एक दौर था जब सामाजिक न्याय एक गंभीर वैचारिक लड़ाई थी। फुले, आंबेडकर, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और जननायक कर्पूरी ठाकुर ने इस अवधारणा को जन्म देकर समाज के पिछड़े, वंचित और शोषित वर्ग को आवाज दी। कर्पूरी जी के बाद बिहार में यदि किसी नेता ने सामाजिक न्याय को एक जनांदोलन की तरह आगे बढ़ाया, तो वे थे लालू प्रसाद यादव जी। लालू जी के दौर में सामाजिक न्याय सचमुच सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर परिवर्तन की ताकत बनने लगा था।
आज इसकी रूपरेखा वैसी नहीं बची जैसी मूल विचारधारा थी। जहाँ सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को ऊपर उठाना था, वहीं अब इसके नाम पर अनावश्यक बयानबाजी और समाज को बाँटने की राजनीति हावी होने लगी है। सबसे चिंताजनक यह कि— सामाजिक न्याय की जगह अब ‘स्वर्ण समाज को नीचा दिखाने’ या ‘गाली देने’ जैसी गलत प्रवृत्तियाँ पनपने लगीं।
यह न लोहिया की सोच है, न कर्पूरी जी का लोकतांत्रिक रास्ता, न लालू जी के शुरुआती दौर का सामाजिक परिवर्तन। आज की राजनीति साफ संकेत देती है कि अब वही नेता और पार्टी आगे बढ़ेंगे जो हर वर्ग को साथ लेकर चलेंगे। वोटर आज सम्मान चाहते हैं, न कि संघर्ष या कटुता। सामाजिक न्याय तभी मजबूत होगा जब समाज के हर तबके को बराबरी का स्थान मिले—किसी को अपमानित करके नहीं।
राजद ने हमेशा सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दी है, लेकिन पार्टी के कुछ प्रवक्ताओं द्वारा स्वर्ण समाज पर की गई तीखी और अपमानजनक टिप्पणियों ने स्थिति को बिगाड़ दिया। इन बयानों ने स्वर्ण समाज को आहत किया और उन्होंने स्वभाविक रूप से राजद से दूरी बना ली। एक राजनीतिक दल के लिए कोई भी वर्ग स्थायी शत्रु नहीं होता—लेकिन गलत भाषा उसे स्थायी दूरी पर ले जाती है।
तेजस्वी यादव जी ने इस चुनाव में बेहद संघर्ष किया।
दिन-रात मेहनत की, सभाएँ कीं, और बेरोजगारी जैसे गंभीर मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। हर सभा, हर भाषण में वे युवाओं की बात को मजबूती से रखते रहे।
लेकिन राजनीतिक माहौल, संगठन की कमजोरी, सामाजिक समीकरण और कुछ रणनीतिक गलतियों के कारण वह जीत नहीं मिल सकी जिसकी उम्मीद थी। यह तेजस्वी जी की मेहनत की कमी नहीं—बल्कि ऐसे कई कारकों का योग है जिन पर पार्टी को गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए।
अगर बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय को दोबारा एक मजबूत विचारधारा बनाना है, तो उसे अपनी मूल सोच—सम्मान, समानता और न्याय—की तरफ वापस ले जाना होगा। किसी भी वर्ग का अपमान सामाजिक न्याय नहीं है, और न ही इस राजनीति से स्थायी समर्थन मिल सकता है।
आज का समय भाईचारा, सम्मान और सबको साथ लेकर चलने की राजनीति का है—और बिहार इसी बदलाव की ओर बढ़ रहा है।








