आखिर कौन जिम्मेदार है भिवानी हादसे का ?

चरण सिंह राजपूत 

जब खेल है जनता की भलाई के लिए बनाए गये तंत्रों का। यदि मौजूदा हालात की बात करें तो जो तंत्र जनता की भलाई के लिए बने होने का दंभ भरते हैं वे सभी सत्ता पावर और पूंजीपतियों के दबाव में काम करते हुए दिखाई दे रहे हैं। या यह कहें कि धंधेबाजों के सामने बेबस नजर आ रहे हैं। हरियाणा में अरावली पहाड़ियों को बचाने के नाम पर गरीब जनता को तो परेशान किया जा रहा है पर खनन माफियाओं पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि खनन के चलते भिवानी में जो हादसा हुआ है, उसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं ?  तमाम प्रतिबंधों के बावजूद आखिरकार अरावली पहाड़ी पर खनन कैसे हो रहा है ?

हरियाणा के भिवानी डाडम खनन क्षेत्र में खनन के दौरान पहाड़ दरकने से आधा दर्जन वाहनों समेत 12 से अधिक लोगों के पहाड़ के मलबे में दब होने की बात सामने आ रही है। हादसे में अब तक चार लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर ये खनन किसके इशारे पर चल रहा था ? हरियाणा सरकार क्या कर रही थी ? घटना स्थल पर मीडियाकर्मियों के जाने पर पाबंदी लगाने का मतलब सरकार का खनन माफियाओं का बचाना माना जा रहा है। क्या अवैध अवैध खनन रुकवाने की जिम्मेदारी शासन प्रशासन की नहीं है।

दरअसल तोशाम विधानसभा क्षेत्र के तहत डाडम गांव खनन कार्यो के लिए जाना जाता है। जब अरावली पहाड़ियों के लिए सरकार और अदालत इतनी चिंतित है तो फिर ये खनन क्यों नहीं रुका ? जिस सरकार और जिस प्रशासन ने अरावली पहाड़ी पर अतिक्रमण का नाम देकर फरीदाबाद के खोरी गांव को उजाड़ दिया उस सरकार और प्रशासन को यह खनन दिखाई नहीं दिया ?
यह भी अपने आप में प्रश्न है कि ग्रीन ट्रीब्यूनल के कड़े रुख को देखते हुए डाडम क्षेत्र की पहाड़ियों में खनन कार्य को प्रदूषण के चलते प्रशासन ने काफी समय पहले ही बंद कर दिया था। यदि यह खनन बंद था तो फिर कौन लोग थे जो जिनको सरकार और कोर्ट का दर नहीं था ? अभी तक किसी की गिरफ़्तारी क्यों नहीं की गई है ?  बताया जा रहा है कि क्रेशर प्लांट दोबारा शुरू होने की उम्मीद में यहां खनन गतिविधियां फिर शुरू हो गई थी। जब अरावली पहाड़ियों को अतिक्रमण मुक्त किया जा रहा है तो फिर खनन क्यों नहीं रुक पा रहा है ?

