उनके प्रवाह को रोकता है, जिससे अस्थायी झीलें बनती हैं। इनके टूटने से अचानक बाढ़ आती है। 2025 में गैरारिधार पहाड़ी से भूस्खलन के कारण मलबा भागीरथी नदी में जमा हुआ, जिससे एक अस्थायी झील बनी और निचले इलाकों में खतरा बढ़ गया।
अनियोजित निर्माण और खनन: सड़कों, सुरंगों, और बांधों के लिए बड़े पैमाने पर ड्रिलिंग और विस्फोट से पहाड़ कमजोर हो रहे हैं। 2021 में चमोली के रांति पहाड़ का हिस्सा टूटने से तपोवन में तबाही हुई, जिसे पर्यावरणविदों ने बांध निर्माण से जोड़ा।
पर्यटन का दबाव: उत्तराखंड में हर साल 4 करोड़ से अधिक पर्यटक आते हैं, खासकर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री जैसे तीर्थ स्थलों पर। इससे पर्यावरण पर दबाव बढ़ता है, और अनियंत्रित निर्माण नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करता है।
ग्लेशियर पिघलना: हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नदियों का जलस्तर अनियंत्रित रूप से बढ़ता है। खीरगंगा और ऋषिगंगा जैसी नदियाँ, जो ग्लेशियरों से निकलती हैं, इस कारण अचानक उफान पर आ जाती हैं।
प्रशासनिक लापरवाही: आपदा प्रबंधन में कमी और समय पर चेतावनी न जारी करना भी नुकसान को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए, धराली में खीरगंगा की बाढ़ के दौरान मोबाइल नेटवर्क ठप होने से राहत कार्य प्रभावित हुए।
निवारण के उपाय:
टिकाऊ विकास: सड़क और बांध निर्माण भूकंप और पर्यावरण को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
वनों का संरक्षण: वनों की कटाई रोककर भूस्खलन को कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई: ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए नीतियाँ बनानी होंगी।
स्थानीय जागरूकता: नदियों के किनारे रहने वालों को समय पर चेतावनी और सुरक्षित स्थानों पर जाने की सुविधा दी जानी चाहिए।

