राम का सारा लुटा ख़ज़ाना,
काला धन कब आएगा?
पंद्रह लाख की मीठी बातें,
अब हिसाब कौन बताएगा?
वादों की ऊँची मीनारों पर,
सपनों का व्यापार हुआ,
जनता ताली बजाती रह गई,
नारों का बाज़ार हुआ।
चौकीदारी के किस्से गूँजे,
ढोल बहुत दिन बजता रहा,
महँगाई की धूप में लेकिन,
आम आदमी ही जलता रहा।
कभी विकास की रेल चली थी,
अब तस्वीरों का शोर बहुत,
रोटी छोटी, बातें लंबी,
जनमन पर है बोझ बहुत।
योगी जी का डंका बजता,
कानून-व्यवस्था की गाथा,
पर बेरोज़गारों की आँखों में,
अब भी अधूरी है परिभाषा।
बुलडोज़र की धूल उड़ी तो,
सवाल कई दबते गए,
रोज़गार की राहें पूछो,
उत्तर सारे छिपते गए।
मंदिर ऊँचा, मन क्यों सूना?
यह भी कोई पूछे आज,
राम अगर सच में आ जाएँ,
क्या होंगे सबसे खुश मिज़ाज?
राम कहेंगे—”नाम हमारा,
मत बाँटो हर गाँव-नगर,
राजधर्म का अर्थ यही है,
सबका हो सम्मान अमर।”
सिंहासन का धर्म यही है,
जनहित सबसे पहले हो,
सत्ता केवल शान न बने,
जनता का भी मेल हो।
राम का सारा लुटा ख़ज़ाना,
काला धन कब आएगा?
वादों की इस लंबी राह का,
अंत कहाँ दिख पाएगा?
व्यंग्य यही है, प्रश्न यही है,
लोकतंत्र की यही पुकार—
जो भी सत्ता में बैठे, उससे
माँगे जनता साफ़ जवाब।
- ऋषभ कुमार “गुमनाम”