जमीनी हकीकत तो यह है कि भिवानी जैसे हादसे हरियाणा में जगह जगह न्यौता दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद फरीदाबाद में अरावली हिल्स की अवैध बसावत को तो उजाड़ दिया गया पर खनन माफिया अरावली हिल्स की हरियाली, खनिज पदार्थों, जंगली जीवन और दूसरी प्राकृतिक संपदा का लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। गुरुग्राम में तो अवैध फार्म हाउसों ने न सिर्फ अरावली का सीना छलनी कर दिया, बल्कि रईसजादे व माफिया पहाड़ी का महत्व ही समाप्त करने पर आमादा हैं।
यही हाल मेवात इलाके में अवैध खनन के कारण हो रहा है। कासन, मानेसर, नौरंगपुर, राठीवास, सकतपुर, गैरतपुर बांस, रायसीना, बंधवाड़ी ग्वालपहाड़ी, सोहना, रिठौज, दमदमा समेत कई ऐसे इलाके हैं जहां पांच हजार से ज्यादा फार्म हाउस अवैध तरीके से बना लिए गए हैं। आज भी यंहा अवैध तरीके से फार्म हाउस बनाने का काम धड़ल्ले से चालू हैं।
दरअसल 1980 में एक बिल्डर ने अंसल रिट्रीट के नाम से गांव रायसीना में 1200 एकड़ पर करीब 700 फार्महाउस विकसित करने का प्लान बनाया था। हालांकि इसी दौरान यहां निर्माण पर प्रतिबंध लग गया। नोटिफिकेशन जारी हुआ, लेकिन उसका पालन नहीं हुआ।  निर्माण होते रहे, टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग डिपार्टमेंट ने सर्वे कराया, जिसमे पता चला कि 500 से ज्यादा फार्म हाउस  विकसित हो चुके हैं।
अरावली पर्वत श्रृंखला में अवैध रूप से बने करीब 500 फार्म हाउस को मलबे में तब्दील करने का प्लान जनवरी महीने में बनाया गया था। तत्कालीन डीसी ने दावा किया था कि अगले 2 से 3 महीने में कार्यवाई की जाएगी।
पर्यावरण प्रेमियों की माने तो दिल्ली एनसीआर के लिए अरावली एक बड़ी लाइफ लाइन है और इसे बचना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट और NGT ने कई बार इस अरावली को बचाने के लिए आदेश दिए हैं, जिस तरह से दिल्ली एनसीआर में जनसंख्या बढ़ रही है और मल्टी स्टोरी इमारतें बन रही हैं। उस लिहाज से अरावली को बचाना बेहद जरूरी है ताकि मानव जीवन बच सके. क्योंकि अरावली ही एक ऐसी श्रंखला है जहां साफ हवा और पानी मिल सकती है। क्योंकि हर साल देखते है को दिल्ली एनसीआर में किस कदर हवा ज़हरीली होती है और ऑफिस स्कूल तक बंद करने पड़ते है।  अरावली की इन पहाड़ियों में खतरनाक जंगली जानवर रहते हैं, जिनमे तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, गीदड़  जैसे जानवर अक्सर यंहा देखे जाते हैं, लेकिन जैसे जैसे अरावली की पहाड़ियों में खनन कर बड़े बड़े फार्म हाउस बन रहे हैं, वैसे ही अब ये जंगली जानवर या तो पहाड़ो से नीचे आकर सड़क पर वाहनों का शिकार हो जाते हैं या इन पहाड़ियों से विलुप्त होते जा रहे है और इनकी जगह अब नजर आते हैं।

दरअसल गुजरात, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा तक फैली अरावली की पहाड़ियां एक संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र में आती हैं। दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक माना जाने वाला यह क्षेत्र खनिजों के मामले में काफी समृद्ध है, जिसने इसे खनन का एक प्रमुख क्षेत्र बना दिया है। ,

ग्राउंडवाटर रिचार्ज के लिहाज से यह सीमावर्ती काफी अहम हैं और इसे प्रदूषण प्रभावित दिल्ली-एनसीआर का ‘ग्रीन लंग’ तक कहा जाता है। इसे पश्चिमी रेगिस्तान के उत्तर प्रदेश में गंगा के किराने बसे अनाज का कटोरा कहे जाने वाले क्षेत्रों तक पहुंचने में आखिरी अवरोध भी माना जाता है।
यह भी अपने आप में दिलचस्प है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पिछले कुछ वर्षों में पारित आदेशों के तहत यहां खनन पर तो रोक लगी हुई है, लेकिन अवैध अतिक्रमण और निर्माण के साथ गैरकानूनी तरीके से खनन लगातार यहां के लिए एक बड़ा संकट बना हुआ है।  इस पर्वत श्रृंखला के अत्यधिक दोहन ने स्थानीय पारिस्थितिक परिवर्तनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। खोरी गांव अरावली पहाड़ियों के बीच स्थित था, जहां कभी एक खदान होती थी, कोर्ट के आदेश पर 2009 में फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात के अरावली पहाड़ी क्षेत्रों में सभी खनन गतिविधियों पर रोक लग गई थी। खोरी में बस्तियां बसने की शुरुआत 1990 के दशक में हुई. शुरू में यहां खदान श्रमिक रहते थे, लेकिन बाद में और लोगों के आने से इसका दायरा बढ़ गया था।

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