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हिंदू बहुल रुद्रप्रयाग सीट पर BJP को टक्कर दे पाएगी कांग्रेस? क्या है माहौल

उत्तराखंड की सियासत में रुद्रप्रयाग विधानसभा सीट अपने आप में एक दिलचस्प राजनीतिक कहानी समेटे हुए है। गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सीट 2002 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी। 2022 विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कुल 103675 मतदाता दर्ज किए गए थे।

 

जातीय समीकरण, हिंदू बहुल क्षेत्र

 

साल 2011 की जनगणना के अनुसार, रुद्रप्रयाग क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 99.13 फीसदी है, जबकि मुस्लिम महज 0.61 फीसदी हैं. इस सीट पर SC-ST आरक्षण भी नहीं है. यह सीट पहाड़ी सीट है, जहां परंपरागत तौर पर राजपूत-ठाकुर और ब्राह्मण समुदाय की भूमिका निर्णायक मानी जाती रही है।

 

 

पिछले नतीजों पर एक नजर

 

राज्य गठन के बाद से इस सीट पर 5 चुनाव आयोजित हो चुके हैं। यह सीट भाजपा की एक मजबूत गढ़ मानी जाती है. साल 2002 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के मातबर सिंह कंडारी और कांग्रेस से गजेंद्र सिंह के बीच सीधा मुकाबला रहा। इस चुनाव में 15031 वोटों के साथ बीजेपी के मातबर सिंह कंडारी इस क्षेत्र से विधायक चुने गए, जबकि कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ रहे गजेंद्र सिंह को 9275 वोट मिले।

 

2007 में फिर भाजपा की जीत

 

2007 विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने मातबर सिंह कंडारी पर भरोसा जताते हुए उन्हें पार्टी का टिकट सौंपा। पार्टी की उम्मीद पर खरा उतरते हुए 16394 वोटों के साथ कंडारी एक बार फिर विधायक बने. कांग्रेस ने इस चुनाव में अपना प्रत्याशी बदल कर वीरेंद्र सिंह बुटोला पर अपना दांव खेला था। हालांकि बुटोला को 9394 वोटों के साथ शिकस्त का सामना करना पड़ा।

 

2012 में कांग्रेस के खाते में गई सीट

 

इस वर्ष के चुनाव में कांग्रेस ने इस सीट को लेकर अपनी रणनीति बदली और हरक सिंह रावत को इस सीट का टिकट दिया, वहीं दूसरी ओर भाजपा ने अपने सिटिंग विधायक पर भरोसा जताते हुए मातबर सिंह कंडारी को पार्टी का टिकट दिया. साल 2012 के चुनाव में 15469 वोटों के साथ हरक सिंह रावत रुद्रप्रयाग के विधायक चुने गए. जबकि बीजेपी के मातबर सिंह कंडारी 14143 वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे।
आपको बता दें कि यह चुनाव रुद्रप्रयाग सीट के लिए बेहद दिलचस्प भी था, चूंकि भारतीय जनता पार्टी के मातबर सिंह कंडारी उन दिनों कैबिनेट मंत्री थे. जबकि हरक सिंह रावत नेता प्रतिपक्ष थे. इसीलिए इस सीट पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं. यह दोनों ही कद्दावर नेता आपस में साढू भाई भी हैं।

 

2017 में भाजपा ने बदला प्रत्याशी

 

साल 2017 के चुनाव में भाजपा ने मातबर सिंह कंडारी को टिकट ना दे क भरत सिंह चौधरी को मैदान में उतारा. भरत सिंह चौधरी 2012 में भी इस सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतरे थे. उन्हें पिछले चुनाव में 7988 वोटों का समर्थन भी प्राप्त हुआ था. भाजपा ने यही समर्थन देख कर भारत सिंह चौधरी को पार्टी का टिकट दे दिया. बीजेपी की यह रणनीति काम भी आई. भरत सिंह चौधरी को इस चुनाव में 29333 वोटों का बम्पर समर्थन मिला।

 

भरत सिंह चौधरी का इस सीट पर दबदबा 2022 के चुनाव में भी देखा गया। 29660 वोट लाकर एक बार फिर वह इस सीट से विधायक चुने गए. दूसरे स्थान पर रहे कांग्रेस के प्रदीप थपलियाल को 19858 वोट मिले. भरत सिंह चौधरी मूल रूप से रुद्रप्रयाग के मवाना घोलतीर गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी ग्राम प्रधान के तौर पर शुरू की थी। दो बार लगातार जीत के बाद 2026 में धामी मंत्रिमंडल के विस्तार में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया।

 

बड़े चेहरों का असर

 

 

फिलहाल सबसे मजबूत असर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का माना जा रहा है जिन्होंने भरत चौधरी को मंत्री बनाकर इस सीट पर पार्टी की पकड़ को और पुख्ता किया है. दूसरी तरफ हरक सिंह रावत का इस क्षेत्र से पुराना नाता है. वह 2012 में यहीं से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे और इलाके में उनका जनाधार आज भी माना जाता है.

 

 

2027 में ये मुद्दे तय करेंगे नतीजे

 

आगामी विधानसभा चुनाव जल्द होगा और अभी से सियासी हलचल तेज होने लगी है. ऑल वेदर रोड, पहाड़ी पलायन, स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधाएं, केदारनाथ पुनर्निर्माण, चारधाम यात्रा प्रबंधन जैसे मुद्दे यहां चुनावी विमर्श तय करेंगे. BJP की तरफ से भरत सिंह चौधरी की दोबारा दावेदारी लगभग तय मानी जा रही है. उन्होंने खुद अगली बार 40,000 से ज्यादा वोटों से जीत का दावा किया है. वहीं कांग्रेस की ओर से 2022 के प्रत्याशी प्रदीप प्रसाद थपलियाल को मैदान में उतारे जाने की चर्चा है. हालांकि, अभी तक किसी भी पार्टी ने औपचारिक ऐलान नहीं किया है.

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