हर साल रावण जलाते हैं, लेकिन अपने भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या और नफ़रत को कब जलाएँगे? हर साल दशहरा आता है। चारों तरफ उत्सव का माहौल होता है। बाजार सजते हैं, रामलीलाओं का आयोजन होता है और शाम होते ही रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतले आग के हवाले कर दिए जाते हैं। आसमान आतिशबाजी से जगमगा उठता है। लोग तालियाँ बजाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। लेकिन इस उत्सव के बीच मन में एक सवाल बार-बार उठता है—क्या सचमुच रावण का अंत हो गया है? अगर रावण हर साल जलता है, तो फिर हमारे समाज में बुराइयाँ क्यों बढ़ती जा रही हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि हम हर साल मैदान में खड़े रावण के पुतले को तो जला देते हैं, लेकिन अपने भीतर बैठे रावण को बचाकर रखते हैं? हम दूसरों की बुराइयाँ गिनने में पूरी जिंदगी बिता देते हैं, लेकिन कभी अपने भीतर झाँककर नहीं देखते। हम चाहते हैं कि दुनिया बदल जाए, लोग सुधर जाएँ, रिश्तों में मिठास आ जाए और हर तरफ प्रेम ही प्रेम हो। लेकिन जब बदलाव की शुरुआत खुद से करने की बात आती है, तो हम पीछे हट जाते हैं। आखिर अपने अंदर का रावण कब जलाओगे?
रावण केवल दस सिरों वाला पुतला नहीं है— हमारे लिए रावण दस सिरों वाला एक ऐसा पात्र है, जिसे हर साल दशहरे पर जलाया जाता है। लेकिन यदि हम जीवन की गहराई में उतरकर देखें, तो रावण केवल एक पुतला नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद उन बुराइयों का प्रतीक है, जो उसे इंसान से हैवान बना देती हैं। अहंकार उसका एक सिर है, ईर्ष्या दूसरा, क्रोध तीसरा, लालच चौथा, छल-कपट पाँचवाँ, झूठ छठा, स्वार्थ सातवाँ, अन्याय आठवाँ, अपमान करने की प्रवृत्ति नौवाँ और दूसरों के दुख से बेपरवाह हो जाना दसवाँ सिर है। इनमें से कोई एक भी बुराई जब हमारे व्यक्तित्व पर हावी हो जाती है, तो हमारे भीतर का रावण जीवित हो उठता है। हम मंदिर जाते हैं, पूजा-पाठ करते हैं, व्रत रखते हैं और धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। लेकिन उसी दिन यदि हमारी वाणी किसी का दिल दुखा दे, हमारा व्यवहार किसी को अपमानित कर दे या हमारा अहंकार किसी रिश्ते को तोड़ दे, तो हमें अपने धर्म के वास्तविक अर्थ पर विचार करना चाहिए।
*धर्म केवल पूजा करने का नाम नहीं है, धर्म अपने व्यवहार से किसी के जीवन में सुख और शांति लाने का नाम भी है।*भगवान के सामने सिर झुकाना आसान है, लेकिन किसी अपने से गलती होने पर अपनी गलती स्वीकार करना कठिन है। मंदिर में दान करना आसान है, लेकिन किसी जरूरतमंद की मदद करते समय अपना अहंकार छोड़ना कठिन है। यही वह जगह है, जहाँ हमारी धार्मिकता और हमारी इंसानियत की परीक्षा होती है।
दूसरों के रावण को पहचानते हो, अपने को कब पहचानोगे? —आज हमारे समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। हर व्यक्ति दूसरे की गलती पकड़ने के लिए तैयार बैठा है। किसी की छोटी-सी भूल भी उसे बड़ी दिखाई देती है, लेकिन अपनी बड़ी गलती के लिए उसके पास हजारों बहाने होते हैं। दूसरा व्यक्ति गुस्सा करे, तो वह बदतमीज है। हम गुस्सा करें, तो कहते हैं कि हमें मजबूर किया गया था। दूसरा व्यक्ति अपने लिए आवाज उठाए, तो वह घमंडी है। हम अपने लिए आवाज उठाएँ, तो वह हमारा अधिकार है। दूसरा व्यक्ति आगे बढ़ जाए, तो हमें उससे ईर्ष्या होने लगती है। लेकिन हम आगे बढ़ जाएँ, तो हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया हमारी प्रशंसा करे। दूसरे की खुशियाँ हमें कभी-कभी इसलिए भी खटकती हैं, क्योंकि हम उसकी सफलता में अपनी असफलता देखने लगते हैं। यही तो हमारे भीतर का रावण है! हम चाहते हैं कि लोग हमारी भावनाओं को समझें, लेकिन हम दूसरों की भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं करते। हम चाहते हैं कि लोग हमारा सम्मान करें, लेकिन किसी दूसरे का सम्मान करने में हमारा अहंकार आड़े आ जाता है। हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमारा कहना मानें, हमारे जीवनसाथी हमारी भावनाओं का सम्मान करें, हमारे रिश्तेदार हमारी प्रशंसा करें और समाज हमें अच्छा इंसान माने। लेकिन क्या हमने कभी खुद से पूछा है कि हम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं?
