चरण सिंह
क्या हो गया है अखिलेश यादव को अब जानकारी मिल रही है कि समाजवादी पार्टी 10 साल बनाम पांच साल अभियान चलाने जा रही है। मतलब योगी आदित्यनाथ के 10 साल से अखिलेश यादव के पांच साल के कार्यकाल की तुलना की जाएगी। भाई समझ में नहीं आता 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव अपने पांच साल के कार्यकाल के कामकाज गिना रहे थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी अपने पांच साल के कार्यकाल का ढोल पीट रहे थे। चुनाव जीत गए क्या ? जब 2017-2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के कार्यकाल को लोगों ने नहीं सुना तो फिर 2025 के विधानसभा चुनाव में क्या सुनेंगे ? ऐसे में प्रश्न उठता है कि आख़िरकार अखिलेश यादव को यह चुनाव जीतने के लिए क्या करना चाहिए ?
दरअसल अखिलेश यादव की एक बड़ी कमजोरी यह है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी का स्वरूप ही बदल दिया है। उन्होंने एक तो मुलायम सिंह यादव के समय के अधिकतर नेताओं को साइडलाइन कर दिया है। जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर प्रॉपर्टी डीलर और चाटुकार लोगों को ज्यादा तवज्जो देते हैं। दूसरे पार्टी में आंदोलन नाम की कोई चीज रह गई है।
यह भी दिलचस्प है कि अखिलेश यादव ने कॉकरोच जनता पार्टी के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को चल रहे आंदोलन को समर्थन तो दिया है पर इस मुद्दे पर अपने कार्यकर्ता सड़कों पर नहीं उतारे।
अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश में एक नहीं अनेक अवसर मिले पर वह आंदोलन करने के बजाय बयानबाजी पर ज्यादा फोकस करते हैं। अब जब राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला बड़ा मुद्दा है तब भी प्रदेश में आंदोलन नहीं कर पा रहे हैं। पता चला है कि अखिलेश यादव एक रथयात्रा निकालने जा रहे हैं। यह यात्रा वह किसी धार्मिक स्थल से निकालेंगे। स्वभाविक है कि राम मंदिर से ही निकालेंगे । यह भी अपने आप में दिलचप्स है कि अब अखिलेश यादव सनातनी समाजवादी बोलने लगे हैं। अखिलेश यादव यह भूल रहे हैं कि हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी ने पीएचडी कर रखी है और समाजवादी ककहरा भी नहीं जानती। समाजवादी पार्टी की ताकत धर्मनिरपेक्षता है। कहीं ऐसा न हो अखिलेश यादव के सनातनी बनने के चक्कर में मुस्लिम वोटबैंक उनसे बिदक जाए। वैसे भी आजम खां के मामले में बड़े स्तर पर मुस्लिम अखिलेश यादव से नाराज हैं।
दरअसल अखिलेश यादव सोच रहे हैं कि राम मंदिर में चंदा चोरी के मामले में बीजेपी से नाराज उसके वोटबैंक को सपा की ओर लाया जा सकता है। विशेषकर पिछड़ों पर दलितों को। अखिलेश यादव भूल रहे हैं कि बीजेपी से कटने वाला उसका वोटबैंक सनातनी बनने पर नहीं बल्कि बीजेपी से नाराजगी की वजह से अखिलेश को मिल सकता है। यदि अखिलेश यादव सनातनी बनने की कोशिश करेंगे तो हो सकता कि बीजेपी से नाराज वोटबैंक अखिलेश यादव को भी मंदिर में चंदा चोरी करने वाले सनातनी की तरह समझने लगें। चंदा चोरी करने वाले लोग तो भी अपने को सनातनी बोलते थे। वैसे भी बीजेपी के नेता कर उनके समर्थक अखिलेश यादव को टोंटी चोर कहकर कहकर संबोधित करते हैं।
अखिलेश यादव को अब चंदा चोरी, शिक्षा और चिकित्सा समेत जमीनी मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर जाना चाहिए। आंदोलन के बिना सत्ता प्राप्त नहीं की जा सकती है।

