राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 1925 में हुई थी और 2025 में इसके शताब्दी वर्ष में हम उसकी उन वीर गाथाओं को याद कर रहे हैं, जब संघ के स्वयंसेवकों ने देश की अखंडता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। आजादी के 14 साल बाद भी पुर्तगाली कब्जे वाली गोवा, दादरा-नागर हवेली जैसी जगहें आजाद न होने पर स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह से लेकर सशस्त्र संघर्ष तक हर मोर्चे पर कूद पड़े। इन आंदोलनों में तिरंगे की आन-बान-शान के लिए फायरिंग की गूंज, खून की नदियां बहीं और सैकड़ों स्वयंसेवक अमर हो गए। यह कहानी है उन अनसुने नायकों की, जिन्होंने ‘भारत माता की जय’ के नारों के बीच अपनी जान कुर्बान की।
दादरा-नागर हवेली: मुक्ति की पहली जंग, जहां संघ ने नींव रखी
1954 में दादरा-नागर हवेली (72 गांव, 42,000 आबादी) पुर्तगालियों के चंगुल से आजाद होने की पहली मिसाल बनी। आरएसएस के 200 स्वयंसेवकों ने नाना काजरेकर और सुधीर फड़के (बाबूजी) के नेतृत्व में 175 सशस्त्र पुर्तगाली सैनिकों को भगाया। 31 जुलाई को आजाद गोमांतक दल (एजीडी) और आरएसएस के संयुक्त जत्थे ने दादरा पर कब्जा किया। भीषण बारिश में विनायक राव आप्टे के 40-50 स्वयंसेवकों ने प्रभाकर विट्ठल सेनारी और प्रभाकर वैद्य के साथ पुर्तगाली चौकियों पर धावा बोला। 2 अगस्त को तिरंगा फहराया गया, और 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाया। आरएसएस की किताब ‘द आरएसएस स्टोरी’ में के.आर. मलकानी लिखते हैं कि इस मुक्ति में संघ के स्वयंसेवकों का योगदान निर्णायक था। 2011 में 103 में से 55 बचे स्वयंसेवकों को सम्मानित किया गया। यह जीत गोवा मुक्ति की प्रेरणा बनी।
गोवा मुक्ति संग्राम: जलियांवाला बाग जैसी फायरिंग, 51 शहीद
गोवा पर पुर्तगाली कब्जा 450 साल पुराना था। 13 जून 1955 को कर्नाटक केसरी जगन्नाथ राव जोशी ने आरएसएस स्वयंसेवकों के साथ गोवा सत्याग्रह शुरू किया। पुणे से 3,000 स्वयंसेवक (महिलाओं सहित) कूच करे, ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ और ‘वंदे मातरम’ के नारों से सीमा लांघी। जोशी समेत कई गिरफ्तार हुए, फोर्ट अगोड़ा जेल में डाले गए। उन्होंने जज से कहा, “यह मेरी मातृभूमि का अंग है।” 10-10 साल की सख्त सजाएं हुईं, और यातनाओं से अमीरचंद गुप्त जैसे दो सत्याग्रही शहीद हुए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने गृहमंत्री पंत को तार भेजा।
चरमोत्कर्ष 15 अगस्त 1955 का था—स्वतंत्र भारत का 8वां स्वतंत्रता दिवस। 5,000 से ज्यादा निहत्थे सत्याग्रही तिरंगा लिए गोवा की सीमा पर पहुंचे। पुर्तगाली सैनिकों ने ‘पुर्तगाली क्विट इंडिया’ के नारों पर फायरिंग शुरू कर दी। पत्रादेवी सीमा पर खूनखराबा हुआ—51 सत्याग्रही शहीद, 300 से ज्यादा घायल। इसे ‘गोवा का जलियांवाला बाग’ कहा गया। ज्यादातर शहीद आरएसएस और जनसंघ के स्वयंसेवक थे।