*सम्मान माँगने से पहले सम्मान देना सीखिए। प्रेम पाने से पहले प्रेम बाँटना सीखिए। और दूसरों को बदलने की इच्छा रखने से पहले स्वयं को बदलने का साहस जुटाइए।
सबसे खतरनाक रावण अहंकार है—रावण विद्वान था। उसके पास ज्ञान था, शक्ति थी और वैभव था। लेकिन उसका अहंकार उसके पतन का कारण बना। आज भी मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी उसका अहंकार ही है। किसी के पास धन आ जाता है, तो वह गरीब को अपने से छोटा समझने लगता है। किसी को पद मिल जाता है, तो वह अपने अधीन काम करने वालों को तुच्छ समझने लगता है। किसी को सुंदरता का अभिमान हो जाता है, तो वह दूसरों की कमियों पर हँसने लगता है। किसी को अपनी शिक्षा पर गर्व होता है, तो वह कम पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात सुनना भी पसंद नहीं करता। लेकिन जीवन का एक सत्य हमें हमेशा याद रखना चाहिए—समय किसी एक व्यक्ति का होकर नहीं रहता। आज जो कुर्सी पर बैठा है, कल उसे भी उतरना पड़ सकता है। आज जिसके पास धन है, कल उसकी परिस्थितियाँ बदल सकती हैं। आज जो दूसरों की मजबूरी पर हँसता है, कल उसे भी किसी के सहारे की जरूरत पड़ सकती है। फिर किस बात का अहंकार? हम जिस शरीर पर गर्व करते हैं, वह एक दिन मिट्टी में मिल जाना है। जिस धन को इकट्ठा करने के लिए हम रिश्तों की परवाह करना छोड़ देते हैं, वह धन भी हमारे साथ नहीं जाएगा। जिस पद के लिए हम दूसरों को अपमानित करते हैं, वह पद भी हमेशा हमारे पास नहीं रहेगा। अंत में हमारे पास वही बचता है, जो हमने अपने व्यवहार, अपने प्रेम और अपने कर्मों से कमाया होता है। इसलिए अपने भीतर के अहंकार को समय रहते जला दीजिए। कहीं ऐसा न हो कि जीवन बीत जाए और हमें पता ही न चले कि हमने अपने अहंकार को बचाते-बचाते कितने सुंदर रिश्ते खो दिए।
वाणी का रावण सबसे अधिक रिश्ते जलाता है
कभी-कभी हम सोचते हैं कि हमने किसी को मारा नहीं, किसी का धन नहीं छीना और किसी का बड़ा नुकसान नहीं किया। इसलिए हम अच्छे इंसान हैं। लेकिन क्या किसी को अपमानित करना नुकसान पहुँचाना नहीं है? क्या किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाना हिंसा नहीं है? क्या किसी के विश्वास को तोड़ देना उसके मन को चोट पहुँचाना नहीं है? हमारी जुबान से निकले शब्द कभी-कभी ऐसे घाव दे जाते हैं, जिनका दर्द वर्षों तक बना रहता है। शरीर पर लगी चोट समय के साथ भर सकती है, लेकिन अपने ही व्यक्ति से मिले अपमान की याद मन में लंबे समय तक रह सकती है। एक कटु वचन वर्षों के रिश्ते में दरार डाल सकता है। एक अपमान किसी का आत्मविश्वास तोड़ सकता है। एक झूठ किसी के विश्वास को हमेशा के लिए समाप्त कर सकता है। इसीलिए कहा जाता है कि शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करना चाहिए। बोलने से पहले एक क्षण रुककर सोचिए कि जो शब्द आप कहने जा रहे हैं, क्या उन्हें सुनकर सामने वाले का मन टूट जाएगा? क्या आपकी बात किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाएगी? क्या वही बात आप अपने लिए सुनना पसंद करेंगे? यदि उत्तर नहीं है, तो उन शब्दों को अपने भीतर ही रोक लीजिए। याद रखिए, हर सच को अपमानजनक तरीके से कहना जरूरी नहीं और हर बहस को जीतना भी जरूरी नहीं। कभी-कभी रिश्ते को बचा लेना, बहस जीतने से कहीं बड़ी जीत होती है।*इस दशहरे पर अपनी वाणी के रावण को जलाने का संकल्प लीजिए।
