चरण सिंह
भले ही बीजेपी हर चुनाव का माहौल पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बनाती हो पर सम्मान देने की बजाय क्षेत्र की उपेक्षा करती दिखाई दे रही है। बीजेपी ने अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश को झुनझुना थमा सभी कुछ पूर्वांचल को दे दिया है। अब मुख्यमंत्री, दोनों उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष सभी पूर्वांचल के हो गए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेताओं की उपेक्षा का बड़ा कारण यह भी है कि यह क्षेत्र अपनी बात रखने में पिछड़ जाता है। बीजेपी नेतृत्व जानता है कि यह क्षेत्र तो भोले भाले लोगों का है। यहां के लोगों को भावनाओं उलझाए रखने में सुविधा होती है। टांग खिंचाई राजनीति इस क्षेत्र को पीछे धकेल रही है। यही वजह है कि पूर्वांचल की राजनीति पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर हावी रहती है।
दरअसल आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले क्षेत्र पश्चमी उत्तर प्रदेश की हमेशा से ही उपेक्षा हुई है। अंग्रेजों ने तो इस क्षेत्र को नजरंदाज किया था ही आज़ाद भारत में इस क्षेत्र के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया। अंग्रेजों ने तो हाई कोर्ट इलाहाबाद में बनवाया ही आज़ाद भारत की सरकारें भी मांग के बावजूद न तो अलग प्रदेश और न ही हाई कोर्ट की ब्रांच न बनवा सकीं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन नेताओं ने भी कुछ अर्जित किया वह अपने दम पर किया। किसी पार्टी ने इस क्षेत्र के साथ दरियादिली नाह दिखाई। चाहे चौधरी चरण सिंह हों, मायावती हों, कल्याण सिंह हों, मुलायम सिंह हों या फिर दूसरे नेता सभी नेताओं ने अपने दम पर बड़ा मुकाम हासिल किया।
यह भी जमीनी हकीकत है कि यदि आज देश आज़ाद है तो इसमें सबसे अधिक योगदान पश्चिमी उत्तर प्रदेश का है। जब अंग्रेजों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत अच्छे अच्छे में नहीं होती थी उस दौर में प. उत्तर प्रदेश के लोगों ने अंग्रेजों को सीधे ललकार दिया था। धन सिंह कोतवाल ने सेना में बगावत कर दी थी। यदि ग्वालियर, रामपुर और पटौदी रियासत अंग्रजों का साथ न देतीं तो देश तो 1857 की क्रांति से ही आज़ाद हो जाता।
लगभग हर दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपेक्षा करता है। अब बीजेपी को ही देख लीजिये। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद और ब्रजेश पाठक पहले से ही पूर्वांचल से हैं अब प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी पूर्वांचल से बना दिए गए हैं। पूर्वांचल महाराजगंज से आने वाले चौधरी (कुर्मी ओबीसी नेता) ने पश्चिमी यूपी के मुरादाबाद से भूपेंद्र सिंह चौधरी (जाट ओबीसी नेता) की जगह ली है। जगजाहिर है कि 2022 में भूपेंद्र चौधरी की नियुक्ति पूर्वी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव को संतुलित करने के लिए की गई थी।
पश्चिमी यूपी मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर जैसे जिलों को बीजेपी जाट बेल्ट मानकर चलती है। यह क्षेत्र किसान मुद्दों और मुस्लिम-ओबीसी वोटों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां पर सपा-कांग्रेस गठबंधन और आरएलडी की भूमिका चुनौती दे रही है। 2024 लोकसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपेक्षा के चलते बीजेपी को यहां पर झटका लगा है। बीजेपी के पास उसके 80 में से 33 सीटें ही बचीं। सीटों कम कर के श्रेय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ठाकुर पूरन सिंह और उनकी टीम को जाता है।
जब गुजरात के तत्कालीन मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने राजपूतों पर अमर्यादित टिप्पणी कर दी और राजपूत संगठनों ने उनसे माफ़ी मांगने की मांग की तो बीजेपी नेतृत्व ने चुप्पी साध ली। टिकट बंटवारे में गृह मंत्री अमित शाह ने योगी आदित्यनाथ की अनदेखी की तो राजपूत समाज ने जगह जगह पंचायतें कर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को ललकार दिया। यह राजपूतों की पंचायतें ही थी कि बीजेपी सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, कैराना सीट हार गई। पूर्वांचल में भी इन पंचायतों का असर देखने को मिला।
यदि बीजेपी ने 2027 विधानसभा चुनावों से पहले संगठनात्मक पुनर्गठन न किया तो बीजेपी के दिक्कतें खड़ी हो सकती है। प. उत्तर प्रदेश में किसान संगठन तो किसानों को उनके हक़ हकूक की लड़ाई लड़ने के लिए जागरूक करते रहते ही हैं। साथ ही समाजवादी पार्टी भी लगातार पीडीए कार्यक्रम कर रही है। ऊपर से अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईआर पर उंगली उठा दी है। उन्होंने भरे मंच से बोल दिया है कि 40 करोड़ वोट एसआईआर से खत्म हो रहे हैं इनमें से 85 प्रतिशत आपके हैं। यानि की बीजेपी के।
हालांकि माहौल बनाने के लिए बीजेपी ने एक शिफूगा छेड़ दिया है। चर्चा है कि राज्य नेतृत्व में 30-40% बदलाव की योजना, जिसमें 18 उपाध्यक्षों, 7 महामंत्रियों और 16 सचिवों के पदों पर पश्चिमी यूपी के प्रमुख नेताओं को प्रमुखता दी जाएगी। युवा, महिला, ओबीसी, अल्पसंख्यक और एससी/एसटी मोर्चों के अध्यक्षों में भी संतुलन किया जाएगा।
पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर पश्चिमी यूपी के जाट समुदाय को संतुष्ट किया जाएगा। पार्टी और योगी सरकार के बीच बेहतर तालमेल, जिसमें कॉर्पोरेशन-बोर्डों में लंबित नियुक्तियां पूरी करना शामिल। पश्चिमी यूपी के किसान मुद्दों (जैसे फसल बीमा, सिंचाई) पर विशेष अभियान चलाकर असंतोष कम करने का प्रयास किया जाएगा। 2027 से पहले कैबिनेट विस्तार में पश्चिमी यूपी के नेताओं को जगह देकर संतुलन बनाया जाएगा।






