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दिल्ली समाजवादी बिरादरी का एक खंभा ढह गया

साथी श्याम गंभीर‌ को दिल्ली के सोशलिस्ट दिल्ली नगर निगम बोध घाट पर आज‌ जब अंतिम विदाई‌ दे रहे थे, ‌ तो सभी साथी‌ तकलीफ के साथ ‌ उसके साथ जुड़ी हुई अपनी यादों को एक दूसरे को सुना रहे थे। ‌दिल्ली के हमारे सोशलिस्ट नेता सांवल दास गुप्ता‌‌ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में 1967 मे चांदनी चौक संसदीय चुनाव क्षेत्र से‌ चुनाव लड़ रहे थे मैं उनका चुनाव संयोजक था,। श्याम का घर ‌ कटरा मेदिरान‌ खारी बावली में था जो कि इसी लोकसभा क्षेत्र‌ के अंतर्गत आता था,‌ इस दौरान ‌ श्याम से मुलाकात हुई। ‌ सांवल दास गुप्ता जी गली आर्य समाज, सीताराम बाजार स्थित दिल्ली नशाबंदी केंद्र‌ से अपनी राजनीतिक गतिविधियों को संचालित करते थे‌। श्याम ने दिल्ली के दयाल सिंह कॉलेज में दाखिला ले लिया था, ‌ हैदराबाद में ‌ समाजवादी युवजन सभा का‌ राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित था, ‌‌ मैंने ‌ उनको सम्मेलन में चलने का ‌ इसरार किया ‌ तथा पहली बार ‌ श्याम समाजवादियों की ‌ और से आयोजित किसी सम्मेलन में गए।

‌ 60 के दशक में‌ शायद ही कोई ऐसा दिन जाता था जब ‌ दिल्ली के सोशलिस्ट‌ किसी ‌ धरने,प्रदर्शन‌, जुलूस सभा‌,‌ मोर्चे, ‌ जेल जाने ‌‌ में न लगे होते। कांग्रेस पार्टी ‌ की ओर से किसी तरह का संघर्ष करने का तो कोई सवाल ही नहीं था, ‌ भारतीय ‌ जनसंघ पार्टी ‌ भी ‌ दिल्ली के गरीबों, झुग्गी झोपड़ियां, ‌ पुलिस ‌ जुल्म‌ ज्यादतियों, ‌ कामगारों मजदूरो‌ के सवाल पर कोई संघर्ष नहीं करती थी। ‌ सांवल दास गुप्ता जी ऐसे नेता थे जिनके दफ्तर में ‌ ‌ हर रोज किसी न किसी संघर्ष मोर्चे ‌ की योजना बनती थी। दिल्ली के साथी निरंतर संघर्ष के मोर्चे पर डटे रहते थे‌। लाठी चार्ज‌ मैं घायल होने तथा जेल जाने‌ का सिलसिला बना रहता था। श्याम गंभीर ‌ उन सभी मोर्चे में सदैव शामिल रहता था। दिल्ली में पटरी रेड़ी खोमचा ‌यूनियन जिसके अध्यक्ष पंडित हारस्वरूप शर्मा होते थे,‌ उनकी ओर से भी मोर्चा ‌ लगता रहता था, वहां‌ नियमित पहुंचने वालों में‌ श्याम भी शामिल रहते थे।‌ उन दिनों‌ पुलिस जुल्म ज्यादतियों के खिलाफ‌ ‘हंगामी जलसा,'(आम जन सभा)‌‌ का आयोजन अक्सर दिल्ली में होता रहता था।

