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आखिर ऐसी क्या जिसकी पर्दादारी है?

अभी पिछले महीने की ही तो बात है मुख्यधारा का मीडिया खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कराची इस्लामाबाद पर भारतीय सेना का कब्ज़ा करना दे रहा था तो कोई पाकिस्तान के शहर तबाह करा दे रहा था तो कोई पाकिस्तान के सैन्य अधिकारी मुनीर के खिलाफ वहां का सेना में विद्रोह करा दे रहा था तो वहां की प्रमुख हस्तियों को बंकर में छिपा दे रहा था जो कि सामान्य प्रक्रिया है। खुद को सबसे तेज चैनल होने का दावा करने वाले खबरिया चैनल ने तो पाकिस्तान में सेना का प्रवेश ही करा दिया था जबकि दोनों देशों की सेनाएं अपने अपने एयर स्पेस से ही सैन्य कार्रवाई कर रही थीं और सेना प्रमुखों ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा भी था कि, हमने सिर्फ और सिर्फ आतंकवादी ठिकानों पर ही हमले किए थे। फिर क्यूं हमारे चैनलों ने आधे से ज्यादा पाकिस्तान पर भारत का कब्ज़ा करा दिया और केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बतौर सूचना और प्रसारण मंत्री खबरियां चैनलों की ‘पीठ थपथपाई’ कि उन्होंने भारतीय सेना का साथ दिया। यही नहीं दर्जनों अवसर पर मुख्यधारा के तमाम चैनलों ने समय-समय पर ग़लत खबरें चलायीं, भ्रामक जानकारी दी। मसलन दो हज़ार के नोटों में चिप होने के, कोविड-19 के दौरान ‘थूंक जेहाद’ व बिना जांच पड़ताल के रामदेव की कोरोनिल को कोरोना के उपचार की दवा के दावे को हवा देना, सुशांत सिंह राजपूत की संदेहास्पद स्थिति में मौत को हत्या बताना व शाहरुख खान के बेटे के नशीले पदार्थ के केस में फंसाये जाने का मामला कोर्ट में टिक नहीं पाया। कोर्ट में मीडिया की थ्योरी गलत साबित हुई। पर सरकार ने मीडिया के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। याद करिए जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार मामले को। एक चैनल ने तो बाकायदा मुहिम छेड़ रखी थी। इस मामले का क्या हुआ कोई चैनल नहीं बता रहा है। कुछ ऐसी ही एक पक्षीय रिपोर्टिंग दिल्ली सरकार की आबकारी नीति को लेकर हुई। इस तरह के चैनलों के खिलाफ कार्रवाई करने के
बल्कि सरकार ने ऐसे चैनलों व एंकरों को पुरस्कृत किया। वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में जमींनी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को दंडित किया, झूंठे मुकदमों में फंसाया गया। यूपी की योगी सरकार ने मिड डे मील में नमक रोटी खिलाएं जाने की खबर छापने वाले पत्रकार को जेल में ठूंस दिया तो हाथरस की बलात्कार की शिकार नवयुवती को सरकारी तंत्र द्वारा मिट्टी का तेल छिड़क कर जला देने की घटना को कवर करने आए पत्रकार सिद्दीक कप्पन को मौके पर पहुंचने से पहले जेल में डाल दिया गया। वे कई महीनों तक बंद रहे।
ताज़ा मामला कई न्यूज चैनलों अपनी सेवाएं देने के बाद खुद का यूट्यूब चैनल चलाने वाले अजित अंजुम का है। अंजुम पिछले कुछ दिनों से बिहार में ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे। जैसा कि वो अक्सर करते हैं। यानी मौके पर जाते हैं। ऐसे बहुत कम पत्रकार ख़ासकर अपना यूट्यूब चैनल चलाने वाले। बमुश्किल दो-तीन दिन पहले उन्होंने बिहार के कई जिलों का दौरा करा चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्यक्रम की जानकारी देते हुए इसमें बरती जा रही अनियमितता को क्या किया उनके ख़िलाफ़ बेगूसराय में एफआईआर दर्ज करा दी गई। इसके पहले धमकी दी गई कि वे अपने वीडियो को डिलीट करें। उन्होंने ऐसा नहीं किया तो एफआईआर दर्ज कराई गई। अब सवाल उठता है कि आखिर अंजुम ने ऐसा कौन-सा ग़लत काम कर दिया! दर्जनों बीएलओ (बूथ लेवल आफिसर) से बातचीत करने के बाद वो उक्त बीएलओ के पास गए और दो फार्म दिये जाने व एक लेकर दूसरा मतदाताओं को दिए जाने की बात पूछी और उसके कार्यालय के बाहर बैनर के रूप में चस्पा सूचनाओं को पढ़ा ही तो था। इसमें कौन सा गुनाह है? सवाल करना फिर सवाल पर सवाल पूछना गुनाह है क्या वो एक पत्रकार द्वारा? ध्यान देने वाली बात यह है कि भाषा बताती है कि एफआईआर एक अदना से अधिकारी से करवाई गई। एफआईआर में पत्रकार शब्द का उल्लेख कहीं नहीं है। जबकि अजित अंजुम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पहले प्रिंट मीडिया में अपनी सेवाएं देते रहे। वे धर्मयुग, दिनमान साप्ताहिक हिंदुस्तान, जनसत्ता व रविवार में छपते रहे। अमर उजाला में काम करने से पहले चौथी दुनिया में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वे लंबे समय तक न्यूज़-24 में संपादक की हैसियत से जुड़े रहे। अंजुम को यूट्यूबर कहना उनके लंबे पत्रकारिता जीवन का मज़ाक़ उड़ाना ही है। बहरहाल … क्या कैमरे के सामने सवाल पूछना, दीवार पर छपे पोस्टर/बैनर की इबारत को पढ़ना अपराध है? क्या अंजुम ने बीएलओ के हाथों से फार्म छीना, हाथापाई की? एफआईआर एक मुसलमान समुदाय के बूथ लेवल आफिसर से करवाई गई ताकि मामले को हिंदू मुसलमान का रूप दिया जा सके। यहीं पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि ज्यादातर यूट्यूब चैनल चलाने वाले साधन विहीन होते हैं, न पर्याप्त कर्मचारी होते हैं और न ही पैसा। मुख्यधारा के चैनल को तो गले तक सरकारी विज्ञापन मिलता है पर यूट्यूबरों के यहां सूखा रहता है। वो जो भी करते हैं अपने और अपनों के सहयोग से।
शायद यही कारण है कि आज प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में 180 देशों की सूची में विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े हम 151वें पायदान पर हैं।

अरुण श्रीवास्तव

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