अमेरिका किसी भी हालत में इजराइल को परमाणु शक्ति नहीं बनने देना चाहता है। बाकायदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को धमकी दे दी है कि ईरान का आसमान उनके कब्जे में है। ईरान के अमेरिका के दबाव में न आने की स्थिति में अमेरिका खुलकर इजरायल का साथ दे सकता है। दरअसल इजरायल और ईरान के बीच चल रहे तनाव में अमेरिका की भूमिका को लेकर कई खबरें और अटकलें सामने आ रही हैं। हाल के घटनाक्रमों के आधार पर, इजरायल ने 13 जून को ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिसे “ऑपरेशन राइजिंग लॉयन” नाम दिया गया। इन हमलों में ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें कई वरिष्ठ सैन्य कमांडर और परमाणु वैज्ञानिक मारे गए।
अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि वह इन हमलों में शामिल नहीं था और उसकी प्राथमिकता मध्य पूर्व में अपने सैनिकों और हितों की सुरक्षा है। हालांकि कुछ सूत्रों के अनुसार, इजरायल ने ट्रंप प्रशासन से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करने के लिए सैन्य अभियान में शामिल होने का अनुरोध किया है। इसके बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने सार्वजनिक रूप से इस अनुरोध पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी है, और कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने इनकार किया है कि अमेरिका अभी इस संघर्ष में शामिल होने जा रहा है।
एक्स पर कुछ पोस्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका इस युद्ध में परोक्ष रूप से शामिल है और इजरायल को सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है, जैसे कि हवाई क्षेत्र के उपयोग की अनुमति देना या रणनीतिक समर्थन। उदाहरण के लिए, यह कहा गया कि इजरायल के हवाई हमलों के लिए सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के हवाई क्षेत्र का उपयोग संभवतः अमेरिका की सहमति के बिना नहीं हो सकता। इसके अलावा, मध्य पूर्व में अमेरिका के 19 सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें यूएई, कतर, बहरीन, और सऊदी अरब जैसे देश शामिल हैं, जो इसे क्षेत्र में त्वरित सैन्य कार्रवाई की क्षमता प्रदान करते हैं।
हालांकि, कुछ पोस्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका ने इजरायल के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया। दूसरी ओर, अमेरिका ने पहले ही क्षेत्र से अपने कुछ गैर-जरूरी कर्मियों और सैनिकों को हटाना शुरू कर दिया था, जो संभावित बड़े संघर्ष की आशंका को दर्शाता है।
अमेरिका की इजरायल के प्रति दीर्घकालिक नीति भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। 1960 के दशक से अमेरिका इजरायल का मजबूत समर्थक रहा है, जो उसे सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, 2020 में अमेरिका ने इजरायल को 3.8 बिलियन डॉलर की सैन्य सहायता दी, जिसमें आयरन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए 500 मिलियन डॉलर शामिल थे। हाल के वर्षों में, अमेरिका ने इजरायल को F-15, F-16, और F-35 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान और बंकर-बस्टर बम प्रदान किए हैं, जो ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
इसके अलावा, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और इजरायल की चिंताएं समान हैं। दोनों देश ईरान के परमाणु हथियार विकसित करने की संभावना को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं। ट्रंप ने कहा है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना उनकी प्राथमिकता है, और इसके लिए “बंकर-बस्टर” बमों का उपयोग एक विकल्प हो सकता है, क्योंकि इजरायल के पास ईरान की अंडरग्राउंड परमाणु सुविधाओं, जैसे फोर्डो, को नष्ट करने की पर्याप्त क्षमता नहीं है।
हालांकि, यह कहना कि अमेरिका अन्य देशों की लड़ाई में “कूद चुका है” पूरी तरह सटीक नहीं हो सकता। अभी तक अमेरिका ने प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप से परहेज किया है, लेकिन उसकी रणनीतिक मौजूदगी और इजरायल को दी जाने वाली सहायता उसे इस संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। इसके अलावा, क्षेत्र में ईरान समर्थित समूहों, जैसे लेबनान में हिजबुल्लाह, यमन में हौथी, और इराक/सीरिया में मिलिशिया, के साथ तनाव भी अमेरिका को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।
भारत की स्थिति इस मामले में तटस्थ रही है। भारत ने दोनों देशों से तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान की दिशा में काम करने की अपील की है, क्योंकि इस युद्ध का असर भारत के तेल आयात और क्षेत्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।

