18 स्वतंत्रता सेनानी अकेले बिजनौर से, राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय पटल पर छाए थे ठाकुर हर गुलाल सिंह सिंह
लामबंद होकर बीजेपी को समर्थन करता रहा है समाज, दिल्ली को छोड़ दें तो समाज का एक जनप्रतिनिधि नहीं
चरण सिंह
बिजनौर। कहा जाता है कि जो समाज अपने पुरखों के संघर्ष और बलिदान को भूलकर पिछलग्गू बन जाता है तो वह अपना वजूद खोने लगता है। ऐसा ही रवा राजपूत समाज के साथ हो रहा है। इस समाज ने स्वतत्रंता आंदोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया। त्याग बलिदान और संघर्ष की गाथा को समेटे यह समाज आज की तारीख में सामाजिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ है। स्थिति यह है कि यदि दिल्ली को छोड़ दिया जाए तो बागपत, मुजफ्फरनगर और बिजनौर में एक भी जनप्रतिनिधि रवा राजपूत समाज का नहीं है। देश की स्थापित पार्टियों में से एक भी पार्टी ने इस समाज के किसी नेता को कोई सम्मानित पद भी नहीं दिया। इसके पीछे समाज की राजनीतिक उदासीनता मानी जाती है।
राजनीतिक रूप से समाज की लगभग हर पार्टी में भागीदारी है पर इस समाज की मुहर बीजेपी पर लगी है। यह माना जाता है कि रवा समाज पहले जनसंघ और फिर बीजेपी से लामबंद होकर जुड़ गया था। जबकि ऐसा नहीं है। महान स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर हर गुलाल सिंह खुद समाजवादी थे। समाजवाद के प्रणेता डॉ. राम मनोहर लोहिया, लोक नायक जय प्रकाश, चौधरी चरण सिंह और चंद्रशेखर के साथ उन्होंने काम किया। समाज ने चौधरी चरण सिंह के समय लोकदल को भी समर्थन किया। समाज के काफी लोग कम्युनिस्ट भी रहे। बिजनौर का बरमपुर गांव तो कम्युनिस्टों का ही माना जाता है। कामरेड रामपाल सिंह जो लम्बे समय तक जनपद बिजनौर माकपा के जिला मंत्री रहे वह भी बरमपुर गांव के ही हैं। मैं खुद वैचारिक रूप से समाजवादी हूं, हां पर समाज ने मुहर बीजेपी की लगवा रखी है।
एक पार्टी विशेष का पिछलग्गू होने की वजह से दुष्परिणाम यह हो रहा है कि बीजेपी इस समाज को अपना बंधुआ वोटबैंक समझती है और दूसरी पार्टियां कोई तवज्जो नहीं देती। मतलब रवा राजपूत समाज राजनीतिक रूप से हाशिये पर है।
आज की तारीख में भले ही समाज में राजनीतिक रूप से उदासीनता देखी जा रही हो पर स्वतंत्रता आंदोलन में यह समाज अग्रणी भूमिका निभा रहा था। इस समाज से 55 स्वतंत्रता सेनानी दिए हैं। अकेले बिजनौर से 18 स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं। इस समाज में बिजनौर से ठाकुर हर गुलाल सिंह की तरह से 18 स्वत्रंतता सेनानी हुए हैं। इसे सभी महान क्रांतिकारी देश को आजाद करने के लिए जेल गए। हरगुलाल सिंह लच्छीरामपुर के थे तो हरगोविंद सिंह और बाबूराम सिंह ग्राम बरमपुर के लेखराज सिंह, हरबंस सिंह, शीतल सिंह, स्वरूप सिंह, शादी सिंह ग्राम गजरौला के। मुंशी नयन सिंह और नत्थू सिंह ग्राम नगला महेश्वरी के। पूरन सिंह और लायक राम सिंह ग्राम पुंडरी खुर्द के। मुसद्दी सिंह और अंगद सिंह ग्राम सीकरी के। किशोर सिंह और घसीटा सिंह ग्राम नयागांव के। यज्ञदत्त ब्रह्मचारी ग्राम भागूवाला के। लायक राम सिंह और बलराम सिंह ग्राम असगरपुर के थे।
जानकारी के अनुसार समाज के एक स्वतंत्रता सेनानी को फांसी भी दी गई थी। एक स्वतंत्रता सेनानी को भाषण देते हुए अंग्रेजों ने गोली मारी थी। उनमें कितना जज्बा था इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गोली उनके हाथ में लगी थी। डॉक्टर ने हाथ काटने के लिए बेहोश करने का कहा तो उन राजपूत शेर ने कहा मेरा हाथ का ऑपरेशन बिना बेहोश किये करें। डाक्टर ने बिना बेहोश किये उनका हाथ काट दिया था। ऐसे बब्बर शेर हुए हैं रवा राजपूत समाज में। अमर शहीद ठाकुर गंगा बिशन पंवार और स्वतंत्रता सेनानी खुशीराम पंवार भी इसी समाज में हुए हैं।
रवा राजपूत समाज को देशभक्त समाज माना जाता है। यह समाज बिजनौर के अलावा मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ और दिल्ली नारायणा में मुख्य रूप से निवास करता है। राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ होने की वजह से समाज के युवा उतने आगे नहीं बढ़ पा र रहे हैं जितने वे योग्य हैं। यह समाज शिक्षा में अग्रणी माना जाता है। हालांकि समाज के युवाओं में अपने मां सम्मान और अधिकार की लड़ाई लड़ने के प्रति जागरूकता आ रही है।
नेतृत्व के अभाव में इन युवाओं के संघर्ष को वह धार नहीं मिल पा रही है, जिसकी जरुरत समाज को है। रवा राजपूत समाज को आज की तारीख में एक शक्ति प्रदर्शन की जरूरत है। शक्ति प्रदर्शन से समाज को यह फायदा होगा कि समाज को उसका हक़ मिलना शुरू हो जाएगा। फिर बीजेपी का ध्यान भी इस समाज की ओर जाएगा और दूसरी पार्टियां भी तवज्जो देनी शुरू कर देंगी।







