गुलाबी शर्ट में विनय खुराना तथा सफेद शर्ट में दिनेश भाटिया जी
राजकुमार जैन
पिछले काफी अरसे से मैंने हिंदुस्तानी टीवी चैनलों को तकरीबन देखना बंद कर दिया था। परंतु रूसी/ यूक्रेन युद्ध, इस्राइल/ हमास, हिंदुस्तान /पाकिस्तान इज़रायल / ईरान जंग की वजह से विदेशी चैनलों के साथ-साथ देसी चैनलों की जंग संबंधी खबरों को देखने के लिए टकटकी लगाकर बार-बार इन चैनलों को अलट पलट कर देखने को मजबूर हो गया हूं। इन युद्धों से जन धन की जितनी बर्बादी हो रही है, वह तो हो ही रही है परंतु उसके साथ-साथ पर्यावरण मुतालिक जो भयंकर विनाश हो रहा है वह भी कम खतरनाक नहीं है। मिसाइल बमों, रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल से खेती, मिट्टी,नदियां भी प्रदूषित हो रही है। जीव जंतु, कीट पतंगे, पालतू पशु, जानवर,पेड़ पौधे जंग में इस्तेमाल बारूद के कारण झुलस रहे हैं। वायुमंडल कई तरह की जानलेवा गैसों से भर गया है।
दो मुल्कों की जंग से वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वह तो है ही परंतु बदकिस्मती से हमारे मुल्क में पर्यावरण मैं पलीता लगाने में हम भी पीछे नहीं है। हालांकि एक वक्त ऐसा भी था जब बिश्नोई समाज के पुरखों ने राजस्थान में पेड़ों से लिपटकर अपनी जान इसलिए दे दी थी क्योंकि राजा अपने महल में लकड़ी के इस्तेमाल के लिए उन हरे भरे पेड़ों को कटवा रहा था।
दिल्ली मुल्क की राजधानी है, वह दुनिया की प्रदूषित राजधानियों में भी अव्वल है। हालात यहां तक हो गए की नए छायादार, पर्यावरण को शुद्ध रखने वाले नीम पीपल जैसे पेड़ जो बड़ा होने में थोड़ा वक्त लेते हैं, वह तो लगने लगभग बंद हो गए। दिल्ली में पहले से लगे हुए हरे भरे पेड़ों में चुपचाप तेजाब डालकर इसलिए जला दिया जाता है कि वहां कार खड़ा करने की जगह बन सके। कॉलोनी की कंक्रीट,तारकोल से बनी सड़कों के साथ-साथ जो कच्ची मिट्टी की पगडंडियां बनी होती थी जिसमें बरसात का पानी समा जाता था अब उसको भी पक्की सड़क बना दिया जा रहा है। कालोनियों के बीच में पड़ी खाली हुई जमीन पर सरकारी एजेंसियां नई नई कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें कायम कर रही है। जहां पहले भूमिगत पानी का जलस्तर 30/40 फीट पर था वहीं अब डेढ़ सौ 200 फीट तक चला गया है।
दो मुल्कों की जंग से वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को जो नुकसान हो रहा है वह तो है ही परंतु बदकिस्मती से हमारे मुल्क में पर्यावरण मैं पलीता लगाने में हम भी पीछे नहीं है। हालांकि एक वक्त ऐसा भी था जब बिश्नोई समाज के पुरखों ने राजस्थान में पेड़ों से लिपटकर अपनी जान इसलिए दे दी थी क्योंकि राजा अपने महल में लकड़ी के इस्तेमाल के लिए उन हरे भरे पेड़ों को कटवा रहा था।
दिल्ली मुल्क की राजधानी है, वह दुनिया की प्रदूषित राजधानियों में भी अव्वल है। हालात यहां तक हो गए की नए छायादार, पर्यावरण को शुद्ध रखने वाले नीम पीपल जैसे पेड़ जो बड़ा होने में थोड़ा वक्त लेते हैं, वह तो लगने लगभग बंद हो गए। दिल्ली में पहले से लगे हुए हरे भरे पेड़ों में चुपचाप तेजाब डालकर इसलिए जला दिया जाता है कि वहां कार खड़ा करने की जगह बन सके। कॉलोनी की कंक्रीट,तारकोल से बनी सड़कों के साथ-साथ जो कच्ची मिट्टी की पगडंडियां बनी होती थी जिसमें बरसात का पानी समा जाता था अब उसको भी पक्की सड़क बना दिया जा रहा है। कालोनियों के बीच में पड़ी खाली हुई जमीन पर सरकारी एजेंसियां नई नई कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतें कायम कर रही है। जहां पहले भूमिगत पानी का जलस्तर 30/40 फीट पर था वहीं अब डेढ़ सौ 200 फीट तक चला गया है।
कई लोग पेड़ पौधों से इसलिए भी नफरत कर रहे हैं क्योंकि उनके गिरते हुए सूखे पत्तों को वह पसंद नहीं करते । इसलिए वह भी मौका मिलते ही छंटाई के नाम पर पूरे पेड़ को ही खत्म करने के लिए आमादा है। परंतु पर्यावरण दुश्मनों के अलावा ऐसे भी कुछ उदाहरण देखने को मिल रहे हैं, जिनसे बड़ा सुकून भी मिलता है।
बर्बादी के इस आलम के बावजूद मेरे घर के पास वाले पार्क में, मैं कई सालों से देख रहा हूं कि चार्टर्ड अकाउंटेंट विनय खुराना जिन्हें मैं पहले पार्क का सरकारी माली समझता था, मई जून की झुलसती हुई तपन में भी हाथ में पानी की बाल्टी,पाइप को खींचकर इधर-उधर ले जाकर पेड़ पौधों को पानी देते हुए देखता हूं ।
हमारे पार्क के हर पेड़ पौधे को खाद, पानी, मिट्टी की मुकम्मल देखभाल वे करते रहते हैं। सरकारी मालियों को भी अपनी जेब से खर्च कर खाद तथा नए पेड़ पौधे लगाने में उनकी तन्मयता, लगन को देखकर पार्क में कुछ अन्य लोग जैसे दिनेश भाटिया जी इत्यादि भी इसमें शामिल होकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए जुटे हुए हैं। कभी कभार में भी उनके साथ खड़ा होकर उनकी हौसला अफजाई करता रहता हूं। विनय खुराना जी को पर्यावरण का सच्चा सेवक, साधक मानकर पर्यावरण मित्र के रूप में पहचाना, नवाजा जाना चाहिए।








