अमरीका में डॉ. लोहिया के सिद्धांत वोट, जेल ,फावड़ा की गूंज!

लफ्फाजी, भारी भरकम शब्दजाल, देसी- विदेशी सिद्धांत कारो की किताबों में दर्ज, लंबी चौड़ी ना समझ आने वाली मिसालों के हवाले से जम्हूरियत के मजबूत खंबो की अनिवार्यता की व्याख्या करते अक्सर अनेक विद्वान देखे गए हैं।

स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा, तीन विदेशी हुकूमतों अंग्रेजों, नेपाल की राणा शाही, तथा गोवा मे काबिज पुर्तगाली जारशाही के खिलाफ आजादी की लड़ाई के कारण अनेकों यातनाएं सहने। जर्मनी के होमबोल्ट यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में पीएचडी प्राप्त करने के बाद आजादी की जंग में कूद पड़े डॉ राममनोहर लोहिया, आजाद हुए हिंदुस्तान में लोकतंत्र के दूसरे अनिवार्य खंबे विपक्ष की मजबूती के लिए सोशलिस्ट पार्टी बनाकर जन सवालों पर तमाम उम्र संघर्ष करते हुए हर तरह की तकलीफों को झेलते रहे। डॉ लोहिया हिंदुस्तान के ऐसे राजनीतिक चिंतक हैं जिन्होंने हर बड़े सैद्धांतिक सवाल पर सीधे-सीधे आम आदमी की समझ में आने वाली भाषा में विचार दिए। समाजवादी विचार दर्शन की विशद व्याख्या करते समय डॉ लोहिया ने लोकतंत्र के तीन आवश्यक तत्वों का जिक्र करते हुए तीन प्रतीकात्मक, वोट, जेल, फावड़ा शब्दों से समझाया है।

 

वोट:

 

लोहिया ने वोट को जम्हूरियत की बुनियाद व संसदीय लोकतंत्र में संवैधानिक तरीके से सत्ता परिवर्तन का प्रतीक माना है। उनका मानना था कि जनता को वोट की ताकत से सरकार बनाने व बदलाव लाने का कार्य करना चाहिए। गलत नीतियों वाली सरकार को बदलकर, अपने सही नुमाइंदे का चुनाव कर सकती है। वोट की ताकत का इस्तेमाल करके दमनकारी सरकारों को लोकतांत्रिक तरीके से बदलना ही वास्तविक लोकतंत्र है। बिना किसी पद, जाति, मजहब, क्षेत्र, गरीब अमीर, शिक्षित अशिक्षित के हर किसी की हिस्सेदारी की बराबरी का यह निशान है।

 

जेल:

 

जेल:, सत्याग्रह, अन्याय, शोषण जुल्म जयादती, सरकार की दमनकारी, असंवैधानिक नीतियों, सामाजिक स्तर पर होने वाले घटनाक्रमों, गैर बराबरी के खिलाफ लड़ने का प्रतीक है। जब भी कोई सरकार या व्यवस्था अन्याय करें तो उसके खिलाफ आवाज उठाकर जेल जाने से न केवल सत्याग्रही का भय टूटता है, वह फौलादी इरादे वाला बन जाता है। यह अहिंसक प्रतिरोध और संघर्ष का प्रतीक है।

 

फावड़ा:

 

फावड़ा: रचना और श्रम का प्रतीक है। एक राजनीतिक कार्यकर्ता को देश के लिए अपनी दिनचर्या में कम से कम 1 घंटे का श्रमदान, रचनात्मक कार्य करने, जैसे बंजर भूमि पर खेती, बांध, सड़क निर्माण, सफाई, गरीब अशिक्षित बच्चों को पढ़ाने जैसे कार्यों पर जोर दिया।

डॉ लोहिया स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय अमेरिका में भाषण देने के लिए गए थे। उनके अमेरिका दौरे पर हैरिस वुफोर्ड ने ,’लोहिया अमेरिकी मुलाकात’ पर अंग्रेजी में एक पुस्तक लिखी। उसमें उन्होंने लोहिया के वोट, जेल, फावड़े के सिद्धांत का जिक्र करते हुए लिखा,

जब चैग्वारा का निधन हुआ तो अनेक क्रांतिकारी जवान अमेरिकनो ने उसके नाम का जाम पिया। हममें से प्रत्येक का अपना मनपसंद क्रांतिकारी होगा, राजनेता, कलाकार या अध्यापक और मैं इस मामले में किस भी अन्य व्यक्ति से ज्यादा खुशकिस्मत रहा हूं। तथापि, मौत के एक ही मौसम में अत्यंत बुद्धिमान अध्यापक स्काट बुकानन, जिनसे मैं हमेशा मिलना चाहता था (और जो डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के मित्र थे) चल बसे और राजनीति के दो व्यक्ति जिनके प्रति मेरे मन में सर्वाधिक भक्ति- भाव था, रॉबर्ट कैनेडी और मार्टिन लूथर किंग, उनकी हत्या हो गई। आंसुओं का यह साल शुरू हुआ था डॉ राममनोहर लोहिया की भयानक मौत से। लोहिया जो स्थायी और शांतिपूर्ण क्रांति के मूर्तिमान प्रतीक के रूप में मेरी स्मृतियों की लहरों में हमेशा तैरते रहेंगे।

इस श्रद्धांजलि में जो कुछ विलंब हुआ उसकी वजह को राममनोहर लोहिया ने अवश्य ही सराहा होता। डाकघर जाते समय इस लेखक के साथ अजीब घटना हुई वह जेल पहुंच गया।

