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जन्म शताब्दी वर्ष : पावन स्मृति श्रद्धांजलि लेख : हर बेंत पर इंकलाबी उद्घोष करते थे आजादी के अमर योद्धा ओंकार नाथ खरे

 डॉ. अंजली पाण्डेय खरे


देश की आजादी के आंदोलन में अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान है । इसी कड़ी में विंध्य क्षेत्र के ऐसे ही वीर सेनानी श्री ओंकार नाथ खरे जी के व्यक्तित्व कृतित्व को लेकर उनकी शताब्दी वर्ष पर उल्लेख कर रहे हैं।

 

 

जन्म और लालन-पालन

 

दिनांक 1 जुलाई सन 1925 को ओंकार नाथ खरे जी का जन्म वर्तमान मध्यप्रदेश के सीधी जिले के सिहावल नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता जी का नाम श्री मुन्नालाल खरे था जो उस वक्त वहां परमट चौकी में मुंशी के पद पर कार्यरत थे। ओंकार नाथ जी के बड़े भाई का नाम श्री केदार नाथ खरे था ,जो उनसे उम्र में पांच साल बड़े थे। जन्म के नौ माह बाद ही उनकी माताश्री का निधन हो गया । इसके पश्चात् उनकी माँ के करीबी रिश्तेदार श्रीमती भगवती खरे जी ने कुछ समय तक उनका लालन पालन उ.प्र. के मंगरौही मंझनपुर (वर्तमान कौशांबी जिला उ.प्र.) में किया। इसके बाद परिवार वालों ने बच्चों की परवरिश के लिए इनके पिता श्री मुन्नालाल खरे का पुनर्विवाह कराया जिससे उन्हें एक और पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिनका नाम श्री गणेश प्रसाद खरे रखा गया। पिता श्री मुन्ना लाल खरे ने रीवा के तरहटी मोहल्ले में एक मकान खरीदा था , जहाँ तीनों भाई अपने माता-पिता के साथ रहने लगे। पुश्तैनी घर आज भी मौजूद है ।

 

 

विंध्य से शुरू हुई सन 1942 के आज़ादी आंदोलन की सुगबुगाहट

 

देश के स्वतंत्रता आंदोलन में ओंकार नाथ खरे ने महज 17 वर्ष की आयु में कठोर जेल यातनाएं उठाईं और 21 बेतों की सजा को क्रांतिकारी उद्घोष के साथ वरण किया। सन 1942 में रीवा सहित देश के अनेक स्थान ऐसे थे जहां जनसाधारण में अंग्रेजो के खिलाफ असंतोष व्याप्त था और आजादी की आवाज उठने लगी थी। जन विद्रोही की इस सुगबुगाहट और चिंगारी ने आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे समय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विश्व परिदृश्य के साथ देश की नब्ज को पहचान कर मुंबई के कांग्रेस सम्मेलन में 8 अगस्त 1942 की रात्रि में करो या मरो का नारा देते हुए भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत कर दी। महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन का व्यापक असर देसी रियासतों वाले क्षेत्रों पर भी था। देश की आजादी के बाद जब रियासतों के विलयनीकरण का राष्ट्रीय अभियान चलाया गया तो स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि से रियासतों के विलयनीकरण का काम काफी आसान हो गया। कुछ स्थानों के शासको ने विरोध किया लेकिन स्वतंत्रता प्रेमी जनता ने उन्हें नियंत्रित कर लिया।

सन 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन में क्रांतिवीर ओंकार नाथ खरे का योगदान

 

