धर्म और राज्य को पृथक करो

अयोध्या में जो राम मंदिर बना वह एक राजनीतिक प्रक्रिया के स्वरूप बना। इसी किन्हीं धार्मिक लोगों ने नहीं बनवाया नही,ं तो इसका संचालन कोई साधु-संत कर रहे होते। इसका संचालन सभी रा.स्वं.सं. से जुड़े संगठनों के लोग कर रहे हैं जिन्होंने, ऐसा प्रतीत होता है, भ्रष्टाचार का कोई मौका नहीं छोड़ा।
सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) का मानना है कि धर्म और राज्य पृथक होने चाहिए। धार्मिक् स्थलों का संचालन धार्मिक लोगों को ही करना चाहिए। सही में कोई व्यकित धार्मिक होगा तो वह किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा या दल से कैसे जुड़ सकता है? वह तो तटस्थ रहेगा।
अयोध्या में जो हुआ वह राजनीति में धर्म के इस्तेमाल की वजह से हुआ है। रा.स्वं.सं. हिन्दू धर्म के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना करता है। यदि कोई उनकी विचारधारा से सहमत न हो तो बड़े निमर्म तरीके से उसे रास्ते से हटाया जाता है जैसा कि महात्मा गांधी के साथ हुआ। गांधी से निष्ठावान शायद ही कोई हिन्दू हुआ हो। किंतु वह धार्मिक राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं कर रहे थे। उनका राष्ट्रवाद मानवाता पर टिका हुआ था।
हिन्दू राष्ट्रवाद चूंकि समावेशी नहीं है तो वह कट्टर बन गया। इसके विकृत रूप का ही परिणाम है कि आज उ.प्र. में सरकार अंग्रेजी शराब की ध़ड़ल्ले से बिक्री पर चल रही है और अयोध्या का राम मंदिर भ्रष्टाचार का केन्द्र बना है।
सभी धार्मिक केन्द्र मानव सेवा के केन्द्र होने चाहिए। जैसे गुरुद्वारों में लंगर चलते हैं उसी तरह सभी धार्मिक स्थलों के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वहां लंगर, शिक्षा, स्वास्थ्य, आदि कोई मानव कल्याण के कार्य चलें ताकि श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान का सदुपयोग हो। बिना मानव कल्याण के किसी धर्म का कोई मतलब नहीं है।
हम उम्मीद करते हैं कि अयोध्या की घटना से जनता सबक लेगी और धर्म का राजनीति में इस्तेमाल करने वाले लोगों को खारिज करेगी और धार्मिक स्थलों को धार्मिक लोगों को सौंपा जाए ऐसा सुनिश्चित करेगी।

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