सियासत में सौदागर बनाम विचारधारा से बंधे कार्यकर्ता !

प्रोफेसर राजकुमार जैन

आज के वक्त में जब सियासत में विचारधारा कपड़े बदलने की तरह बन गई है। बरसों बरस केंद्र में मंत्री, राज्य में मुख्यमंत्री, पार्टी के अध्यक्ष, एमपी, एमएलए थोक में पार्टी बदलने का हर रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं तो आम लोगों में भी यह भावना गहरे से बन रही है की सियासत में कोई दीन ईमान नहीं, राजनीति दौलत और शोहरत कमाने का सबसे आसान जरिया बन गई है। आम लोग, खद्दर का कुर्ता पजामा पहनने वाले कार्यकर्ताओं को अच्छी नजर से नहीं देखते, उनको धंधेबाज तथा जो किसी पद पर अभी तक नहीं पहुंच पाए, भाव यह है कि इस बेचारे का दाव नहीं लगा, कोशिश में लगा है।
परंतु क्या यह हकीकत है,? सियासत में क्या सब बेपंदी के लोटे हैं, इसकी पड़ताल करना जरूरी है। मेरे तजुर्बे और नजरिये में इससे उलट एक दूसरी तस्वीर भी है। हालांकि उसकी तादाद जरूर कम होती जा रही है।
मेरे 60 साल के सियासी सफर में अनेकों ऐसे उदाहरण है, जहां राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी तमाम जिंदगी एक विचारधारा से बंध कर गुजार दी। विचारधारा के कारण कितनी भी दुश्वारियां, कठिनाइयां, जुल्म सहने पड़े परंतु किसी तरह का डर, सत्ता की आकांक्षा,अथवा किसी भी प्रकार की सुख सुविधा का लालच उनकी जिंदगी में देखने को नहीं मिला। उसकी सबसे बड़ी खासियत इस बात में रही कि यह बात किसी एक विचारधारा, पार्टी तक ही महदूद नहीं रही। यूं तो सैकड़ों ऐसे लोगों की जानकारी मुझे है।
फिलहाल दिल्ली के ऐसे चंद लोग जिनके साथ पिछले 40-50-60 सालों से मेरा ताल्लुक रहा है, जिन्होंने अपनी तमाम जिंदगी अपनी विचारधारा, पार्टी के साथ गुजार दी। यही नहीं वे उच्च शिक्षित अपने अपनें पेशे में नामवर तथा प्रतिष्ठित भी रहे हैं, उनका जिक्र कर रहा हूं।
भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रोफेसर राजकुमार भाटिया जिन्हें में तकरीबन 55 साल से जानता हूं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में भाजपा के यूथ संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जड़ें जमाने से लेकर देशभर में विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में संगठन को बनाने और सक्रिय करने में उन्होंने अपना जीवन लगा दिया। दिवंगत अरुण जेटली को राजनीति में दाखिल तथा स्थापित करने में इनकी मुख्य भूमिका रही है। नरेंद्र मोदी जब गुजरात में एक स्थानीय युवक नेता के रूप में थे उस समय भाटिया राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को तैयार करने में लगे रहते थे। आपातकाल में हम लोगों ने मीसाबंदी के रूप में जेल में जीवन बिताया। आज केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार है, उनके जूनियर केंद्र से लेकर राज्यों में बड़े-बड़े पदों पर काबिज है परंतु राजकुमार भाटिया आज भी संगठन के कार्य में जुटे रहते हैं, आज तक उन्होंने कोई सार्वजनिक चुनाव नहीं लड़ा। विजय क्रांति 60 के दशक में किरोड़ी मल कॉलेज के छात्र थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विद्यार्थी परिषद में सक्रिय विजय क्रांति ने तिब्बत मुक्ति आंदोलन का फोटोग्राफी के माध्यम से प्रचार करने में अपनी जिंदगी लगा दी। कांग्रेस के श्री हरचरण सिंह जोश तमाम उम्र कांग्रेस के झंडे को कंधे पर ढोते रहे। दिल्ली यूनिवर्सिटी में 58 साल पहले हमने एक दूसरे के खिलाफ दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रौ संघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। 1984 में दिल्ली में सिखों के नरसंहार के बाद सिख समुदाय में कांग्रेस पार्टी के लिए नफरत का माहौल था। खुद हरचरण सिंह जोश पर प्राण घातक हमला केवल इसलिए नाकाम हुआ क्योंकि गैर सिख समाज के उनके पड़ोसी जो उनके मुरीद थे उन्होंने ढाल बनकर उनकी अगर हिफाजत न की होती तो इनका बचना मुश्किल था। ऐसे माहौल में रहकर भी वे कभी कांग्रेस पार्टी से एक पल के लिए भी अलग नहीं हुए। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कमेटी के प्रमुख सदस्य मेरे सहपाठी जोगेंद्र शर्मा दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। पार्टी के कार्य के लिए उन्होंने वॉलंटरी रिटायरमेंट लेकर अपनी सारी जिंदगी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन में लगा दी। किसी भी तरह के वैधानिक पद की ओर उन्होंने झांका भी नहीं, पार्टी कार्यालय ही उनका मरकज बना रहा। यह जानने के बावजूद की मार्क्सवादी पार्टी से किसी भी बाहरी पद की मिलने की कोई गुंजाइश दिल्ली में ना कभी थी और ना फिलहाल दिखाई देती है। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के दो भूतपूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा डॉ अमरदेव शर्मा जैसा वैचारिक आस्था में निष्ठा रखने वाले होना कोई साधारण बात नहीं। मेरे कॉलेज की सहपाठी अमरजीत कौर जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय सचिव हैं। कॉलेज के वक्त भी अपनी पार्टी की कार्यकर्ता के रूप में ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन में सक्रिय रूप से जुटी रहती थी। आज भी वह देशभर में अपनी पार्टी के विस्तार, प्रचार में पूरी शिद्दत के साथ जुड़ी रहती है। इसी तरह उनकी पार्टी के प्रोफेसर दिनेश वार्ष्णेय छात्र जीवन से ही जलूसों में जोर-शोर से भाषण, नारेबाजी करते रहते थे। आज भी वे दिल्ली की कम्युनिस्ट पार्टी के कार्य में पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बने रहते हैं। दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री आतिशी सिंह की माता तृप्ता वाही, तथा पिता प्रोफेसर विजय सिंह तमाम उम्र मार्क्सवादी एमएल ग्रुप में सक्रिय रहकर परचे बाटंते रहें।
सोशलिस्ट विचारधारा में यकीन रखने वाले में ऐसे सैकड़ो साथियों को जानता हूं, जो चाहते तो अपनी प्रतिभा, ज्ञान, त्याग, व्यक्तित्व के आधार पर किसी भी अन्य पार्टी में अपना कैरियर बना सकते थे। परंतु एक क्षण के लिए भी उनकी आस्था कभी डिगी नहीं।
पिछले 58 साल से मेरे सोशलिस्ट साथी मदनलाल हिंद जो कि हिंदुस्तान टाइम्स में एक पत्रकार रह चुके हैं, तथा 1968 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी दिल्ली के महासचिव भी रहे चुके हैं ऐसे साथी है जो सोशलिस्ट पार्टी के आंदोलनों में अपनी माता जी के साथ प्रदर्शन करते हुए अनेकों बार गिरफ्तार होकर जेल गए। अपने लड़कपन में सोशलिस्ट बन गए महेंद्र शर्मा जो कि अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठनों में कार्यरत रहे। 80 साल की उम्र होने के बावजूद आज भी सोशलिस्ट गतिविधियों में पूरी शिद्दत के साथ जुड़े रहते हैं। पिछले 60 सालों से मेरे समाजवादी साथी जयकुमार जैन एडवोकेट कार्यकर्ता के रूप में आंदोलन में अपना योगदान देते रहे हैं। सोशलिस्ट पार्टी दिल्ली के अध्यक्ष रह चुके श्याम गंभीर पिछले 5० साल से अनगिनत बार सोशलिस्ट आंदोलन में अपनी पत्नी रेनू गंभीर जी के साथ जेल जाते रहे। सोशलिस्ट पार्टी,(लोहिया) के अध्यक्ष रह चुके सुभाष भटनागर, भारत के प्रसिद्ध संगीत समीक्षक रविंद्र मिश्रा तकरीबन 55 साल से मेरे साथ समाजवादी आंदोलन में शिरकत करते रहे हैं। प्रोफेसर द्विजेंद्र कालिया 67-68 में जब किरोड़ी मल कॉलेज के छात्र थे उस समय मेरी उनसे मुलाकात हुई थी तब से लेकर आज तक वे समाजवादी विचारधारा, आंदोलन के साथ जुटे रहे हैं। दो बार उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की अकादमी काउंसिल में समाजवादियों का प्रतिनिधित्व किया। साथी विजय प्रताप 1970 से समाजवादी आंदोलन में शरीक हुए थे, आज भी उससे जुड़े हुए हैं। हंसराज कॉलेज के छात्र रहते हुए रविंद्र मनचंदा समाजवादी यु्वजन सभा मैं शामिल हुए थे तकरीबन75 साल की उम्र के बावजूद आज तक वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े हुए हैं। नानक चंद 50 वर्षों से भी अधिक हंसराज कॉलेज के छात्र रहते हुए समाजवादी आंदोलन से जुड़े थे। भारत सरकार के समाज कल्याण द्वारा प्रकाशित एक बड़ी पत्रिका के संपादक होने के साथ-साथ दिल्ली सरकार के द्वारा स्थापित अकादमी के भी सचिव पद पर रह जाने के बावजूद, समाजवादी आंदोलन से मुसलसल जुड़े रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष एवं सचिव रह चुके डॉ हरीश खन्ना 1973 से समाजवादी तहरीक से जुड़कर समाजवादी शिक्षक मंच की मार्फत कार्यरत रहे, अनेकों बार जेल भी गए आज भी “समाजवादी, समागम” के महासचिव हैं। प्रोफेसर अजीत झा तो खानदानी सोशलिस्ट है। इनके पिताजी बिहार सोशलिस्ट पार्टी के बड़े नेता रह चुके हैं। अजीत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में तथा बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पद पर रहते हुए पिछले 45 सालों से समाजवादी विचारधारा से जुड़कर विचारधारा के प्रचार प्रसार में आज भी लगे हुए हैं। विनय भारद्वाज 1972 में समाजवादी विचारधारा से जुड़ी थी। सोशलिस्ट महिला नेता मृणाल गोरे, प्रमिला दंडवते, मंगला पारिख द्वारा स्थापित “महिला दक्षता समिति” में सालों से कार्यरत तथा समाजवादी गतिविधियों से जुड़ी हुई है। मंजू मोहन समाजवादी समागम की उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ महिला आंदोलन में समाजवादियों का प्रतिनिधित्व करती रहती है। नौजवान प्याली सोशलिस्ट साथी सुनील की बेटी है, आज भी अपने पिता के नक्शे कदम पर चल रही है। डॉ प्रेम सिंह, 50 सालों से अधिक दिल्ली मे समाजवादी आंदोलन की विचार पताका को फहराने में लगे हुए हैं। प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह के पिताजी मरहूम मोलेश्वर बाबू बिहार में सोशलिस्ट तहरीक के बड़े नेता थे। अशोक कुमार सिंह समाजवादी आंदोलन से इसी तरह से आज भी जुड़े हुए हैं, दो बार इन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की अकादमी काउंसिल में चुनाव जीत कर समाजवादियों का प्रतिनिधित्व किया है। डॉ अमरनाथ झा जो एक शायर भी हैं ने दिल्ली विश्वविद्यालय की एकेडमिक काउंसिल में दो बार निर्वाचित होकर समाजवादियों की नुमाइंदगी की। प्रोफेसर वीरेंद्र तोमर बरसों से समाजवादी शिक्षक मंच के प्रमुख सक्रिय साथी के रूप में काम कर रहे हैं। डॉ अनिल ठाकुर दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक आंदोलन में समाजवादी पक्ष की अगुवाई करते रहे हैं। आज भी वे समाजवादी समागम के महासचिव है। शशि शेखर सिंह अपने छात्र जीवन से ही समाजवादी आंदोलन से प्रभावित रहे हैं। बरसों बरस इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजवादी शिक्षक मंच की जिम्मेदारी संभाली है, आज भी समाजवादी समागम के महामंत्री है। राजवीर पंवार दिल्ली के वरिष्ठ सोशलिस्ट है, हर सभा धरने प्रदर्शन में उनकी हाजिरी रहती है। इनका घर हमेशा सोशलिस्ट गतिविधियों का केंद्र रहा है।
एडवोकेट पुरुषोत्तम वाल्मीकि, संजय कनौजिया, दिल्ली धोबी सभा के संयोजक के साथ-साथ समाजवादी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। राकेश कुमार दिल्ली में समाजवादियों द्वारा आयोजित धरने, प्रदर्शन, सभा में व्यवस्थापक की भूमिका सदैव निभाते रहे हैं। दिल्ली नगर निगम के वे दो बार निर्वाचित सदस्य भी रह चुके हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी एसटी एससी कर्मचारी यूनियन के नेता केदारनाथ पिछले 20- 25 वर्षों से समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी शेड्यूल कास्ट शेड्यूल ट्राइब कर्मचारी यूनियन के भूतपूर्व अध्यक्ष अमर सिंह सोशलिस्टों के संगठन राष्ट्र सेवा दल के भी दिल्ली में प्रमुख संगठन कर्ता रहे हैं। कमरे आलम, इज्जतुल्लाह अंसारी, शाहिद गंगोही,दिल्ली में कुली यूनियन के नेता बी राम सालों से समाजवादी आंदोलन में अपना योगदान दे रहे हैं। दिल्ली के मशहूर पत्रकारों में शुमार अरविंद मोहन, अरुण कुमार त्रिपाठी, जयशंकर गुप्ता, अतुल कुमार,, राजेंद्र राजन, हरि मोहन,अमलेश राजू, विनोद अग्निहोत्री, नलिनी रंजन मोहंती जैसे अन्य पत्रकारों ने कभी अपनी निष्ठा नहीं बदली। अंतरराष्ट्रीय एमनेस्टी इंटरनेशनल में प्रमुखता से भूमिका निभाने वाले रवि नायर, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता एस एस तोमर, अनिल नोरिया, गांधीवादी रमेश शर्मा समाजवादी अलख जगाने में लगे रहते हैं।
यह तो मैंने चंद साथियों का ही जिक्र किया है, ऐसे अनेकों साथी हैं जिन्होंने कभी भी अपनी समाजवादी निष्ठा से अलगाव नहीं किया।
विडंबना यह है की जो कार्यकर्ता अपनी विचारधारा से बंधे रहे, उनकी चर्चा न होकर जो सियासत में तिजारत, एक तरह का व्यापार करते रहे कि कहां फायदा होगा वे ही तिकड़मबाजी करके सत्ता प्राप्त कर लेते हैं। समाज में भी उनकी ही शख्सियत बनी रहती है। परंतु लुबबे लुबाव यह है कि इस सब मुल्य हीनता के बावजूद जो कार्यकर्ता अपने ईमान पर अडिग रहे उन्हें आंतरिक संतुष्टि तथा आनंद की अनुभूति सदैव रही, बनिस्पत उनके जो बड़े से बड़े पद पर रहे, परंतु पद से हटने पर उनकी बेचैनी, बौखलाहट, उदासी तथा सामाजिक अलगाव से उनको कभी भी निजात नहीं मिल पाती है।