नंगे बदन हर बेंत पर इंकलाबी उद्घोष

देश में महात्मा गाँधी एवं सुभाषचन्द्र बोस अंग्रेजों के अत्याचारी हुकुमत के खिलाफ अपने-अपने तरीके से लड़ रहे थे। विन्ध्य क्षेत्र में तो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लेने में ठाकुर रणमत सिंह , श्यामशाह सहित अनेक वीरों की शहादत त्याग प्रेरक रहा है। रीवा एक रियासत थी। जिस पर निगरानी के लिये अंग्रेजों ने एक पोलिटिकल एजेंट की नियुक्ति कर रखी थी। सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ रीवा में विद्रोह के स्वर मुखर होने लगे थे। यहाँ के तत्कालीन महाराजा गुलाब सिंह स्वतंत्र स्वभाव के थे। अंग्रेज उन्हें पसंद नहीं करते थे। अंग्रेजों से उनका टकराव बढ़ता जा रहा था। अंग्रेजों के बढ़ते हस्तक्षेप को लेकर जनाक्रोश भी बढ़ता जा रहा था। रीवा में अंग्रेजों की मनमानी के खिलाफ जनान्दोलन चल पड़ा जिसमें राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं कार्यकर्ताओं ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। उस समय पं. शंभूनाथ शुक्ला, कप्तान अवधेश प्रताप सिंह, लाल यादवेन्द्र सिंह कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे थे। इस दौरान लगभग सत्रह वर्षीय ओंकार नाथ खरे युवा वर्ग के बीच में अपने जोशीले व्यक्तित्व के चलते अलग पहचान रखते थे। एक सत्याग्रही के रूप में ओंकार नाथ खरे ने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्हें 38 डी.आई.आर. के अंतर्गत बंदी बनाकर रीवा केन्द्रीय जेल में रखा गया। नजरबंद हालत में उन पर मुकदमा चला। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह के आरोप में उन्हें 6 माह का कठोर कारावास और रू. 150 का अर्थदंड दिया गया। क्रांतिवीर ओंकार नाथ खरे ने न तो सजा माफी की कोई अर्जी लगाई और न ही अर्थदंड भरा जिसके चलते उनकी सजा को दो माह बढ़ा दिया गया। सजा मिलने के बाद ओंकार नाथ खरे ने जेल यातनाओं से हार नहीं मानी। उन्होंने 5 माह की नजरबंदी के अलावा 9 अक्टूबर 1942 से लेकर 8 जून 1943 तक रीवा जेल में कठोर कारावास (आड़ा बेड़ी काल कोठरी) की यातना उठाई। इसके अतिरिक्त उन्हें 31 बेंतो की भी सजा सुनाई गई। नंगे शरीर पर लगाई जाने वाली हर बेंत पर ओंकार नाथ खरे इंकलाब जिंदाबाद, भारतमाता की जय और महात्मा गाँधी जिंदाबाद का उद्घोष करते थे। सत्रह वर्षीय किशोर ओंकार नाथ के नंगे बदन पर लगातार 21 बेंतों को लगाए जाने तक वह लहुलुहान होकर बेहोश हो गये। शेष 10 बेंतों की सजा रोक दी गई।

 

 

कई भाषाओं के जानकार थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ

 

जेल में क्रांतिकारी जीवन बिताकर ओंकार नाथ खरे जब बाहर आये तो उन्होंने अवरूद्ध हुई स्कूली पढ़ाई को फिर से शुरू किया। उनकी हिन्दी, संस्कृत, ऊर्दू और अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ थी। छात्रों युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता ऐतिहासिक थी। उनकी एक आवाज पर विन्ध्य का नौजवान आन्दोलित होता था।

 

 

ऐतिहासिक दरबार कॉलेज में चुने गए आजादी के बाद पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छात्र संघ अध्यक्ष

 

सन 1947 में वह सुखद पावन क्षण आया जब 15 अगस्त को देश आजाद हुआ। इस महान अवसर पर क्रांतिवीर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकार नाथ खरे विन्ध्य क्षेत्र के एकलौते शासकीय महाविद्यालय दरबार कालेज के छात्र संघ के अध्यक्ष पद के चुनाव में कुँ अर्जुन सिंह को भारी मतों से पराजित करके विजयी हुये। यह देश की आजादी के बाद ऐतिहासिक चुनाव था। इसे लेकर केवल छात्रों में नहीं बल्कि जनता में भी भारी उत्साह था। इनके अध्यक्ष के रूप में चुने जाने से लोगों में भारी प्रसन्नता थी। श्री श्रीनिवास तिवारी महासचिव चुने गये थे। इनके छात्र संघ के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय स्तर का शिक्षा सम्मेलन हुआ, जिसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ राधाकृष्णन मुख्य अतिथि के रूप में रीवा आए थे जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने थे।

