लोहिया के भारत-पाकिस्तान महासंघ अथवा दक्षिण एशिया संघ को क्रियान्वित करने का आ गया है समय 

संदीप पांडेय 
विदेश मंत्री एस. जयशंकर की शंघई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेने हेतु पाकिस्तान के दौरे से भारत-पाकिस्तान रिश्तों, जो नौ वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़े थे, में सुधार की उम्मीद जगी है।
भारत व पाकिस्तान के नागरिक संगठनों ने 2005 में निजामुद्दीन औलिया की दरगाह, दिल्ली से मुल्तान स्थित बहाउद्दीन जाक़रिया की दरगाह तक एक शांति यात्रा का आयोजन किया था। दिल्ली से वाघा सीमा तक हम चल कर गए थे व पाकिस्तान में लाहौर से मुल्तान हम वाहनों से गए थे। जलंघर पहुंचने से पहले एक सरदार जी पीछे से साइकिल चलाते हुए आए और मुझे रोक कर पूछा कि क्या मैंने ही इस यात्रा का आयोजन किया है। मेरे सकारात्मक जवाब देने पर उन्होंने कहा कि हम जो पर्चा रास्ते में बांट रहे थे उसमें हमारी मांगों का क्रम गलत है। मैंने उनसे समझाने को कहा तो उन्होंने बताया कि हमारी मांगें हैं – भारत पाकिस्तान के बाच सारे मसले बातचीत द्वारा हल किए जाएं जिसमें जम्मू-कश्मीर का मसला वहां के लोगों की राय के मुताबिक हल हो, नाभिकीय शस्त्र तुरंत खत्म किए जाएं व रक्षा बजट घटा कर दोनों देशों की गरीबी दूर की जाए व सीमा पार आने जाने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा की जरूरत खत्म की जाए। उन्होंने कहा कि यदि हमारी मांग संख्या 3 को पहले स्थान पर ले आया जाए तो शेष दो मांगों को मनवाना भी आसान हो जाएगा। मैं आवाक उनकी तरफ देखता रहा। मैंने उनसे पूछा कि वे क्या करते हैं, कहीं पढ़ाते हैं, बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार हैं? उन्होंने बताया कि वे पास के गुरुद्वारे में कीर्तन गाने का काम करते हैं। यह मेरे जीवन में सड़क पर आम इंसान से सीखने का सबसे बड़ा अनुभव था।
इसलिए एस. जयशंकर की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है। मैं नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले दस बार पाकिस्तान गया हूं। उसके बाद मैंने पाकिस्तान की लेबर पार्टी से करीब 40 लोगों को यहां बुलाने की कोशिश की और एक बार भारत से करीब 15 लोगों का एक दल लाहौर में सईदा दीप, जो दो दशक से ऊपर हो गया भारत व पाकिस्तान के बीच दोस्ती व शांति के प्रयास कर रही हैं, द्वारा आयोजित किए जाने वाले एक शांति सम्मेलन में ले जाने की कोशिश की किंतु दोनों ही बार सफलता नहीं मिली। हम दो सालों से पुनः भारत से करीब 40 लोगों का एक समूह लाहौर में सईदा दीप द्वारा दो दिवसीय प्रस्तावित सम्मेलन में भाग लेने हेतु ले जाने की अनुमति मांग रहे हैं किंतु अभी तक सफलता नहीं मिली हैं। सम्मेलन की नई तारीखें 14-15 दिसम्बर, 2024 तय की गई हैं और हमारा आवेदन इस्लामाबाद में लंबित है। उम्मीद है कि जयशंकर के दौर से आम लोगों के आने जाने का रास्ता भी खुलेगा। जब तक लोग मिलेंगे नहीं, बातें नहीं करेंगे तब तक संबंध सामान्य कैसे होंगे?
 