  • Related Posts

    भगवद्गीता और बौद्ध नैतिकता की दलित–आंबेडकरवादी दृष्टि से आलोचनात्मक तुलना
    • TN15TN15
    • March 20, 2026

    एस आर दारापुरी  भारतीय बौद्धिक परंपरा में धर्म…

    Continue reading
    विवाह या विभाजन? रिश्तों के संतुलन पर सवाल
    • TN15TN15
    • March 20, 2026

    सम्मान का चयनात्मक सच-जब पत्नी के माता-पिता पूज्य…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    फिल्म ‘कहानी 2’ के निर्देशक को राहत, स्क्रिप्ट चोरी के आरोप में दर्ज केस सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया  

    • By TN15
    • March 20, 2026
    फिल्म ‘कहानी 2’ के निर्देशक को राहत, स्क्रिप्ट चोरी के आरोप में दर्ज केस सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया  

    अतीक अहमद का जिक्र कर अबू आजमी का बड़ा बयान, ‘मेरी पार्टी के सांसद और ISI के बीच…’

    • By TN15
    • March 20, 2026
    अतीक अहमद का जिक्र कर अबू आजमी का बड़ा बयान, ‘मेरी पार्टी के सांसद और ISI के बीच…’

    भगवद्गीता और बौद्ध नैतिकता की दलित–आंबेडकरवादी दृष्टि से आलोचनात्मक तुलना

    • By TN15
    • March 20, 2026
    भगवद्गीता और बौद्ध नैतिकता की दलित–आंबेडकरवादी दृष्टि से आलोचनात्मक तुलना

    होर्मुज की टेंशन खत्‍म, इस रास्‍ते जाएगा तेल-गैस… नेतन्याहू लेकर आए नया प्‍लान!

    • By TN15
    • March 20, 2026
    होर्मुज की टेंशन खत्‍म, इस रास्‍ते जाएगा तेल-गैस… नेतन्याहू लेकर आए नया प्‍लान!

    मोदी ने अग्निवीर के नाम पर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने के साथ ही सेना को भी कमजोर किया! 

    • By TN15
    • March 20, 2026
    मोदी ने अग्निवीर के नाम पर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने के साथ ही सेना को भी कमजोर किया! 

    हीलियम ने हिला दिया दुनिया को… कतर पर ईरानी हमले से पूरी

    • By TN15
    • March 20, 2026
    हीलियम ने हिला दिया दुनिया को… कतर पर ईरानी हमले से पूरी