 

 

प्रमुख सहयोगी : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समाजवादी

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकार नाथ खरे विंध्य क्षेत्र के समाजवादी आंदोलन के आधार स्तंभ थे। उनके प्रमुख साथियों में कृष्ण पाल सिंह, जगदीश जोशी, श्रीनिवास तिवारी, राम किशोर शुक्ला, श्रवण कुमार भट्ट, सिद्ध विनायक द्विवेदी, राणा शमशेर सिंह, यमुना प्रसाद शास्त्री, जगदंबा प्रसाद निगम, श्याम कार्तिक, सरजू प्रसाद तिवारी आदि अनेक महत्वपूर्ण लोग थे । जिन्होंने अपनी-अपनी छाप छोड़ी।

 

 

वैवाहिक जीवन

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का श्री ओंकारनाथ खरे का विवाह दमोह में श्रीमती उमा खरे पुत्री श्री राम चंद्र खरे रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर लैंड रिकॉर्ड के‌ साथ 23 फरवरी सन 1952 को महाशिवरात्रि शनिवार के दिन संपन्न हुआ। श्रीमती उमा खरे की मां का नाम सुता बाई था। उन्होंने दमोह शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से कक्षा ग्यारहवीं पास की थी। भाई बहनों में वह सबसे बड़ी थीं। कुल दो भाई और चार बहने थीं। बहनों में लक्ष्मी, श्रीदेवी, सिद्धधात्री, और भाई श्रीकृष्ण और रामकृष्ण थे।

 

 

ताम्रपत्र राष्ट्रीय सम्मान

 

देश की आजादी की रजत जयंती के अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा 15 अगस्त 1972 को देश की आजादी के आंदोलन में विशिष्ट योगदान देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को ताम्रपत्र प्रदान किए गए । इस सिलसिले में पूरे देश मे सम्मान कार्यक्रम किए गए। रीवा संभाग के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानित करने के लिए तत्कालीन संभाग आयुक्त जगत स्वरूप के द्वारा निमंत्रण पत्र दिया गया। संभागीय स्तर पर ताम्रपत्र वितरण करने का कार्यक्रम रीवा कृषि महाविद्यालय के सभाकक्ष में 15 अगस्त 1973 को रखा गया जिसमें तत्कालीन शिक्षा मंत्री मध्य प्रदेश शासन श्री अर्जुन सिंह के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ खरे को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया। दिए गए ताम्रपत्र में लिखा हुआ है कि स्वतंत्रता के 25 वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान के लिये राष्ट्र की ओर से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा यह ताम्रपत्र भेंट किया । रीवा के केंद्रीय कारागार के प्रवेश कक्ष में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सम्मान में उनके नाम की संगमरमर पट्टिका में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकार नाथ खरे का नाम सातवें क्रम पर दर्ज है। रीवा जनपद कार्यालय के प्रांगण में जनपद क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम के शिलालेख में ओंकार नाथ खरे का नाम तीसरे स्थान पर दर्ज है। यह शिलालेख देख रेख के अभाव में काफी जर्जर हो गया है।

 

 

प्रशासनिक सेवा में ईमानदारी से काम किया लेकिन न्याय नहीं मिला

 