श्याम गंभीर पर समाजवादी जुनून‌ चढ़ा रहता था। उनके घर के पास खारी बावली में किराना मार्केट के जो मजदूर हाथठेले‌‌ चलाते थे‌ उनकी एक यूनियन ‌ ‌ साथी रतन चंद जो खुद भी मजदूर थे ‌‌ बनी हुई थी। उस समय ‌ टेलीविजन इंटरनेट मोबाइल वगैरा का इजाद नहीं हुआ था,‌ जनसंपर्क का सबसे बड़ा साधन जनसभाएं होती थी। चांदनी चौक संसदीय चुनाव क्षेत्र में,‌ जामा मस्जिद, घंटाघर चांदनी चौक,‌ ‌ होज काजी चौराहा, खारी बावली‌, बारह टूटी चौक,‌ पर अक्सर हंगामी जलसो‌ का आयोजन होता था। शहर के लोग बड़ी तादाद में सोशलिस्टों की ‌ इन सभाओं में, सुनने के लिए‌ जुडते थे। सभा में कोई ना कोई ‌‌ सोशलिस्ट संसद सदस्य जो दिल्ली में ‌ रहता था उनको उसमें बोलने के लिए बुलाया जाता था। ‌ बेखौफ होकर वक्ता‌ सरकार, पुलिस, मालिकों के खिलाफ ‌ तकरीर करते थे। देर रात तक यह जलसे चलते थे।‌ उस समय‌ देर रात्रि को आवागमन का कोई साधन नहीं होता था‌। सभा समाप्ति के बाद‌ वही ‌ खड़े हाथठेले‌ पर हम लोग सो जाते थे।‌ नशाबंदी समिति ‌ के कार्यालय में ही श्याम का संबंध रेनू से जुड़ा, ‌‌ रेनू ‌ ईसाई धर्म में यकीन रखती थी, ‌ श्याम ‌ ब्राह्मण परिवार ‌से थे,‌ इसके बावजूद ‌ उन्होंने शादी कर ली। ‌

श्याम की संगत में रेनू ऐसी समाजवादी रंग ‌ मैं रंगी कि वे ‌ भी पूरी तरह आंदोलन के साथ जुड़ गई। ‌ हर संघर्ष में वह मोर्चे में शामिल रहती थी।‌ श्याम दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‌ गैर शिक्षक कार्यरत होकर‌ कर्मचारी यूनियन के संघर्षों से भी जुड़ गए। उनको मजदूर‌ कानून की गहरी जानकारी थी, ‌ मैंने देखा था कि अक्सर उनके पास दिल्ली यूनिवर्सिटी के कर्मचारी अपनी-अपनी समस्या के लिए ड्राफ्ट बनवाने के लिए आते रहते थे। अपने राजनीतिक जीवन के इस लंबे दौर में एक पल के लिए भी वे कभी समाजवादी तहरीक से अलग नहीं हुए। शुरू में उनका जुड़ाव सोशलिस्ट नेता राज नारायण जी ,‌ तथा मनीराम बागड़ी जी से ‌ था‌। 1967 में हिसार से लोकसभा चुनाव हारने के बाद मनीराम बागड़ी मथुरा‌ संसदीय चुनाव क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। रिपब्लिकन पार्टी के नेता श्री बुद्ध प्रिय मोर्य‌ उनके मुख्य चुनाव संचालक थे। दिल्ली से मैं,‌ ललित गौतम और श्याम उनके प्रचार चुनाव प्रचार में शिरकत करने के लिए गांव देहात में धूल फांकते थे। परंतु कभी भी इन मुश्किलों का सामना करते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई।

मुलायम सिंह यादव जी ने ‌ समाजवादी पार्टी बनाई‌ तो उनको दिल्ली पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त किया। अपने आखिरी दौर में भी वे ‌ अस्वस्थ रहते हुए ‌ सोशलिस्ट पार्टी‌आफ इंडिया,‌ के साथ जुड़कर‌ प्रचार प्रसार में जुटे रहते थे। दिल्ली‌ मैं समय-समय पर बनने वाले‌ नागरिकों के मोर्चे,‌ मे भी वे बड़ी शिद्दत के साथ जुड़े रहते थे। आज निगम बोघ घाट पर बड़ी संख्या में तिब्बती ‌ नागरिकों ने अपने श्रद्धा सुमन‌ अर्पित किए। तिब्बती संस्थाओं द्वारा जब कभी तिब्बत के सवाल पर कोई भी संघर्ष हुआ वे सदैव उनके साथ खड़े रहे इसी कारण आज वे‌ वहां पर आए थे। श्याम का घर एक माने में‌ सोशलिस्टों का एक अड्डा ही था। हर तरह की मदद वह अपने साथियों की किया करते थे। वह एक बेखौफ लड़ाकू साथी थे, ‌ तमाम उम्र उन्होंने समाजवादी विचार दर्शन के प्रचार प्रसार में लगाई,‌ समाजवादी समागम जो प्रमुख रूप से इसी कार्य में लगा रहता है उसके वे उपाध्यक्ष भी थे। उनके संघर्षों का लंबा इतिहास है,‌ किस-किस को लिखूं। ‌ उनके जाने से ‌ दिल्ली की समाजवादी बिरादरी ‌ ने सचमुच में ऐसा साथी खोया है जिसकी पूर्ति शायद ही हो।

– राजकुमार जैन

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