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मुल्क की बेबसी पे …

कैसे कहे कि नाज है हिन्द पे
जब गहरे ज़ख़्म हो जिस्म पे

लाख पहरा हो तुम्हारी सरहदों पे
यहाँ तो लुट रही है अस्मत सड़कों पे

तुम्हारे भाषण गूंजते हैं चौपालों पे
यहाँ चीखें ही चीखें हैं हर गली चौराहों पे

अब तो शक होता है उस इंसानियत पे
जो जिस्म से खेलती है सभ्यता की चौखट पे

तुम्हें गर्व है अपनी शोहरत और ताकत पे
हमें शर्म है इंसानियत के बेबस हालतों पे

तुम्हें फख्र होगा अपनी शान- शौकत पे
हम तो शर्मिंदा हैं मुल्क की बेबसी पे

हम तो शर्मिंदा हैं मुल्क की बेबसी पे …

केएम भाई

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