अरुणाचल प्रदेश सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि सियांग घाटी के अधिकांश लोग प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता निर्धारित करने के लिए किए जा रहे पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट (पी.एफ.आर.) सर्वेक्षण के पक्ष में हैं। इस परियोजना के तहत सियांग नदी पर 11,000 से 12,500 मेगावाट क्षमता का एक विशाल बांध बनाया जाना प्रस्तावित है।
हालाँकि, सितंबर के अंत में मुख्यमंत्री पेमा खांडू के ऊपरी सियांग जिले के मुख्यालय यिंगकियोंग के दौरे ने लोगों को विरोध के लिए उकसा दिया। प्रदर्शनकारियों ने कई सरकारी वाहनों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, जिनमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, सशस्त्र सीमा बल, रैपिड एक्शन फोर्स और भारतीय रिजर्व बटालियन शामिल हैं, के एक शिविर को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने यिंगकियोंग में विधायक आलो लिबांग के घर में तोड़फोड़ की तथा उपमुख्यमंत्री चोवना मीन, कैबिनेट मंत्रियों ओजिंग तासिंग और न्यातो दुकाम तथा सलाहकार निनोंग एरिंग को मुख्यमंत्री की सरकारी अधिकारियों एवं सामुदायिक प्रतिनिधियों के साथ होने वाली बैठक में शामिल होने से रोक दिया। ‘नो पी.एफ.आर., नो सर्वे’ और ‘गो बैक सीएम’ जैसे नारे लिखी तख्तियां लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों ने सवाल उठाया कि मुख्यमंत्री परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों से मिलने के बजाय अधिकारियों के साथ बैठक क्यों कर रहे हैं? सितंबर-अक्टूबर में हुए इन विरोध प्रदर्शनों से यह स्पष्ट हो गया कि परियोजना के प्रति आदि समुदाय का रुख विरोधपूर्ण है, जो सरकार के दावों के विपरीत है।
भारत में प्रवेश करने से पहले सियांग नदी तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो के नाम से बहती है। चीन इसी नदी पर 60,000 मेगावाट क्षमता वाली मेडोग जलविद्युत परियोजना का निर्माण कर रहा है। भारत सरकार का दावा है कि सियांग पर बाँध बनाने का प्रस्ताव मेडोग बाँध के जवाब में लाया गया है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि यदि चीन अचानक मेडोग बाँध के 5.5 अरब घन मीटर क्षमता वाले जलाशय से पानी छोड़ देता है, तो भारत में सियांग पर प्रस्तावित बाँध, जिसकी बिजली उत्पादन क्षमता कम होगी लेकिन जलाशय की क्षमता 9.2 अरब घन मीटर होगी, ऊपर से आने वाले पानी को रोक सकेगा। लेकिन यह तर्क इस धारणा पर आधारित है कि सियांग बाँध के जलाशय में मेडोग से छोड़े जाने वाले पानी को रोकने के लिए पर्याप्त खाली जगह उपलब्ध होगी। हालाँकि, उस स्थिति की कल्पना मात्र से भय होता है जब चीन पानी छोड़ दे और भारत में बाँध पहले से ही अपनी पूरी क्षमता तक भरा हो, उदाहरण के लिए बरसात के मौसम में, तब ऐसी स्थिति में भारतीय बाँध चीन के बाँध से उत्पन्न तबाही और संकट को कम करने के बजाय लोगों की मुश्किलें और बढ़ा सकता है। किसी नदी पर बाँध बनाना विनाश को आमंत्रित करने की एक निश्चित रणनीति है, जैसा कि उत्तराखंड और नेपाल में बार-बार साबित हुआ है, हाल ही में भी ऐसी घटनाएँ देखने को मिली हैं। इसलिए भारतीय बाँध से दोहरी आपदा का खतरा पैदा होगा। सियांग पर प्रस्तावित बाँध के ऊपरी और निचले, दोनों क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि पी.एफ.आर. तैयार होने का अर्थ यह नहीं है कि बाँध का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाएगा। यदि पी.एफ.आर. बाँध के पक्ष में आती है, तब भी निर्माण शुरू होने से पहले सामाजिक प्रभाव आकलन, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करनी होगी। एक समय था जब इस देश में सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के दौरान आयोजित जनसुनवाइयों में लोगों की कुछ आवाज होती थी और वे परियोजनाओं के भविष्य को प्रभावित कर सकते थे। लेकिन भाजपा सरकार ने जनसुनवाई की इस प्रथा को समाप्त कर दिया है। अब कुछ पेशेवर लोग इन प्रक्रियाओं को पूरा करेंगे। लेकिन यह सुनिश्चित करना असंभव है कि उनकी रिपोर्ट वास्तविक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करेगी या नहीं, विशेषकर तब, जब मोदी सरकार पर्यावरण संबंधी चिंताओं के प्रति लापरवाह रवैया अपनाती रही है। हमने 2018 में प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल की मृत्यु देखी, जब वे गंगा के ऊपरी क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं के विरोध में