बांग्लादेश में पाक परस्त हिंसा!

चरण सिंह 
आरक्षण की आड़ में जो कुछ भी बांग्लादेश में हुआ उसे आंदोलन तो नहीं कहा जा सकता है। उसे बांग्लादेश की जनता की बगावत भी नहीं कहा जा सकता है। कौन से आंदोलनकारी आतंकियों को जेल से छुड़ाते हैं ? कौन से आंदोलनकारी अपने ही देश को आजादी दिलाने वाले नायक की मूर्ति क्षतिग्रस्त करते हैं ? कौन से आंदोलनकारी उनके देश के नायक पर फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर और उनके बेटे को ही मार डालते हैं ?
यह सारा मामला उन लोगों की ओर षड्यंत्र रचने का इशारा कर रहा है जो बांग्लादेश के अलग देश बनने के खिलाफ थे। कट्टरपंथी नेता असदुद्दीन ओवैसी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री स्पष्ट करें कि वह बांग्लादेश की जनता के साथ हैं या फिर शेख हसीना के। क्या ओवैसी बांग्लादेश के नायक की मूर्ति तोड़ने और उन पर फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर और उनके बेटे ही हत्या करने वाले अराजक तत्वों के साथ रहने की बात कर रहे हैं ? जरूरत तो इस बात की है कि भारत बांग्लादेश में सेना भेजकर उसे अपने अधीन करे और एक स्टेट बनाकर छोड़ दे। नहीं तो आने वाले समय में बांगलादेश पाकिस्तान से भी अधिक दिक्कत भारत को देने वाला देश बन सकता है।
बताया जा रहा है कि बांग्लादेश में फैली हिंसा में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है। बांग्लादेश की सेना का चीफ वकार उज जमान के भी पाकिस्तान से मिले होने की बात सामने आ रही है। चीन की भी उसे शह बताई जा रही है। बांग्लादेश की हिंसा से प्रश्न यह भी उठता है कि बांग्लादेश को आजाद कराने वालों उन पर फिल्म बनाने वालों और हिन्दुओं पर हमले कौन लोग कर सकते हैं ? एक साधारण आदमी भी यही कहेगा कि यह तो वही आदमी करेगा जिसे बांग्लादेश के अस्तित्व में आने पर दिक्कत थी और जो भारत से नफरत करता है।
भले ही नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की अगुआई में बांग्लादेश में नई सरकार बनने जा रही हो पर बांग्लादेश की हालत लगातार बदतर होती जा रही है।

बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता और देश छोड़ने के बाद वहां जारी हिंसा के बीच हालात काफी खराब होते जा रहे हैं। बांग्लादेश में जारी अराजकता और हिंसा के माहौल के बीच खबर आ रही है कि वहां मुजीबुर रहमान पर फिल्म बनाने वाले डायरेक्टर और उनके बेटे एक्टर को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला है। शेख हसीना से नफरत करने की बात समझ में आ सकती है पर मुजीबुर रहमान से तो नफरत करने का एक ही कारण हो सकता है ये लोग बांग्लादेश की आज़ादी के समर्थक नहीं थे।

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