“आवारा कुत्तों पर लगाम : मानव जीवन पहले”

“सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश—करुणा के साथ सुरक्षा भी जरूरी”

“मानव जीवन और सुरक्षा पहले — सुप्रीम कोर्ट”

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि हर इलाके से आवारा कुत्तों को हटाकर सुरक्षित स्थानों पर रखा जाए। प्रक्रिया में बाधा डालने वाले संगठनों या व्यक्तियों पर सख्त कार्रवाई होगी। यह आदेश बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। कुत्तों के हमलों और रेबीज़ जैसी घातक बीमारी के बढ़ते मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। कोर्ट ने संतुलित समाधान सुझाया—कुत्तों को मारा नहीं जाएगा, बल्कि उन्हें सुरक्षित आश्रयों में रखा जाएगा। यह मानव और पशु, दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ठोस कदम है।


डॉ. सत्यवान सौरभ

सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय, जिसमें हर इलाके से आवारा कुत्तों को हटाकर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने का निर्देश दिया गया है, एक अहम और लंबे समय से प्रतीक्षित कदम है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा—”मानव जीवन और सुरक्षा पहले”—जो इस मुद्दे पर चल रही बहस में एक निर्णायक रुख को दर्शाता है। यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि अब समय आ गया है जब भावनात्मक बहस से आगे बढ़कर व्यावहारिक समाधान अपनाया जाए।

भारत में आवारा कुत्तों की संख्या का अनुमान अलग-अलग राज्यों में भिन्न है, लेकिन कुछ रिपोर्टों के अनुसार देश में लगभग 1.5 से 2 करोड़ आवारा कुत्ते हैं। यह संख्या केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—क्योंकि इनकी उपस्थिति सीधे तौर पर सार्वजनिक सुरक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य पर असर डाल रही है। पिछले एक दशक में आवारा कुत्तों के हमलों के मामले लगातार बढ़े हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि हर साल लगभग 17 से 20 लाख लोग कुत्तों के काटने का शिकार होते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में बच्चे होते हैं, क्योंकि उनकी ऊँचाई और असुरक्षा के कारण वे कुत्तों के आसान निशाने बन जाते हैं। गंभीर बात यह है कि इन हमलों का नतीजा सिर्फ़ चोट तक सीमित नहीं रहता; रेबीज़ जैसी घातक बीमारी का खतरा हमेशा मौजूद रहता है, जिसकी वजह से हर साल हज़ारों जानें जाती हैं।

पशु अधिकार संगठनों का तर्क है कि आवारा कुत्तों को मारना अमानवीय है और उन्हें भी जीने का अधिकार है। यह दृष्टिकोण सही है, लेकिन इसे उस समय तक ही मान्यता दी जा सकती है जब यह मानव जीवन को खतरे में न डाले। कोर्ट ने भी इसी संतुलन को साधते हुए कहा है कि कुत्तों को अंधाधुंध मारा न जाए, बल्कि उन्हें सुरक्षित स्थानों या आश्रयों में स्थानांतरित किया जाए। यहाँ सवाल उठता है—क्या हमारे नगर निकाय और पंचायतें इस चुनौती के लिए तैयार हैं? क्योंकि केवल आदेश देना काफी नहीं है; ज़मीन पर उसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और योजनाबद्ध रणनीति की आवश्यकता होगी।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक कानूनी रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई संगठन या व्यक्ति इस प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसका मतलब है कि अब “मानव जीवन बनाम पशु अधिकार” की बहस में कोर्ट ने स्पष्ट प्राथमिकता तय कर दी है। साथ ही, कोर्ट ने नगर निगमों और पंचायतों को यह जिम्मेदारी भी सौंपी है कि वे न केवल आवारा कुत्तों को हटाएँ, बल्कि उनकी देखभाल के लिए उचित व्यवस्था भी करें। यह आदेश एक तरह से प्रशासनिक तंत्र की क्षमता और ईमानदारी की भी परीक्षा है।