भारत पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि पाकिस्तान भारत में आतंकवाद को प्रायोजित करता है। इस वजह से भारत ने शांति प्रक्रिया रोक कर रखी है और दक्षिण एशिया के देशों का संगठन ठप्प पड़ा हुआ है जबकि भारत ने अन्य देशों के संगठनों जैसे जी-20, ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, मिश्र, इथोपिया, संयुक्त अरब अमीरात), क्वाड (आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत, संयुक्त राज्य अमरीका) व बिमस्टेक (बंग्लादेश, भारत, श्रीलंका, थाईलैण्ड, म्यांमार, भूटान, नेपाल) में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है। चीन ने 2020 में भारत के 20 सैनिक मारे और हमारी 4,000 वर्ग किलोमीटर की जमान पर कब्जा किया हुआ है इसके वाबजूद चीन से हमारे आयात-निर्यात का अंतर दोगुना हो गया है और हमें शंघई सहयोग संगठन (चीन, कजाखस्तान, किर्गिज़स्तान, रूस, ताज़िकिस्तान, उज़बेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान, बेलारूस), जो चीन की एक पहल है, में भाग लेने से कोई परहेज नहीं है।
2008 में मुम्बई में हुए आतंकवादी हमले के बाद जब भारत पाकिस्तान राजनयिक सम्बंध निलंबित थे तो 2010 में भारत की तरफ से कुलदीप नय्यर के नेतृत्व में पाकिस्तान जाने वाले पहले दल का मैं सदस्य था। नय्यर साहब ने दिवंगत बेनजीर भुट्टो के घर में तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, जो उस समय चीन यात्रा पर थे, की बहन व सांसद फरयाल तालपुर से शिकायत के लहजे में कहा कि पाकिस्तान से आतंकवादी आए और भारत में 174 लोगों को मार दिया, इसके बावजूद पाकिस्तान सरकार कुछ नहीं कर रही। फरयाल तालपुर ने पीड़ा भरे स्वर में जवाब दिया कि मुम्बई हमले के पीछे जो संगठन हैं उन्होंने पाकिस्तान के अंदर अब तक 7,000 से ज्यादा लोगों को मार डाला है और पाकिस्तानी सरकार उन पर नियंत्रण स्थापित कर पाने में असफल है। भारत में यह समझना बहुत कठिन है कि पाकिस्तान की सरकार आतंकवाद की प्रायोजक नहीं बल्कि उससे पीड़ित है क्योंकि हमारे यहां तथाकथित राष्ट्रवादी लोग पाकिस्तान को एक इकाई मानकर सारा दोष वहां की सरकार पर मढ़ देते हैं और हमारे संचार माध्यम भी सनसनीखेज खबरें खोजते हैं। यदि हम पाकिस्तान को एक इकाई के रूप में देखने की भूल करते रहेंगे तो हम वहां के दक्षिण पंथी तत्वों के हाथ में खेलेंगे जिनका अस्तित्व भारत विरोध वृतांत पर टिका हुआ है ठीक उसी तरह जैसे भारत के धार्मिक कट्टरपंथियों की राजनीति मुस्लिम विरोध, जिसका विस्तार पाकिस्तान विरोध में भी हो जाता है, से फलती फूलती है।
हमारी 2005 की दिल्ली मुल्तान यात्रा के समापन पर मैंने बहाउद्दीन ज़ाकरिया दरगाह के सज्जादा नशीें शाह महमूद कुरेशी, जो बाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बने, का भाषण सुना है जिसमें उन्होंने वह बात कह दी जो भारत में कहना आसान है किंतु पाकिस्तान में नहीं कही जाती क्योंकि उससे पाकिस्तान का अस्तित्व ही में खतरे में पड़ जाता है। उन्होंने उस दिन कहा कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब जैसे लोगों ने ही उनके मध्य दीवार को ढहा कर पश्चिम व पूर्व जर्मनी को एक कर दिया, भारत व पाकिस्तान भी एक हो जाएंगे। नरेन्द्र मोदी, जो वैसे तो इमरान खान के आलोचक रहे लेकिन उस दिन उनको भी इमरान खान की तारीफ करनी पड़ी जिए दिन करतारपुर साहिब गलियारे का उद्घाटन किया जा रहा था जिससे भारत के तार्थयात्री बिना वीज़ा के दूसरी ओर स्थित गुरुद्वारे में जा सकते थे। भारत पाकिस्तान का रिश्ता एक दूसरे की नकल कर के चलता आ रहा है। इस नीति के अनुसार बेहतर होता यदि नरेन्द्र मोदी उस दिन पाकिस्तानी तीर्थयात्रियों के लिए अजमेर शरीफ दरगाह के लिए एक गलियारा खोलने का ऐलान कर देते। मैंने 2005 की यात्रा में देखा है कि निजामुद्दीन औलिया दरगाह के गद्दी नशीं, नाजिम अली निजामी, जो हमारे साथ गए थे, के हाथ में लाहौर, साहीवाल, चींचावतनी व मुल्तान में तमाम लोग कागज पर लिखी पर्चियां पकड़ा रहे थे जिसमें दुआएं लिखी थीं जो वे चाहते थे कि निजामी साहब दिल्ली लौटकर उनके लिए पढ़ें, चूंकि उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि वे खुद कभी दिल्ली जा पाएंगे।
अतः दोनों पड़ोसियों के बीच दोस्ताना रिश्तों का भी उतना ही मजबूत आधार है जितना शायद दुश्मनी के लिए। तेज वैश्वीकरण के दौर में इसमें दो राय नहीं हो सकती कि आने वाली पीढ़ी का भविष्य दोनों में से कौन से रास्ते पर ज्यादा सुरक्षित है? आखिर नरेन्द्र मोदी पूरी दुनिया को वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश देते हैं। उन्होंने व्लादिमीर पुतिन को सलाह दी है कि यह कोई युद्ध का युग नहीं है।
नरेन्द्र मोदी को समाज को हिला कर रख देने वाले बड़े फैसले लेने का शौक है। एक दिन उनको दूरदर्शन पर आना चाहिए और ऐलान कर देना चाहिए कि डाॅ. लोहिया के स्वपन अनुसार भारत-पाकिस्तान का महासंघ कायम किया जाता है अथवा यूरोपीय संघ की तर्ज पर एक दक्षिण एशिया महासंघ का गठन किया जाता है जिसके अंतर्गत एक देश से दूसरे देश जाने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा की जरूरत नहीं होगी। इसमें भविष्य में चीन को भी शामिल करते हुए एशिया संघ भी बन सकता है जिसमें तिब्बत को स्वायत्तता हासिल हो।

(लेखक सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव हैं)

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