चरमोत्कर्ष 15 अगस्त 1955 का था—स्वतंत्र भारत का 8वां स्वतंत्रता दिवस। 5,000 से ज्यादा निहत्थे सत्याग्रही तिरंगा लिए गोवा की सीमा पर पहुंचे। पुर्तगाली सैनिकों ने ‘पुर्तगाली क्विट इंडिया’ के नारों पर फायरिंग शुरू कर दी। पत्रादेवी सीमा पर खूनखराबा हुआ—51 सत्याग्रही शहीद, 300 से ज्यादा घायल। इसे ‘गोवा का जलियांवाला बाग’ कहा गया। ज्यादातर शहीद आरएसएस और जनसंघ के स्वयंसेवक थे।
रामभाऊ महाकाल: तिरंगे का ऐसा प्रहरी, जो न झुका न गिरा
इस फायरिंग की सबसे मार्मिक कहानी है उज्जैन के रामभाऊ महाकाल (राजा भाऊ) की। महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी बलवंत भट्ट तेलंग के पुत्र, जन्म 26 जनवरी 1923। 1942 में आरएसएस प्रचारक बने, सोनकच्छ में 33 शाखाएं खड़ी कीं। संघ प्रतिबंध के दौरान भोजनालय चलाया। 9 अगस्त 1955 को इंदौर में भाषण दिया, फिर पुणे से जत्था लेकर कसरलाल होते हुए गोवा पहुंचे। 15 अगस्त को तिरंगा लिए सबसे आगे थे। पुर्तगाली सैनिकों ने गोली चलाई—पहली बसंतराव ओक के पैर में, दूसरी पंजाब के हरनाम सिंह के सीने में। रामभाऊ को घेरा, सिर में तीन गोलियां मारीं—आंखों और सिर के बीच लगी, खून के फव्वारे फूटे। लेकिन वे न गिरे, ‘भारत माता की जय’ चिल्लाते सीमा लांघे। साथियों ने तिरंगा संभाला, उन्हें अस्पताल ले जाया, लेकिन वे शहीद हो गए। उनकी अस्थियां उज्जैन लाई गईं, शिवप्रसाद कोठारी ने मुखाग्नि दी। सोनकच्छ में उनकी मूर्ति स्थापित है। पांचजन्य में लिखा है कि रामभाऊ ने गांव-गांव से युवकों को इकट्ठा कर सत्याग्रहियों के लिए उज्जैन में ठहराव-भोजन की व्यवस्था की।
महिलाओं का वीरतापूर्ण योगदान: सुभद्रा बाई की रानी लक्ष्मीबाई जैसी कुर्बानी
महिलाएं पीछे न रहीं। 40 वर्षीया सुभद्रा बाई ने पुरुष सत्याग्रही से तिरंगा छीन लिया, छाती पर गोली खाई लेकिन झंडा ऊंचा रखा—झांसी की रानी की याद दिला दी। राष्ट्र सेविका समिति की सरस्वती ताई आप्टे ने पुणे-बेलगांव में भोजन व्यवस्था की, कई सेविकाएं मैदान में उतरीं। जनसंघ के सत्याग्रही अन्य दलों से चार गुना ज्यादा थे।
महिलाओं का वीरतापूर्ण योगदान: सुभद्रा बाई की रानी लक्ष्मीबाई जैसी कुर्बानी
महिलाएं पीछे न रहीं। 40 वर्षीया सुभद्रा बाई ने पुरुष सत्याग्रही से तिरंगा छीन लिया, छाती पर गोली खाई लेकिन झंडा ऊंचा रखा—झांसी की रानी की याद दिला दी। राष्ट्र सेविका समिति की सरस्वती ताई आप्टे ने पुणे-बेलगांव में भोजन व्यवस्था की, कई सेविकाएं मैदान में उतरीं। जनसंघ के सत्याग्रही अन्य दलों से चार गुना ज्यादा थे।
गुरुजी का आह्वान और नेहरू की अनदेखी
आरएसएस सरसंघचालक माधवराव गोलवलकर (गुरुजी) ने कहा, “गोवा मुक्ति का इससे बेहतर अवसर न आएगा। सरकार ने आंदोलन की पीठ में छुरा मारा।” लेकिन नेहरू सरकार ने कूटनीति पर जोर दिया, सत्याग्रह को कम आंका। आखिर 1961 में सेना ने गोवा मुक्त किया, लेकिन नींव संघ के स्वयंसेवकों ने रखी। संगीतकार सुधीर फड़के ने लता मंगेशकर से ‘गोवा मुक्ति गीत’ गवाया, फंड जुटाया। ये बलिदान संघ के 100 साल की वो अमर गाथा हैं, जो बताती हैं कि स्वयंसेवक सिर्फ शाखा में नहीं, सीमा पर भी राष्ट्र रक्षा के लिए तैयार रहते हैं।

