सीजफायर पर सियासी घमासान

-विपक्ष का हमला
-एनडीए की रणनीति तेज

पटना। दीपक कुमार तिवारी।

पाकिस्तान के साथ बढ़ती तनातनी और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के सफल सैन्य कार्रवाई के बाद भारत सरकार द्वारा घोषित सीजफायर अब देश की राजनीति में तीखा मुद्दा बनता जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव की आहट के बीच यह प्रकरण राजनीतिक दलों के लिए नया हथियार बनता दिख रहा है।

14 अप्रैल को पहलगाम में हुए हमले के जवाब में भारत ने जबरदस्त सैन्य कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के भीतर घुसकर उसके कई सैन्य ठिकानों को ध्वस्त किया। इस कार्रवाई को लेकर जनता के भीतर राष्ट्रीय गर्व की भावना चरम पर थी, लेकिन इसके तुरंत बाद घोषित सीजफायर ने सत्ता विरोधी दलों को सरकार पर हमला बोलने का मौका दे दिया।

 

अमेरिकी दबाव या रणनीतिक कदम?

 

विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने अमेरिका के दबाव में आकर सीजफायर को स्वीकार किया है। वे इसकी तुलना 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से कर रहे हैं, जब इंदिरा गांधी ने अमेरिकी दबाव के बावजूद पाकिस्तान पर निर्णायक कार्रवाई की थी। सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी के निर्णयों की तुलना भी तेजी से वायरल हो रही है।

 

एनडीए की सफाई और जनमत का ध्रुवीकरण:

 

एनडीए समर्थक इस सीजफायर को सरकार की एक रणनीतिक चाल बता रहे हैं। उनका कहना है कि भारत ने स्पष्ट कर दिया है—यदि पाकिस्तान कोई उकसावे की कार्रवाई करता है, तो उसे युद्ध की कार्रवाई मानी जाएगी और जवाब बेहद कठोर होगा। भाजपा इसे अपने सख्त रुख और ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के रूप में जनता तक पहुंचा रही है।

 

बिहार चुनाव में मुद्दा बनेगा सीजफायर?

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा जोर पकड़ेगा। विपक्ष इसे सरकार की कमजोरी के तौर पर दिखाना चाहेगा, वहीं एनडीए इसे राष्ट्रवाद और मजबूती के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करेगा। जातीय समीकरणों में उलझे बिहार में यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा यह मसला वोटों में कैसे तब्दील होता है।

 

जाति गणना बनाम राष्ट्रवाद:

 

एनडीए ने जातीय समीकरणों को साधने के लिए पहले ही जाति गणना का दांव चल रखा है। अब राष्ट्र सुरक्षा का मुद्दा भी उसके पक्ष में जा सकता है। यदि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और युद्ध की नौबत आई, तो भाजपा इसका और अधिक राजनीतिक लाभ उठाने की स्थिति में होगी।

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