रेबीज़ भारत में एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में हर साल लगभग 59,000 लोग रेबीज़ से मरते हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा भारत से आता है। यह बीमारी 99% मामलों में कुत्तों के काटने से फैलती है और एक बार लक्षण प्रकट होने के बाद इसका इलाज संभव नहीं है। इसलिए, कुत्तों के काटने के मामलों को रोकना ही सबसे प्रभावी उपाय है। इसके अलावा, आवारा कुत्तों के झुंड अक्सर कचरे के ढेर पर भोजन खोजते हैं, जिससे कई तरह के संक्रमण और गंदगी फैलती है। यह शहरी स्वच्छता और स्वच्छ भारत अभियान जैसे प्रयासों को भी प्रभावित करता है।

यह समस्या सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं है; इसमें समाज की भी बड़ी भूमिका है। लोग अक्सर धार्मिक या दया के भाव से आवारा कुत्तों को अपने घर के बाहर खाना डालते हैं। हालांकि यह भावना सराहनीय है, लेकिन यह कई बार कुत्तों के झुंड बनने और आक्रामक व्यवहार को बढ़ावा देती है। अगर यह भोजन खुले में डाला जाए, तो इससे और कुत्ते आकर्षित होते हैं और स्थानीय आबादी के लिए खतरा बढ़ जाता है। समाज को समझना होगा कि करुणा और जिम्मेदारी साथ-साथ चलनी चाहिए। अगर हम वास्तव में इन जानवरों की भलाई चाहते हैं, तो उन्हें संगठित तरीके से आश्रयों में पहुँचाना और उनका नसबंदी कार्यक्रम चलाना ज़रूरी है।

आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने के लिए बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाना होगा। प्रत्येक नगर और पंचायत में पर्याप्त संख्या में डॉग शेल्टर बनाए जाएँ, जहाँ उन्हें भोजन, पानी और चिकित्सीय सुविधा मिले। लोगों को यह सिखाना ज़रूरी है कि कैसे कुत्तों से सुरक्षित दूरी बनाई जाए और उन्हें खुले में खाना न डालें। खुले में पड़ा कचरा आवारा कुत्तों का मुख्य आकर्षण है, जिसे नियंत्रित करना आवश्यक है। मोहल्ला स्तर पर निगरानी समितियाँ बनाई जा सकती हैं जो कुत्तों की गतिविधियों पर नज़र रखें और प्रशासन को सूचित करें।

कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए सफल मॉडल अपनाए हैं। उदाहरण के लिए, थाईलैंड में सरकार और NGOs ने मिलकर नसबंदी और टीकाकरण कार्यक्रम चलाए, जिससे आवारा कुत्तों की संख्या और हमलों में भारी कमी आई। तुर्की ने अपने “स्ट्रीट डॉग्स प्रोजेक्ट” के तहत कुत्तों को सुरक्षित स्थानों पर रखा और उन्हें ट्रैक करने के लिए माइक्रोचिप लगाए। भारत इन मॉडलों से सीख लेकर अपने स्थानीय संदर्भ में समाधान विकसित कर सकता है।

आवारा कुत्तों की समस्या केवल कानून और अदालत का मामला नहीं है, बल्कि यह मानव सुरक्षा, स्वास्थ्य और नैतिकता से जुड़ा सामाजिक मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट का “मानव जीवन और सुरक्षा पहले” वाला रुख इस बहस को सही दिशा देता है। अब यह जिम्मेदारी नगर निकायों, पंचायतों और नागरिकों की है कि वे मिलकर इस समस्या का समाधान निकालें। करुणा का अर्थ यह नहीं कि हम खतरे को नज़रअंदाज़ करें, और सुरक्षा का अर्थ यह नहीं कि हम अमानवीय हो जाएँ। संतुलित, मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण ही वह रास्ता है जिससे इंसान और जानवर—दोनों—सुरक्षित रह सकते हैं।

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