Gen-Z समूह में फूट: एकजुटता से विभाजन तक
Gen-Z आंदोलन शुरू में सोशल मीडिया बैन (फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप आदि पर 4 सितंबर से लगाया गया) और भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट था। युवाओं ने वाइबर और टिकटॉक जैसे ऐप्स के जरिए संगठित होकर प्रदर्शन किया, लेकिन ओली के इस्तीफे के बाद आंदोलन का नेतृत्व और दिशा तय करने में फूट पड़ गई। विभिन्न गुटों में विचारधारा का अंतर साफ दिखा—कुछ राजतंत्रवादी हैं, तो कुछ वामपंथी; कोई हिंदू राष्ट्र की मांग कर रहा है, तो कोई गैर-राजनीतिक अंतरिम सरकार चाहता है।
मुख्य विभाजन बिंदु: ओली के इस्तीफे के बाद Gen-Z प्रतिनिधियों ने सेना के साथ बातचीत शुरू की, लेकिन अंतरिम नेतृत्व पर सहमति नहीं बनी। पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को एक गुट ने समर्थन दिया, जबकि अन्य बालेंद्र शाह (काठमांडू मेयर), हarka सम्पांग (धरान मेयर) या कुलमान घिसिंग के नाम पर जोर दे रहे हैं। 10 सितंबर को सेना मुख्यालय (भद्रकाली बेस) पर Gen-Z के 15 प्रतिनिधियों की बैठक हुई, लेकिन वहां विभिन्न गुटों के बीच टकराव हो गया। एक गुट ने कार्की के नाम का विरोध किया और बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनाने के नारे लगाए। सेना ने इन गुटों को शांति बनाए रखने और गुरुवार (11 सितंबर) को दोबारा बुलाया।
आर्मी हेडक्वार्टर में मीटिंग का विरोध
सेना ने संकट के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाई और Gen-Z को भद्रकाली आर्मी बेस पर आमंत्रित किया। लेकिन मीटिंग के दौरान विरोध भड़क गया:
सेना अधिकारियों ने संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया, लेकिन Gen-Z गुटों ने एक-दूसरे पर “हाईजैक” (आंदोलन पर कब्जा) का आरोप लगाया।
एक गुट ने मीटिंग को “राजनीतिक हस्तक्षेप” बताकर विरोध किया, जबकि अन्य ने सेना से तत्काल अंतरिम सरकार गठन की मांग की।
परिणाम: बातचीत रुकी, और सेना ने कर्फ्यू सख्ती से लागू किया। सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने अपील की कि “संवैधानिक ढांचे के भीतर समाधान निकाला जाए, अराजकता नहीं।” विशेषज्ञों के अनुसार, सेना की कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं है, लेकिन वह जल्द चुनाव (1 वर्ष में) चाहती है।
कुलमान घिसिंग का नाम अंतरिम पीएम के लिए आगे
Gen-Z के विभाजित गुटों में कुलमान घिसिंग (पूर्व नेपाल विद्युत प्राधिकरण के कार्यकारी निदेशक) का नाम प्रमुखता से उभरा है। घिसिंग को “भ्रष्टाचार-विरोधी” और “लोकप्रिय” माना जाता है, क्योंकि उन्होंने बिजली संकट को हल किया था।
कैसे नाम आगे आया: 10 सितंबर की वर्चुअल बैठक (7800 सदस्यों वाली) में घिसिंग, सुशीला कार्की और बालेन शाह के नाम चर्चा में रहे। कांतिपुर अखबार के अनुसार, सेना मुख्यालय पर एक गुट ने घिसिंग को समर्थन दिया, जबकि अन्य कार्की के पक्ष में थे।
वर्तमान स्थिति: सहमति नहीं बनी, लेकिन घिसिंग को “स्वतंत्र और सक्षम” उम्मीदवार माना जा रहा है। संविधान के तहत अंतरिम पीएम संसद सदस्य होना चाहिए, इसलिए संसद भंग करना पड़ेगा। भारत ने भी नेपाल की स्थिरता पर चिंता जताई है और सीमा पर सुरक्षा बढ़ाई है।
आगे क्या?
संभावित परिणाम: सेना की मध्यस्थता से गुरुवार को नई बैठक हो सकती है। यदि सहमति बनी, तो 1 वर्ष में चुनाव। लेकिन फूट से आंदोलन कमजोर हो सकता है।
प्रभाव: हवाई अड्डा बंद, उड़ानें रद्द; भारत ने यात्रा सलाह जारी की। प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की निंदा की, लेकिन “पूर्ण परिवर्तन” की मांग जारी है।
यह संकट नेपाल की राजनीति को नया मोड़ दे सकता है, जहां युवा शक्ति ने पुरानी व्यवस्था को चुनौती दी है।






