आरक्षण: एक पुनर्विचार

वो वेदना जो सदियों से हृदय में जली,
न्याय की किरण बनी, आशा की ज्योति खिली।
वंचितों की आवाज़, टूटी हुई दीवार,
संविधान के पन्नों में लिखी सदियों की पुकार।

पर समय के साथ जब बदल गया स्वर,
कुछ को मिला अधिकार, कुछ रह गए अब दर-दर।
पीढ़ी दर पीढ़ी बन गई ये विरासत,
वास्तविक दुखी रहे, खो गई असली बात।

जाति की छाँव से अब छूटे नहीं सब,
धन-संपत्ति का फेर भी खड़ा अब तब।
क्या वह व्यवस्था जो न्याय दे सबको?
या बन गई वह एक छलावा, भ्रम का ढको?

आर्थिक आधार की जब बात उठती है,
समानता की लौ फिर जगमगाती है।
संसद करे जब पुनः विमर्श- विचार,
तभी बहेगी फिर से न्याय की धार।

नहीं चाहिए हमें केवल दिखावा न्याय का,
चाहिए वास्तविकता, सबका भाग्य आय का।
आरक्षण हो पुनः एक संवेदनशील गीत,
जहाँ हर वंचित को मिले जीवन की जीत।

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