चरण सिंह
क्या यह नीतीश कुमार के काम हैं ? क्या यह नीतीश कुमार को सहानुभूति मिली है ? क्या पीएम मोदी का जादू बिहार में चला है ? क्या लालू राज का दिखाना तेजस्वी यादव को भारी पड़ा है ? क्या यह चुनाव आयोग का खेल है ? हो कुछ भी रुझान में एनडीए की डबल सेंचुरी किसी को पच नहीं रही है। हो कुछ भी चाचा ने अपने को साबित कर दिया और भतीजा चारो खाने चित हो गया।
दरअसल जिस तरह से एग्जिट पोल आये यह तो कहा जा सकता है कि एनडीए की सरकार बनने जा रही है। पर एनडीए की सीटें 200 से ऊपर पहुंच जाएगी, यह तो खुद एनडीए नेताओं को भी विश्वास नहीं होगा। इसमें दो राय नहीं कि नीतीश कुमार ने इन चुनाव में जी तोड़ मेहनत की है। नीतीश कुमार को आभास था कि यदि जदयू की सीटें कम रह गई तो बीजेपी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनने देगी। नीतीश के समर्थकों को भी लग रहा था कि बीजेपी उनको मुख्यमंत्री नहीं बनाने जा रही है। इसलिए उन्होंने जदयू को जमकर वोट किया।
आरजेडी को प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने भी नुकसान पहुंचाया है। वैसे भी जिस तरह से आरजेडी ने यादवों को एकतरफा सीटें दी उससे भी गलत संदेश गया। हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद अब बिहार में क्षेत्रीय दलों की दुर्गति यह दर्शा रही है कि अब लोग परिवारवादी पार्टियों को पसंद नहीं कर रहे हैं।
दरअसल इन पार्टियों को पाने परिवार, रिश्तेदारों और जाति के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा है। बिहार में लालू प्रसाद, यूपी में मुलायम सिंह, महाराष्ट्र में शरद पवार, तमिलनाडु में करुणानिधि, जम्मू कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला, हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला, झारखंड में शिबू सोरेन ने पार्टियों को परिवारवादवादी पार्टी बनाकर छोड़ था।
ये पार्टियां किसी कार्यकर्ता को नेता नहीं बनने देती हैं। गुलाम समझती हैं। इसके चलते भी लोग अब क्षेत्रीय दलों से कटने लगे हैं। अब बिहार के बाद पश्चिम बंगाल का है। बीजेपी बंगाल में ममता बनर्जी का हाल भी तेजस्वी यादव जैसा हाल करने रणनीति पर काम कर रही है।