रिश्तों में छिपा रावण—आज रिश्तों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन रिश्तों में अपनापन कम होता दिखाई देता है। लोग एक ही घर में रहते हैं, फिर भी उनके मन के बीच दूरियाँ होती हैं। एक ही मेज पर बैठकर भोजन करते हैं, लेकिन एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का समय नहीं निकालते। कई बार रिश्ते किसी बड़े विवाद से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी उपेक्षाओं, बार-बार किए गए अपमान, तुलना, तानों और स्वार्थ के कारण धीरे-धीरे कमजोर हो जाते हैं। कभी बहू को बेटी जैसा अपनापन नहीं मिलता, कभी बेटी को अपने ही घर में पराया महसूस कराया जाता है। कभी माता-पिता की भावनाओं को उनकी उम्र का बहाना बनाकर अनदेखा कर दिया जाता है, तो कभी बच्चों की परेशानियों को समझने के बजाय उन पर अपनी इच्छाएँ थोप दी जाती हैं। कभी भाई-भाई के बीच धन दीवार बन जाता है, तो कभी संपत्ति के लालच में वर्षों का प्रेम समाप्त हो जाता है। हम बाहर के लोगों से बहुत मीठा बोलते हैं, लेकिन घर के लोगों से बात करते समय अपना धैर्य खो देते हैं।
आखिर ऐसा क्यों?—क्या अपने ही लोग हमारे प्रेम और सम्मान के सबसे अधिक हकदार नहीं हैं? हम बाहर वालों के सामने अपनी छवि बचाने के लिए शब्दों को तौलते हैं, लेकिन घर के लोगों को यह सोचकर कुछ भी कह देते हैं कि वे हमें छोड़कर कहाँ जाएँगे। यही सोच रिश्तों के भीतर रावण को जन्म देती है। रिश्तों में अधिकार होना गलत नहीं है, लेकिन अधिकार के नाम पर किसी की भावनाओं को कुचलना गलत है। अपनी बात रखना गलत नहीं है, लेकिन अपनी बात मनवाने के लिए किसी को अपमानित करना गलत है।
रिश्ते वहाँ सुंदर बनते हैं, जहाँ अहंकार से अधिक अपनापन, अधिकार से अधिक जिम्मेदारी और शिकायतों से अधिक समझदारी होती है।—इस दशहरे पर केवल रावण का पुतला मत जलाइए। अपने भीतर उस स्वार्थ को भी जलाइए, जो रिश्तों को अपने फायदे की तराजू पर तौलता है।
ईर्ष्या की आग में सबसे पहले हम स्वयं जलते हैं—ईर्ष्या एक ऐसी आग है, जिसमें हम दूसरे को जलाने की इच्छा रखते हैं, लेकिन सबसे पहले हमारा अपना मन जलता है। जब पड़ोसी नया घर बनाता है, तो हमें अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं। जब किसी रिश्तेदार का बच्चा सफल होता है, तो हम उसकी खुशी में शामिल होने के बजाय उसकी कमियाँ खोजने लगते हैं। जब किसी परिचित के जीवन में खुशियाँ आती हैं, तो हमारे मन में यह प्रश्न उठता है कि उसके पास इतना सब क्यों है और हमारे पास क्यों नहीं?