पिछले 10 वर्षों की हमारी मुलाकातों के दौरान राममनोहर मुझे बार-बार पूछते कि मैं जेल कब जा रहा हूं। लगभग यह दिखाने के लिए कि अमेरिका में यह काम इतना मुश्किल नहीं है, वे अपने दौरे के समय भेदभाव के स्थानीय कानून के खिलाफ सिविल नाफरमानी कर मिसिसिपी में गिरफ्तार हुए।

सन 1951 के अपने पहले दौर के समय उन्होंने नौजवान श्रोताओं, खासकर नीग्रो अश्वेतों से यही सवाल किया था। उन्होंने जटिल आधुनिक समाज में राजनीतिक दबाव बनाकर बनाने के लिए जिस सिविल नाफरमानी का शक्तिशाली और आवश्यक हथियार के रूप में जो ओजपूर्ण भाषा में व्यापक प्रचार किया वह उन बाहरी कारकों में एक कारक था जिसने कई आंतरिक कारणो से मिलकर उस आंदोलन को जन्म दिया जिसने मार्टिन लूथर किंग जैसे कई अश्वेश युवकों को शांतिपूर्ण सीधी कार्रवाई के दशक को शुरू करने की प्रेरणा दी।

राममनोहर ने उस मुद्दे का भी अनुमोदन किया होता जिसके कारण इस लेखक को एक रात शिकागो जेल में बितानी पड़ी। यह मुद्दा था डेमोक्रेट नेशनल कन्वेंशन के मौके पर जन- प्रदर्शन को भंग करने के लिए इस्तेमाल, पुलिस की हिंसा और अव्यवस्था के खिलाफ जनता का शांतिपूर्ण मार्च। राममनोहर ने अपनी ही पार्टी की सरकार के अधीन पुलिस हिंसा से विरोध जताने के लिए पार्टी के उच्च नेता पद से त्यागपत्र दिया था। यह मानते हुए कि इस बात से ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा और कोई नहीं हो सकता कि हम प्रतिज्ञान करें कि एशिया के लोग मक्खी मच्छर नहीं है राज्य को मानव जीवन की रक्षा तथा उसका सम्मान करना चाहिए। राममनोहर ने अपनी पार्टी की पहली सरकार को त्यागपत्त देने के लिए कहा था, जब तक कुछ प्रदर्शनकारियों की पुलिस की गोलियों से मरने के तथ्यों की पूरी जांच नहीं की हो जाती। जब वे उसके सुझाव पर नहीं चले तो उन्होंने स्वयं त्यागपत्त दे दिया। सन 1951 के अपने अमेरिकी दौरे के समय उन्होंने इस तरह की कार्रवाई कर इस तरह की कार्रवाई की आवश्यकता बताते हुए कहा था, मैं चाहता हूं की सारी दुनिया में राजनेताओं को की एक ऐसी नस्ल तैयार हो जो किसी पद के बिना इस काम में विशेषता हासिल करें। मानव -जाति की सबसे बड़ी समस्या आज सत्ता को काबू में रखने की है उसका एक तरीका शायद स्वैच्छिक पद-त्याग है। कम से कम इसका प्रयास तो हमें करना चाहिए।

पीछे मुड़कर देखने पर आश्चर्य होता है कि डॉक्टर लोहिया के 1951 के दौरे की मुख्य बातें तथा अनेक वर्षों में प्रकट उनके अन्य मुख्य विचार वर्तमान स्थिति में कितने प्रासंगिक हैं। फावड़ा, जेल और वोट का उनका सूत्र आज नई राजनीति का हथियार बन गया है। उन्होंने कहा कि फावड़ा वैधानिक रचनात्मक कार्य और स्वैच्छिक सेवा का प्रतीक है। वे पूर्णकालिक स्वयंसेवकों के ब्रिगेड और लाखों अंशकालिक स्वयंसेवकों की सेना तैयार करना चाहते थे जो समाज को दिन में एक घंटा दे ।जेल शांतिपूर्ण विरोध के कई कम उग्र रूपों के चरम बिंदु का प्रतीक है। वोट का पारंपरिक लोकतांत्रिक तरीका मात्र कंकाल सिद्ध नहीं होगा यदि जनता चुनाव के बीच अपने को शक्तिहीन नहीं समझे, यदि वह स्वैच्छिक सेवा तथा शांतिपूर्ण संघर्ष के सार तत्वों को ग्रहण करें।

रंगभेद के खिलाफ वियतनाम युद्ध के खिलाफ हजारों अमरीकन खड़े हो गए रहे हैं, धरने दे रहे हैं, मार्च निकाल रहे हैं औ जेल जा रहे हैं। अधिकाधिक अमरीकन याशह महसूस करने लगे हैं वालो कि तत्काल रचनात्मक कार्यों में लगना अभी और राज्य की सत्ता प्राप्त करने से पहले भी कुछ मानवीय और महत्वपूर्ण कार्य करना, चुनाव जीतने के बगैर भी सुधार के गैरसरकारी कार्यक्रम चलाना तथा संस्थाएं खड़ी करना जरूरी है और संभव भी। रॉबर्ट कैनेडी अपने अंतिम दिनों में जिस मजबूत नीति पर चल रहे थे, उसे लोहिया फावड़ा कार्यक्रम कहते। अश्वेत नागरिक फावड़े का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर कर रहे हैं ताकि शहर के अंदरूनी भागों के दर्जनों समुदायों के लिए अश्वेत शक्ति को वास्तविक रूप दिया जा सके। एक दर्जन देशों का ओवरसीज पीस कोर संगठन और कई घरेलू शैक्षिक कार्यक्रम भी इसे प्रतिबिंबित कर रहे हैं तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव ऊ थाट ने सुझाव दिया है कि किसी नागरिक की शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में एक या दो साल की स्वैच्छिक सेवा को, चाहे अपने देश में हो या विदेश में सब जगह मान्यता दी जाए। ।

  • राजकुमार जैन
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