हरिद्वार में अपना छठा अनशन कर रहे थे। इस दौरान असंवेदनशील मोदी सरकार की ओर से कोई सार्थक प्रतिक्रिया नहीं मिली। प्रोफेसर अग्रवाल, जो बाद में संन्यासी बन गए थे और जिन्होंने स्वामी सानंद नाम अपना लिया था, ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने चैथे पत्र में मोदी को अपनी आसन्न मृत्यु के लिए जिम्मेदार ठहराया था। उनके किसी भी पत्र का कोई जवाब नहीं मिला। ऋषिकेश स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में उनकी मृत्यु के तुरंत बाद मोदी ने शोक-संदेश ट्वीट किया। इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट हुआ कि सरकार लोगों के हितों के बजाय कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देगी।
सरकार लोगों की सोच को प्रभावित करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। पी.एफ.आर. के लिए अपनी सहमति देते हुए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों को पहले कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सी.एस.आर.) निधि, फिर आउटरीच और अंततः विशेष विकास पैकेज के नाम पर 350 करोड़ रुपये का पैकेज देने की पेशकश की गई। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार स्वयं भी यह तय नहीं कर पा रही थी कि इस पैकेज को क्या नाम दिया जाए। दिलचस्प बात यह है कि समझौता ज्ञापन में कहा गया है कि एक बार दी गई सहमति वापस नहीं ली जा सकती। यह शर्त सरकार के छिपे हुए इरादों को उजागर करती है।
4 अक्टूबर को प्रदर्शनकारियों पर आईटीबीपी द्वारा किए गए लाठीचार्ज में 67 लोग घायल हो गए। घायलों में एक 70 वर्षीय महिला भी शामिल थीं, जिनकी पसलियाँ एक पत्थर लगने से टूट गईं। एक पुलिसकर्मी के हाथ में भी चोट आई। रीगा से छह लोगों को हिरासत में लिया गया। अरुणाचल प्रदेश के लोगों ने अपने क्षेत्र में सुरक्षा बलों की इतनी बड़ी तैनाती पहले कभी नहीं देखी थी। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम की युवा शाखा के महासचिव दुबित सिरम ने सवाल उठाया है कि क्या सरकार की चिंता केवल जल सुरक्षा तक ही सीमित है? क्या लोगों की सुरक्षा और उनके अन्य हित सरकार के लिए कोई मायने नहीं रखते? अरुणाचल प्रदेश से भाजपा के सांसद तापिर गाव ने पिछले कई वर्षों में बार-बार दावा किया है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने मैकमोहन रेखा के भीतर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है, सड़कें बनाई हैं और वहाँ गाँव बसाए हैं। हालाँकि, लद्दाख में सोनम वांगचुक द्वारा किए गए इसी तरह के दावों की तरह, भारत सरकार इन दावों को भी खारिज करती है। वास्तविकता यह है कि खुली सीमाओं वाले क्षेत्रों में अतिक्रमण की आशंका बनी रहती है और सैनिक केवल सीमा पर गश्त करते हैं।
आदिवासी युवाओं के संगठन ऑल आदि यूथ एसोसिएशन ने सियांग घाटी से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और राज्य पुलिस को वापस बुलाने की माँग की है। संगठन ने उन कई गाँव प्रमुखों, जिन्हें गाँव बूढ़ा कहा जाता है, का निलंबन रद्द करने की भी माँग की है, जिन्होंने बाँध-विरोधी लोगों का साथ दिया था। इस प्रकार, उपायुक्त पारंपरिक जनजातीय रीति-रिवाजों के प्रति पूरी तरह उपेक्षापूर्ण रवैया दिखा रहे हैं। आदि समुदाय विवादों को अपनी पारंपरिक केबांग व्यवस्था के माध्यम से सुलझाने के लिए जाना जाता है। यह सामूहिक विचार-विमर्श और निर्णय लेने की एक प्रक्रिया है। समुदाय चाहता है कि इस परियोजना पर भी उसी तरीके से निर्णय लिया जाए, न कि सरकार उनकी इच्छा के विरुद्ध इस परियोजना को उन पर थोप दे। लगभग 27 गाँव सीधे तौर पर और 45 गाँव अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे। इससे लगभग डेढ़ लाख की आबादी प्रभावित हो सकती है। लोगों को डर है कि उनकी जमीनें और जंगल जलमग्न हो जाएँगे, जैव विविधता नष्ट होगी, आजीविका के साधन छिन जाएँगे और उनका सामुदायिक जीवन बिखर जाएगा। इसके अतिरिक्त, एक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में बाँध बनाए जाने से एक नया खतरा भी पैदा होगा। दुबित सिरम का कहना है कि यदि रीगा गाँव जलमग्न हो जाता है, तो आदि समुदाय के प्रवास का इतिहास ही खो जाएगा। आदि समुदाय के लिए पारिस्थितिकी और संस्कृति, दोनों दाँव पर लगे हैं। यही कारण है कि समुदाय सरकार द्वारा परियोजना को जबरन थोपने और उसे एक अपरिहार्य निर्णय के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयासों का विरोध कर रहा है।
– संदीप पांडेय और निया तापो