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री ओंकार नाथ खरे सन 1953 में विंध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए। सेवा काल के दौरान अपनी स्वतंत्र निर्भीक न्यायप्रिय कार्यशैली के चलते वे बड़े नौकरशाहों के प्रकोप का शिकार बने। करीब 30 वर्ष के शासकीय सेवा काल में उन्हें एक भी पदोन्नति नहीं मिली। उनकी क्षमता और दक्षता के विपरीत आगे बढ़ने के उनके अवसरों का जिस तरह हनन हुआ उससे वह काफी व्यथित थे। देश की आजादी के आंदोलन के इस महान योद्धा के साथ मरणोपरांत न्याय भी नहीं हो सका। धर्मपत्नी श्रीमती उमा खरे के द्वारा इस संबंध में काफी लिखा पढ़ी की गई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। श्रीमती उमा खरे के निधन के बाद भी परिजनों के द्वारा अभी भी लिखा पढ़ी की जा रही लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसे हालात हैं।

 

 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ओंकारनाथ खरे वंश श्रृंखला

 

 

ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय ओंकार नाथ खरे उनके जीवन काल का अंतिम समय नरेंद्र नगर रीवा स्थित 2 एच 3 शासकीय आवास में व्यतीत हुआ। उनका स्वर्गवास 20 अक्टूबर 1990 को हुआ। ओंकार नाथ खरे की धर्मपत्नी श्रीमती उमा खरे का निधन 2 अक्टूबर 2020 को नेहरू नगर रीवा में हुआ। उनकी ज्येष्ठ पुत्री श्रीमती ऊषा सक्सेना पत्नी स्वर्गीय श्याम मोहन सक्सैना, ज्येष्ठ पुत्र श्री अजय खरे (मीसा बंदी), पुत्रवधू डॉ. श्रीमती गायत्री खरे, पुत्री श्रीमती माधुरी लाल पत्नी स्वर्गीय आनंद बिहारी लाल , श्रीमती आभा श्रीवास्तव पत्नी स्वर्गीय राजीव श्रीवास्तव, श्रीमती शोभा सक्सेना पत्नी श्री विश्व मनोहर सक्सेना एवं पुत्र श्री अभय खरे उनकी पावन स्मृति के प्रतीक के रूप में मौजूद हैं। इसके अलावा ज्येष्ठ पुत्री श्रीमती उषा सक्सेना के पुत्र डाॅ सचेत सक्सेना (नाती), डाॅ कनिका (नतवधू), सम्यक सक्सेना (परनाती)और पुत्र संचित सक्सेना ( नाती ) , ज्येष्ठ पुत्र श्री अजय खरे एवं पुत्रवधू श्रीमती डाॅ गायत्री खरे के पुत्र डाॅ अभिषेक खरे (पौत्र), डाॅ अंजली पाण्डेय खरे (पौत्रवधू) और पुत्र अभिजीत खरे (पौत्र) , पुत्री श्रीमती आभा श्रीवास्तव के पुत्र शुभम श्रीवास्तव (नाती) एवं पुत्री काजल श्रीवास्तव (नातिन) , पुत्री श्रीमती शोभा सक्सेना के पुत्र दीप सक्सेना (नाती) भी उनका नाम रोशन कर रहे हैं।

 

 

आजाद भारत में गुमनाम कर दिए गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

 

देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता है। पूरा देश उनके लिए हमेशा ऋणी रहेगा। यह भारी विडंबना है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को देश की आजादी के बाद जो महत्व मिलना चाहिए था , वह नहीं मिला। यह सच है कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपने किसी निहित स्वार्थ के लिए जेल यातनाएं नहीं उठाए बल्कि देश के सभी लोगों के लिए वह आजादी चाहते थे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उन्हें और उनके वंशजों को आजाद भारत में नजरअंदाज किया जाए । आज देखने को यह मिलता है कि आजादी के आंदोलन में जिन लोगों के परिवार का जरा भी योगदान नहीं है , जिन्होंने नाखून तक नहीं कटाया , ऐसे लोग महत्वपूर्ण पदों पर विराजमान हैंं। लोग अपने जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम तक नहीं जानते। यदि किसी जिले में पदस्थ कलेक्टर से वहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम पूछ लिए जाएं तो शायद ही वह कोई नाम बता पाए।

 

 

सर्वोच्च है स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का त्याग बलिदान