हम भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ अलग होती हैं। हर जीवन का संघर्ष अलग होता है और हर किसी की यात्रा का समय भी अलग होता है। दूसरे की सफलता हमारे जीवन की असफलता नहीं है। किसी दूसरे के घर में दीपक जलने से हमारे घर का प्रकाश कम नहीं हो जाता। यदि हम दूसरों की खुशियों में खुश होना सीख लें, तो हमारा जीवन भी कितना सुंदर हो सकता है! ईर्ष्या हमें दूसरों की कमियाँ दिखाती है, जबकि सकारात्मक सोच हमें अपनी कमियों को सुधारने की प्रेरणा देती है। इसलिए जब भी किसी की सफलता देखकर मन में ईर्ष्या उठे, तो स्वयं से पूछिए—क्या मैं उसकी सफलता से सीख सकता हूँ? क्या मैं भी मेहनत करके अपने जीवन को बेहतर बना सकता हूँ? दूसरों को नीचे गिराने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बजाय स्वयं को ऊपर उठाने में उस ऊर्जा का उपयोग कीजिए।
यही अपने भीतर के रावण को कमजोर करने की पहली सीढ़ी है।
पूजा-पाठ से पहले इंसानियत को समझिए—हम त्योहारों पर व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं, मंदिरों में जाते हैं और भगवान से अपने परिवार की सुख-समृद्धि माँगते हैं। हम चाहते हैं कि भगवान हमारे बच्चों को खुश रखें, हमारे घर में बरकत दें, हमारे जीवन के कष्ट दूर करें और हमारी मनोकामनाएँ पूरी करें। लेकिन क्या कभी हमने भगवान से यह भी पूछा कि हम स्वयं किसी दूसरे के जीवन को बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं?
क्या हमने किसी भूखे को भोजन कराया?- क्या हमने किसी अकेले व्यक्ति के पास बैठकर उसकी बात सुनी? क्या हमने किसी दुखी इंसान को यह भरोसा दिया कि वह अकेला नहीं है? क्या हमने किसी ऐसे व्यक्ति को क्षमा किया, जिसने अपनी गलती स्वीकार कर ली? क्या हमने अपनी गलती होने पर किसी से माफी माँगी?
धर्म का वास्तविक सौंदर्य केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि हमारे आचरण में भी दिखाई देता है। पूजा-पाठ करना अच्छी बात है। परंतु यदि पूजा के बाद भी हमारे मन में दूसरों के प्रति नफरत बनी रहे, तो हमें अपनी साधना के साथ अपने व्यवहार पर भी ध्यान देना चाहिए।
भगवान को प्रसन्न करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को अपने आसपास के लोगों के दुख-दर्द के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। किसी मंदिर में दीपक जलाना और किसी के अंधकारमय जीवन में आशा का दीप जलाना—दोनों के अपने-अपने अर्थ हैं। लेकिन यदि हमारे भीतर करुणा ही नहीं है, तो हमारी धार्मिकता अधूरी रह जाती है। भगवान की आराधना कीजिए, लेकिन इंसानियत को कभी मत भूलिए। क्योंकि सच्चे धर्म की पहचान हमारे व्यवहार से भी होती है।
अपने भीतर के रावण को जलाने के लिए क्या करें?- रावण को जलाने का वास्तविक अर्थ स्वयं के भीतर बदलाव लाना है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आएगा, लेकिन एक दिन इसकी शुरुआत अवश्य की जा सकती है।
पहला संकल्प—अहंकार छोड़ेंगे।—अपनी उपलब्धियों पर गर्व कीजिए, लेकिन किसी दूसरे को छोटा मत समझिए। गलती होने पर उसे स्वीकार कीजिए। माफी माँगने से इंसान छोटा नहीं होता, बल्कि उसका व्यक्तित्व बड़ा होता है।
