चरण सिंह
देश में वोटबैंक की राजनीति ऐसे घर कर गई है कि सत्ता परिवर्तन तो हो सकता है पर बदलाव होना बहुत मुश्किल है। इसका बड़ा कारण यह है कि राजनीतिक दलों ने बड़ी चालाकी से आंदोलनों को भी जाति और धर्म के नाम पर बांट दिया है। बेरोजगारी, महंगाई और कानून व्यवस्था जैसे जमीनी मुद्दों पर आंदोलन नहीं होते हैं। आंदोलन होते हैं हिन्दू-मुस्लिम, दलित-ओबीसी-सवर्ण को लेकर। नेता भी जाति और धर्म के नाम पर बंट गए हैं। देश में बदलाव का अब एक ही रास्ता है कि आज़ादी की लड़ाई की तर्ज पर बड़ा आंदोलन हो और आंदोलनकारी ही चुनाव लड़े और सरकार बनाएं।
जाति और धर्म की राजनीति की वजह से ही देश में कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है। विपक्ष के दल कितने भी बड़े बड़े दावे करते घूम रहे हों पर जमीनी हकीकत यह है कि मोदी सरकार बनने के बाद देश में एक भी आंदोलन ऐसा नहीं हुआ जिसमें विपक्ष की एकजुटता दिखाई दी हो। देश का दुर्भाग्य यह है कि सभी दलों को सत्ता चाहिए देश और समाज से किसी कोई मतलब नहीं। सत्ता में विपक्ष के भी सभी दल भी रह चुके हैं। ऐसा भी नहीं है कि इन लोगों ने कोई कीर्तिमान स्थापित किये हों। या फिर ऐसा कुछ कर रहे हों कि इनको सत्ता सौंपी जाए। जो दल विपक्ष की जिम्मेदारी नहीं निभा सकते हैं वे सत्ता में जाकर भी कुछ नहीं कर सकते।
देश का भला तभी हो सकता है जब आज़ादी की लड़ाई की तरह जाति धर्म से ऊपर उठकर भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस, अशफाक उल्ला खान के विचारों से ओतप्रोत लोग खड़े हों पर बदलाव के लिए बड़ा आंदोलन हो। देश में स्थापित नेतृत्व घिसा पीटा है। आंदोलनकारियों की सरकार ही देश और समाज का भला कर सकती है। यह विपक्ष की कमजोरी ही है कि बीजेपी ने लगभग सभी दलों को दबाव में ले रखा है।
विपक्ष के नेता सत्ता पक्ष पर आरोप लगाते हैं कि गंभीर धाराओं में नेताओं को जेल में ठूंसा जा रहा है। ऐसे में बड़ा प्रश्न उठता है कि आंदोलन के नाम पर क्या कोई नेता जेल में बंद है। यदि राहुल गांधी को छोड़ दिया जाए तो विपक्ष के अधिकतर नेता लाठी डंडे खाने से डर रहे हैं, जेल जाने से डर रहे हैं। बिल्ली के भाग से छींका टूटने का इंतजार कर रहे हैं।