 

पराधीनता चाहे किसी व्यक्ति की हो या किसी देश की बहुत दुखद , कष्टकारक होती है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं। इसका मतलब यह है कि जो व्यक्ति पराधीन होते हैं , वे सपने में भी कभी सुखों का अहसास नहीं कर सकते। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घर परिवार सब कुछ छोड़ कर देश के लिए मर मिटते हैं। उन्हें लड़ाई के लिए सारे संसाधन खुद जुटाने होते हैं। उनकी मदद करने में भी लोग डरा करते थे। उन्हें किसी तरह का वेतन भत्ता सुविधाएं नहीं मिला करती थीं। पकड़े जाने पर उन्हें कठोर से कठोर सजा और जेल यात्राएं भुगतनी पड़ती थीं । स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का जीवन कबीर के दोहे की तरह चरितार्थ होता है। कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ , जो घर फूंके आपनौ चले हमारे साथ। उनका फरारी जीवन भी काफी कष्टप्रद रहता था। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सहयोग करने वालों को भी दंडित होना पड़ता था , जिसके चलते लोगों में भय व्याप्त रहता था। स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वालों और उनके परिवार पर ब्रिटिश हुकूमत का प्रकोप बना रहता था। सरकार के पास स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजनों की सूची तक नहीं है। जिन्होंने देश को आजादी आजादी दिलाई उनको अनाम बना दिया जाना, अनदेखा करना देश के लिए बहुत गलत संदेश है। देश के स्वतंत्रता एवं गणतंत्र दिवस पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करना महज एक रस्म अदायगी रह गई है। ज्ञात अज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और उनके परिजनों के प्रति सरकार और जनसाधारण का रवैया सही होना जरूरी है। जिस देश में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान का सही मूल्यांकन नहीं होता वहां आजादी की कीमत कोई नहीं समझेगा। आजाद देश में रक्षा के लिए सेना होती है लेकिन जब कभी देश गुलाम होता है तो सेना नहीं, स्वतंत्रता सेनानी ही देश को गुलामी से छुटकारा दिलाते हैं , मुक्तिदाता बनकर सामने आते हैं।

 

 

रस्म अदायगी बन गया स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सम्मान

 

यह भारी विडंबना है कि देश में कुछ गिने-चुने नामों के अलावा स्थानीय स्तर पर किसी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाम का उल्लेख नहीं होता है। शैक्षणिक कार्यक्रमों में भी कहीं उनका जिक्र नहीं होता है। आमतौर पर देखा गया है कि शासन प्रशासन की किताबों में भी उनका नाम नहीं आ पाता है। देश की आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले क्रांतिवीर ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय ओंकार नाथ खरे के योगदान को सही तरीके से रखे जाने की जरूरत है।आजादी के आंदोलन के अमृत महोत्सव वर्ष के मौके पर ऐसे क्रांति वीरों के बारे में लोगों को कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई और जन्म शताब्दी के मौके पर भी प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। केंद्र और राज्य सरकार के द्वारा ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के नाते स्वर्गीय ओंकारनाथ खरे को आजीवन सम्मान पेंशन दी गई लेकिन राज्य शासन का प्रशस्ति-पत्र 53 साल बाद भी घर नहीं पहुंचा। उनकी धर्मपत्नी उमा खरे को नियमानुसार आजीवन सम्मान पेंशन जारी की गई। लेकिन 2 अक्टूबर 2020 को इनके निधन पर प्रशासन ने किसी तरह की औपचारिकता नहीं निभाई। परिजनों को स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस के मौके पर कभी याद नहीं किया गया। यहां तक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कक्ष से भी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही।

( लेखिका डॉ अंजली पाण्डेय खरे पत्नी डॉ अभिषेक खरे, ताम्रपत्रधारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय ओंकार नाथ खरे की ज्येष्ठ पौत्रवधू एवं लोकतंत्र सेनानी श्री अजय खरे की ज्येष्ठ पुत्र वधू हैं)

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