दूसरा संकल्प—किसी का दिल नहीं दुखाएँगे।-
बोलने से पहले सोचेंगे। क्रोध में ऐसे शब्द नहीं कहेंगे, जिन्हें बाद में वापस लेना संभव न हो। असहमति होने पर भी सामने वाले के सम्मान का ध्यान रखेंगे।
तीसरा संकल्प—ईर्ष्या के स्थान पर प्रेरणा लेंगे।—
दूसरों की सफलता से जलने के बजाय उससे सीखने का प्रयास करेंगे। किसी की खुशियों में सच्चे मन से शामिल होंगे।
चौथा संकल्प—रिश्तों को स्वार्थ से ऊपर रखेंगे।—
जहाँ संभव हो, वहाँ संवाद करेंगे। गलतफहमियों को बढ़ाने के बजाय उन्हें दूर करने का प्रयास करेंगे। रिश्तों में सम्मान और सीमाओं, दोनों का ध्यान रखेंगे।
*पाँचवाँ संकल्प—अपनी गलती का दोष दूसरों पर नहीं डालेंगे।*हर बार यह कहना कि सामने वाले ने हमें ऐसा करने के लिए मजबूर किया, हमारी जिम्मेदारी से बचने का तरीका हो सकता है। अपनी भावनाओं और व्यवहार की जिम्मेदारी लेना सीखेंगे।
छठा संकल्प—दूसरों की मजबूरी का लाभ नहीं उठाएँगे।—किसी की आर्थिक स्थिति, उम्र, कमजोरी या कठिन परिस्थिति को उसके अपमान का कारण नहीं बनाएँगे। जहाँ संभव हो, सहायता करेंगे और जहाँ सहायता संभव न हो, वहाँ कम से कम किसी का आत्मसम्मान नहीं तोड़ेंगे।
सातवाँ संकल्प—अपने भीतर झाँकेंगे।—हर रात सोने से पहले स्वयं से तीन सवाल पूछेंगे— आज मैंने किसका दिल खुश किया? आज मेरे कारण किसे दुख पहुँचा? और कल मैं अपने व्यवहार में क्या सुधार कर सकता हूँ?
इन तीन सवालों के ईमानदार उत्तर हमारे व्यक्तित्व को बदलने की दिशा में बहुत बड़ा कदम हो सकते हैं।
बच्चों को रावण जलाना ही नहीं, राम के आदर्श भी सिखाइए—हम अपने बच्चों को दशहरे पर मेले दिखाने ले जाते हैं। उन्हें रावण दहन दिखाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानी सुनाते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें अपने व्यवहार से भी यही शिक्षा देते हैं? बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमारे आचरण को भी देखते हैं। यदि हम उन्हें ईमानदारी का पाठ पढ़ाएँ, लेकिन स्वयं झूठ बोलें, तो हमारी शिक्षा का प्रभाव कम हो जाएगा। यदि हम उन्हें बड़ों का सम्मान करना सिखाएँ, लेकिन घर के बुजुर्गों से स्वयं अपमानजनक व्यवहार करें, तो वे सम्मान का वास्तविक अर्थ कैसे समझेंगे? यदि हम उन्हें प्रेम और भाईचारे की सीख दें, लेकिन दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करें, तो वे हमसे क्या सीखेंगे? बच्चों को केवल धार्मिक कहानियाँ सुनाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सिखाना आवश्यक है कि किसी को अपमानित करना गलत है, किसी की मजबूरी का मजाक उड़ाना गलत है, किसी का विश्वास तोड़ना गलत है और अपनी गलती स्वीकार करना साहस की बात है। उन्हें यह समझाइए कि ताकतवर होना अच्छी बात है, लेकिन अपनी ताकत से किसी कमजोर को दबाना गलत है। सफल होना अच्छी बात है, लेकिन सफलता के लिए अपने संस्कारों को खो देना गलत है। धन कमाना अच्छी बात है, लेकिन धन के कारण अपने रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं को भूल जाना गलत है।
हमारी अगली पीढ़ी तभी बेहतर समाज बना पाएगी, जब हम उसे अपने व्यवहार से अच्छे संस्कार देंगे।
