पत्रकार के सवाल पूछने पर एलआईयू के पूछताछ का क्या औचित्य ?
पत्रकारिता पर हावी है चाटुकारिता, गुनाह हुआ सत्ता से सवाल करना!
चरण सिंह
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब बताएं ? जब सवालों के जवाब ही नहीं देने तो फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों की ? आजतक के कार्यक्रम पंचायत आजतक के कार्यक्रम की तर्ज पर पंचायत सर्व मीडिया कर लेते। दबाकर भाषण पेलते। कोई प्रश्न नहीं करने वाला था। जब अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस की तो यह समझ लेना चाहिए था कि सब पत्तलकार ही नहीं हैं कोई तो पत्रकार प्रेस कॉन्फ्रेंस आएगा ही। ऐसा क्या पूछ रहे थीं दिव्या श्रीवास्तव ? पत्रकारों के सवालों से बचना नेता की कमजोरी मानी जाती है। पुरुष पत्रकारों के लिए शर्म की बात है कि एक महिला पत्रकार ने सवाल पूछने का नैतिक साहस दिखाया पर उसका साथ नहीं दिया गया। यह पत्रकारों की कमियां रही हैं जो आज गली मोहल्ले के नेता भी पत्रकारों को कुछ नहीं समझ रहे हैं।
क्या ख़बरें नेताओं की प्रेस रिलीज और शोशल मीडिया की जानी वाली पोस्ट के आधार पर नहीं बनाई जा रही है ? क्या टीवी चैनल और अख़बार सत्ता के हिसाब से ख़बरें नहीं बना और चला रहे हैं ? क्या थानों में दर्ज एफआईआर के आधार पर क्राइम की ख़बरें नही बनती हैं ? क्या जनता के बजाय सत्ता के लिए ख़बरें नहीं बन रही हैं। क्या आज की राजनीति में सवाल पूछे जा रहे हैं ? क्या राजनेता सवालों के जवाब दे रहे हैं ? कोई जुनूनी पत्रकार अपने दम पर कोई सवाल करले वह दूसरी बात है। यही वजह रहे कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकार दिव्या श्रीवास्तव के सवाल का जवाब तो नहीं दिया ही नहीं बल्कि उठकर चल दिए। दिव्या बेचारी चिल्लाती रह गई।
आज के पत्रकारों को यह समझना पड़ेगा कि आज के सत्ताधारी नेताओं के यहां मीडिया हाउसों के मालिक भरते हैं तो आप सवाल कैसे कर सकते हैं ? राजनेताओं को लगता है कि मालिक की बात करने की औकात नहीं और नौकर सवाल करेगा। उन्हें पता है कि जो मीडिया उनके हिसाब से ख़बरें बना और चला रहा है। सवालों का जवाब देकर उसके भाव क्यों बढ़ाए जाए ? योगी जी बताएं कि प्रेस कॉन्फ्रेंस करी ही क्यों थी ? एक प्रेस रिलीज जारी कर देते। टीवी चैनलों के लिए वीडियो बनाकर भेज देते। प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब ही पत्रकारों से संवाद करना और पत्रकारों के सवालों का जवाब भी देना है। ठीक है सवाल का जवाब न देते पर दिव्या दत्ता से पूछताछ क्यों ? प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछकर दिव्या ने कौन सा अपराध कर दिया ?
दरअसल इन दिनों में सबसे अधिक दुर्गति मीडिया की हुई है। इसके लिए काफी हद तक संपादक, रिपोर्टर और एंकर ही हैं। एक दूसरे की जड़ खोदने के चक्कर में पत्रकारों की सारी कमजोरी मालिक को दे दी गई। संपादक मैनेजर ही हो गए। उनका काम खबरों को धार देना नहीं बल्कि मालिकों के लिए सब कुछ मैनेज करना रह गया। आज की तारीख में मीडिया हाउस के मालिक पत्रकार नहीं बल्कि नौकर समझते हैं। पत्रकार भी नौकर बन गए हैं। ख़बरें अब टीवी चैनलों और अख़बारों में नहीं बल्कि युट्यूबरों के पास और सोशल मीडिया पर होती थी। एक समय था कि पुलिस इंस्पेक्टर पत्रकर को भैया बोलता था। आज की तारीख में पत्रकार पुलिस इंस्पेक्टर को भैया बोल रहा है। योगी आदित्यनाथ की प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या दिव्या श्रीवास्तव ही बैठी थीं ? और पत्रकार क्या कर रही थे। जब दिव्या चिल्ला रही थी तो दूसरे पत्रकारों ने भी प्रश्न क्यों नहीं किए ?
जमीनी हकीकत तो यह है कि दूसरों की आवाज उठाने का दम्भ भरने वाले पत्रकार खुद अपने हक़ की लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। मुख्यमंत्री से सवाल पूछने पर पत्रकार से एलआईयू पूछताछ करे यह स्थिति मीडियाकर्मियों के लिए चुल्लूभर पानी में डूब मरने की है। हमारे देश में ही किसी समय मुख्यमंत्री संपादक से बात करने के लिए तरस जाता था। मिलने के लिए समय मांगता था। आज नेता पत्रकारों की नौकरी लगवाते हैं और छुड़वाते हैं। स्थिति यह है कि कभी भी किसी भी पत्रकार का कान पकड़कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता ही। कितने मीडिया हाउसों में कितनी छंटनी होती है। कितने पत्रकार सड़कों पर ठोकरें खा रहे हैं। कहीं कुछ हो रहा है क्या ?
पत्रकारों की दुर्गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है। प्रिंट मीडिया में सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू का आदेश दिया। मीडिया मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड तो नहीं दिया उल्टे जिन लोगों ने मांगा उन्हें नौकरी से और निकाल दिया गया । जब प्रिंट मीडिया मालिकों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस चला तो सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर मीडिया मालिकों को राहत दे दी कि इन लोगों को सही से जानकारी नहीं थी। सुनवाई के बाद तो जानकारी हो गई थी। तब दिलवा देते मजीठिया वेज बोर्ड। नहीं उल्टे मजीठिया वेज बोर्ड के मामले को लेबर कोर्ट और भेज दिया। अब मीडिया कर्मी लेबर कोर्ट में धक्के खा रहे हैं।
देश में तमाम संगठन ऐसे हैं जो पत्रकारों और गैर पत्रकारों के हक़ की लड़ाई लड़ने का दम्भ भरते हैं पर इन संगठनों से पीड़ित पत्रकारों को कोई खास राहत नहीं मिलती। दिव्या श्रीवास्तव के मामले में भी न जाने कितने पत्रकार अपने नंबर बनाने के लिए पुलिस प्रशासन सट रहे होंगे। दिव्या श्रीवास्तव की कमजोरी उन्हें दे रहे होंगे। क्या पत्रकारों को यह मुद्दा नहीं उठाना चाहिए ? क्या प्रेस से जुड़े संगठनों को इस मुद्दे को नहीं उठाना चाहिए ?