रावण दहन की परंपरा तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ हमारे भीतर भी बुराई के विरुद्ध संघर्ष करने का संकल्प जन्म लेगा।
जीवन बहुत छोटा है, इसे नफरत में क्यों गँवाएँ?— हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जीवन की अवधि निश्चित नहीं है। समय लगातार आगे बढ़ रहा है और हमारे पास हर रिश्ते को सँभालने, हर गलती को सुधारने और हर अधूरी बात को पूरा करने के लिए असीमित समय नहीं है।
फिर भी हम छोटी-छोटी बातों पर वर्षों तक नाराज रहते हैं।
कभी किसी ने हमारी बात नहीं मानी, तो हमने उससे बोलना बंद कर दिया। कभी किसी ने हमारी अपेक्षा पूरी नहीं की, तो हमने उसके प्रेम पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। कभी किसी ने हमें महत्व नहीं दिया, तो हमने भी उसे अपने जीवन से दूर कर दिया। लेकिन क्या हर असहमति का उत्तर दूरी है? क्या हर गलती की सजा रिश्ते का अंत होना चाहिए? हर परिस्थिति में समझौता करना उचित नहीं होता। जहाँ अपमान, शोषण या लगातार नुकसान पहुँचाने वाला व्यवहार हो, वहाँ अपनी सीमाएँ तय करना जरूरी है। लेकिन जहाँ केवल गलतफहमी, अहंकार या संवाद की कमी हो, वहाँ एक ईमानदार बातचीत बहुत कुछ सुधार सकती है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर मनुष्य को अक्सर धन से अधिक अपनों के साथ की जरूरत महसूस होती है। तब उसे एहसास होता है कि कितनी बातें अनावश्यक थीं, कितने झगड़े व्यर्थ थे और कितने रिश्ते केवल अहंकार के कारण दूर हो गए। इसलिए जब तक समय है, अपने मन का बोझ हल्का कीजिए। जहाँ गलती हुई है, वहाँ माफी माँगिए। जहाँ किसी ने सच्चे मन से माफी माँगी है, वहाँ अपनी परिस्थितियों के अनुसार क्षमा करने पर विचार कीजिए। जहाँ प्रेम है, वहाँ उसे व्यक्त कीजिए। जहाँ किसी को आपकी जरूरत है, वहाँ संभव हो तो उसके साथ खड़े रहिए। क्योंकि अंत में जिंदगी इस बात से सुंदर नहीं बनती कि हमने कितने लोगों को गलत साबित किया, बल्कि इस बात से सुंदर बनती है कि हमने कितने लोगों के जीवन में प्रेम, विश्वास और सम्मान बढ़ाया।
इस दशहरे पर एक सवाल स्वयं से भी पूछिए-जब रावण का पुतला आग की लपटों में घिरता है, तो एक बार अपने मन की ओर भी देखिए। क्या मेरे भीतर किसी के प्रति अनावश्यक नफरत है? क्या मैं किसी की सफलता से परेशान होता हूँ? क्या मेरा अहंकार मुझे अपनी गलती स्वीकार नहीं करने देता? क्या मेरी वाणी किसी अपने को बार-बार चोट पहुँचाती है? क्या मैं दूसरों से जिस सम्मान की अपेक्षा करता हूँ, वही सम्मान उन्हें भी देता हूँ? क्या मेरी धार्मिकता मेरे व्यवहार में भी दिखाई देती है? यदि इनमें से किसी प्रश्न का उत्तर हमें असहज करता है, तो निराश होने की जरूरत नहीं है। अपनी कमी पहचान लेना ही सुधार की शुरुआत है। हम सभी में कुछ न कुछ कमियाँ होती हैं। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह नहीं कि हमारे भीतर कभी कोई बुराई आई ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हम उसे पहचानकर दूर करने का प्रयास करते हैं या नहीं।
अपने भीतर के रावण को जलाने का अर्थ स्वयं से घृणा करना नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार करके बेहतर इंसान बनने का प्रयास करना है। यह एक दिन का काम नहीं, बल्कि जीवन भर चलने वाली साधना है। और इस साधना की शुरुआत किसी मंदिर, मैदान या उत्सव से नहीं, हमारे अपने मन से होती है।
इस बार रावण बाहर नहीं, भीतर जलना चाहिए— हर साल दशहरा हमें एक संदेश देकर जाता है—बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत संभव है।
लेकिन इस संदेश को केवल उत्सव तक सीमित मत रखिए।
यदि हम चाहते हैं कि समाज में नफरत कम हो, तो हमें अपने व्यवहार में प्रेम बढ़ाना होगा। यदि हम चाहते हैं कि रिश्ते मजबूत हों, तो हमें अपने अहंकार को नियंत्रित करना होगा। यदि हम चाहते हैं कि लोग हमारा सम्मान करें, तो हमें भी दूसरों के सम्मान का ध्यान रखना होगा। यदि हम चाहते हैं कि दुनिया में ईमानदारी बढ़े, तो हमें अपने जीवन में ईमानदारी अपनानी होगी। दूसरों की बुराइयाँ गिनना आसान है, लेकिन अपनी कमियों को स्वीकार करना साहस माँगता है। दूसरों को बदलने की सलाह देना आसान है, लेकिन स्वयं बदलने के लिए आत्मचिंतन और दृढ़ संकल्प चाहिए।
इसलिए अगली बार जब रावण का पुतला जलते हुए देखें, तो केवल तालियाँ मत बजाइए। अपने भीतर के उस अहंकार को पहचानिए, जो आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझने पर मजबूर करता है। उस ईर्ष्या को पहचानिए, जो किसी की खुशी में आपकी खुशी छीन लेती है। उस क्रोध को पहचानिए, जो आपके शब्दों को विषैला बना देता है। उस स्वार्थ को पहचानिए, जो रिश्तों में प्रेम की जगह हिसाब-किताब ले आता है। और फिर संकल्प लीजिए कि इन बुराइयों को धीरे-धीरे अपने जीवन से दूर करेंगे।क्योंकि *रावण का पुतला जलाने से मैदान रोशन होता है, लेकिन अपने भीतर का रावण जलाने से जीवन रोशन होता है।*आतिशबाजी की रोशनी कुछ क्षणों में समाप्त हो जाती है, लेकिन इंसानियत का प्रकाश पीढ़ियों तक चमक सकता है। इसलिए इस दशहरे पर किसी दूसरे के भीतर रावण खोजने से पहले अपने भीतर झाँकिए। किसी दूसरे को बुरा कहने से पहले अपने व्यवहार को परखिए। किसी दूसरे के दोष गिनाने से पहले अपनी कमियों को सुधारिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात, भगवान से दूसरों को बदलने की प्रार्थना करने से पहले स्वयं को बेहतर बनाने का संकल्प लीजिए।*आखिर कब तक दूसरों के रावण जलाते रहोगे?*कब तक अपने अहंकार को सही ठहराते रहोगे?*कब तक अपनी ईर्ष्या को परिस्थितियों का नाम देते रहोगे?*कब तक अपनी कटु वाणी से अपनों का दिल दुखाते रहोगे?*एक दिन ऐसा भी आए, जब रावण का पुतला जलने के साथ हमारे भीतर का अहंकार भी समाप्त हो। जब विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व में आए सकारात्मक बदलाव का प्रतीक बने।
इस दशहरे पर बस इतना याद रखिए—*दूसरों के भीतर रावण खोजने में पूरी जिंदगी निकल जाएगी, लेकिन जिस दिन अपने भीतर के रावण को पहचानकर जला दोगे, उसी दिन सच्चे अर्थों में विजयादशमी मनाओगे।*क्योंकि असली दशहरा उस दिन नहीं है, जब रावण का पुतला जलता है; असली दशहरा उस दिन है, जब हमारे भीतर का अहंकार, ईर्ष्या, छल और नफरत हार जाते हैं और इंसानियत की जीत होती है। तो बताइए, इस बार दशहरे पर केवल रावण का पुतला जलाओगे या अपने अंदर के रावण को भी जलाओगे?
– ऊषा शुक्ला






